Sunday, August 16, 2009

अमरबेल...............१६ अगस्त २००९

१५ अगस्त से याद आया,राष्ट्रीय,राज्य स्तरीय,जिला और तहसील स्तरीय,सभी तरह के स्वतंत्रता दिवस के आयोजन हमने देखे हैं लेकिन आज मैं कहता हूँ की जिसने इस स्कूल का स्वतंत्रता दिवस देखा है उसे ये सब फीके लगेंगेरेत के सुनहरे धोरों के बीच स्थित टापू के इस स्कूल में जो संस्कृतिक आयोजन,पीटी परेड,व्यायाम,और खेल आदि होते थे उनसे लगता था की हिंदुस्तान की आजादी की वर्षगांठ इससे बेहतर कहीं भी नहीं मानी जा सकती.मुझे याद है दस दिन पहले ही बच्चों की रिहर्सल शुरू हो जाती थी,विभिन्न नाटक,भाषण,गीत,कवितायें,एकांकी,अभिनय और न जाने क्या क्या विचित्र वेशभूषा,जैसी तैयारियां की जाती थीमैं आपसे सही कहता हूँ इन कार्यक्रमों को देखने के लिए राजस्थान के प्रत्येक हिस्से से लोग आते थे स्कूल का बीस बीघा का मैदान खचाखच भर जाता था ,पांव धरने को जगह नहीं मिलती थी।
पूरा तो मुझे नहीं याद लेकिन एक बार के आयोजन में विद्यार्थियों ने संजय -विदुला संवाद का नाटकीय प्रस्तुतीकरण किया था उसकी मेरे जीवन पर बहुत गहरी छाप पडी,किस अंदाज में सावित्री नामक विदुला बनी विद्यार्थी ने संजय बनी मगन कँवर को सीख पिलाई और उस वक्त कतई नहीं लगता था की ये कोई नाटकीय प्रस्तुति है,वास्तव में संजय विदुला साकार हो उठा था ,किस कदर माता की आँखों से चिंगारियां निकल रही थी और कैसे संजय गर्दन झुकाए सुनने को विवश था मेरे कहने का अर्थ यह है की किस प्रकार शाला के स्टाफ ने सीमित संसाधनों के बाद भी रेतीले उस बियावान इलाके में इस तरह की तैयारियां की होगी,कैसे चरित्रों को बच्चों के भीतर डाला होगा कैसे शानदार सजीव प्रस्तुतियां देते होंगे?जरा कल्पना तो करें?
विद्यालयों में सांस्कृतिक गतिविधियों और सह पाठ्येटर गर्तिविधियों के प्रबल हिमायती तत्कालीन शिक्षक इन गतिविधियों के सहारे ही बहुत बड़ा हिस्सा बच्चों को समझाने में कामयाब होते थे,किताबों को मात्र एक सहारे के रूप में इस्तेमाल करने वाले तत्कालीन योग्य शिक्षक बालकों के भीतर समूल परिवर्तन करने के पक्षधर होते थे।मुझे याद है कि अध्यापक स्वयं फुटबॉल और वॉलीबॉल के मैदानों में बच्चों के साथ खेल कर उन्हें खेल की बारीक से बारीक बातें सिखाते थे।उस समय की सबसे ख़ास बात ये थी कि उस काल के प्राचीन खेल जो परंपरागत थे ,उनको प्राथमिकता से बच्चों को सिखाना विद्यालय की प्राथमिकता में शामिल था।स्कूल में तत्कालीन माहौल इस प्रकार का था कि बच्चे विद्यालय समय पश्चात भी अपने घर जाना पसंद नहीं करते थे,स्कूल को को करिकुलर गतिविधियों का इतना शानदार केंद्र बनाया हुआ था कि बच्चे अपने आपको यहीं पूरी तरह से खपा देते थे।

स्वतंत्रता दिवस एक बार फ़िर

किसी भी दिवस को क्यों मनाया जाता है?शायद इसलिए की उससे सम्बंधित यादें कभी धूमिल न हों!मेरा भी यही मानना हैलेकिन इन यादों को धूमिल न पड़ने देने की बात कहने वाले कुल कितने लोग हैं?चंद! बस, और कुछ नहीं

आजादी की वास्तविक ताबीर को समझने वाले मुझे तो मेरे अगल बगल तो नजर नहीं आते,कहीं और होंगे जहाँ तक मेरी शायद पहुँच नहीं हैमैं आजादी प्राप्त करने और उसे बनाये रखने की बात उस वैश्वीकरण के दौर में नहीं करना चाहता जब पूरा विश्व एक टेबल पर उतर आता है,भावनाओं में भरकर आन्दोलन करने का जो समय था उस समय जो लोग थे उन्होंने वही किया जो उन्हें करना चाहिए था'अगर वो समय आज होता तो आज भी वही होता जो उस समय हुआ,इसमें आर्श्चय किस बात का?देश काल और परिस्थितियां सदैव प्रकृति द्वारा संचालित होते हैं,और प्रकृति से ऊपर कोई नहीं है

मैं इस ब्लॉग को पढ़ रहे बुद्धिमान लोगों के सामने यह तर्क रखता हूँ की आज आप जिन स्वतंत्रता सैनानियों के गीत गाते हैं,क्या वही असल में देश को आजाद करवाने वाले शूरवीर थे?क्या आपको ये मालूम नहीं की जो इस कार्य के नाम पर गीतों में गाये जा रहे हैं वो तो मात्र चंद लोग हैं,उन असली क्रांतिकारियों के लम्बी फेहरिस्त तो हमें याद भी नहीं, अनाम हैं

Friday, June 26, 2009

ना कहना......

एक एसटीडी पीसीओ पर आज दीवार पर टंगा हुआ एक कागज देखा जिस पर लिखा था -"जीवन की आधी मुसीबतों का स्त्रोत है अधिक शीघ्रता से "हाँ" कहना,और आवश्यकतानुसार शीघ्रता से "ना"नहीं कहना"
शुष्क "हाँ" कहने की अपेक्षा सुनहरी "ना" कहना अधिक संतोषप्रद होता है
ये बात वास्तव में बहुत अपील करती है

Friday, June 19, 2009

अमरबेल.....(१०) १९ जून 2009

मैं बहुत आह्लादित हूँ की अमरबेल की भूमिका को सराहा जा रहा है,मेरे आह्लाद का एक कारण ये भी है कि हिंदुस्तान कि विख्यात आकाशगंगा कोरियर सर्विस के चेयरमेन डॉक्टर सुभाष जी गोयल ने इसे अप्रीसियेट किया है,मैं खुश इसलिए भी हूँ कि डॉक्टर साहब ख़ुद उस स्कूल के प्रत्यक्ष दृष्टा हैं जिसको अमरबेल के रूप में आकार मिल रहा है.धन्यवाद् डॉक्टर साहब,बहुत अच्छा लगा.

Sunday, June 7, 2009

अमरबेल ............(९) ७ जून २००९

जिस स्कूल परिसर में गांव के एवड बैठते थे,पशु जहाँ अपनी गोर बनाये रखते थे,उस स्कूल का साफ सुथरा महकता वातावरण,कल्पना से भी परे हो गया.अध्यापक जो भी एक बार गांव में आ जाते थे,वो वापस जाने की जिद या कोशिश नहीं करते थे,इससे बडी खूबसूरती और सफलता और क्या होगी?स्कूल वास्तव में स्कूल जैसा हो गया था,मन लगता था,वहीं पर बैठे रहना चाहते थे बच्चे और गुरुजन.स्कूल की सुरभि दूर दूर तक फैलने लगी,हालाँकि पहले प्रचार के कोई माध्यम नहीं होते थे फ़िर भी इस स्कूल की पढाई का स्तर,अनुशाशन,और नियमितता का व्यापक प्रचार हुआ,लोग दूर दूर से इस गांव में सिर्फ़ बच्चे पढाने आने लगे,कोई अपने रिश्तेदारों के पास बच्चे छोड़ने लगे तो कोई स्कूल में मास्टरों के पास.हेड मास्टर जी ने पुराने ग्राम पंचायत भवन को छात्रावास बना दिया था,कुछ बच्चे उसमें रहने लगे.मैं कैसे लिखूं किन शब्दों का उपयोग करूं,कुछ समझ में नहीं आता था की कोन कहाँ रह रहा है.लक्ष्म्न दास सोदागर सिंह जी के मकान पर सो जाता था,रोटी भी वहीं खा लेता था,बदरी दास चाहे छात्रावास में रहता होगा,लेकिन खाने के समय वो हेड मास्टर जी वाले घर चला जाता था,बहनजी उसे भी खाना खिला देती थी.(बहनजी हम गुरुजनों की पत्नी को कहते थे),रूप सिंह तो स्कूल के पडोसी लेखरामजी के घर रोटी खा आता था,हंसराज का जहाँ मोका लगता वहीं खा आता था,ये तो मुझे कुछ धुंधली यादें है,वरना उस समय कोई भी किसी के घर खाना खाने जाता तो कोई मना नहीं था.महावीर,चुनाराम,पन्नालाल,रामेश्वर,लेखनाथ,भीखाराम,रामकरन,श्योदान,मनफूल,और अनेक सैंकडों नम ऐसे हैं जो बहर गांवों के थे और इस स्कूल में पढ़ते थे,मेरा दावा है की किसी भी विद्यार्थी कभी इस स्कूल में परायापन नहीं लगा होगा,किसी को एक पल भी ये महसूस नहीं हुआ होगा की वो किसी पराये गांव में है.स्कूल के बाद स्कूल स्कूल के पहले स्कूल जहाँ देखो वहां स्कूल ,बच्चे,अभिभावक,अध्यापक,यानि चरों तरफ स्कूल का माहौल.हेड मास्टर जी ने अपने आपको स्कूल के प्रति जिस भाव से समर्पित कर रखा था उसकी परिभाषा सम्भव नहीं लेकिन ये जरूर है की उनकी विद्वता,विनम्रता,और शालीनता की तह तक जा सकना मुमकिन नहीं है .

अमरबेल ..........(८) ७ जून २००९

..एक उमेद सिंह नामक पुलिस के आदमी थे उनका खेत स्कूल के पास था,जब छात्रों ने स्कूल में ग्वार पैदा करके पानी का कनेक्सन करवा लिया तो,हेड मास्टर जी ने उमेद सिंह जी से उनका २० बीघा खेत स्कूल के लिए मांग लिया.उन्होंने राजी राजी खेत बोने की इजाजत देदी,सब बरसात का इंतजार करने लगे,बरसात आई,हम बच्चों ने लकडियाँ जोड़ जोड़ कर छोटे छोटे हल बनाये,अपने अपने घरों से ग्वार का बीज लाये,खेत की सफाई जिसे ग्रामीण सूड कहता हैं,किया और बुआई शुरू कर दी,जहाँ तक मुझे याद है हमने रोजाना एक एक घंटे जुताई की और १० दिन में पूरा २० बीघा खेत जोत दिया.खेत में मतीरे,काकड़,काचर की बेलें भी लगे थी.ज्यों ज्यों दिन बीतने लगे ग्वार बढ़ने लगा,अध्यापकों के परिवार ग्वारफली तोड़ने के लिए खेत जाने लगे,मतीरा,काचर,तींदसी,लोइया आदि की हरी सब्जिया खूब लेकर आते,बहरहाल उस साल मुझे याद है शायद ८३५ रूपये का ग्वार पैदा हुआ था,और जब उसे बेच कर हेडमास्टर जी ने प्रार्थना में पैसे दिखाए थे तो वो बहुत भावुक हो गये थे,मुझे याद है उन्होंने बच्चों से पूछा था-"बताओ इस रूपये का क्या करना है?"कोई कुछ नहीं बोला था,आठवीं क्लास का राम किशन बोला था की -"गुरूजी,हमारे गुरुजनों के रहने के लिए मकान नहीं है,कम से कम इस रूपये से काम तो शुरू करवादो,अगली फसल में और पैसे आजायेंगे."पता नहीं हेड मास्टर जी ने तो क्या सोच रखा था,लेकिन रामकिशन के इस सुझाव को उन्होंने मन लिया और स्कूल के पास ही अध्यापक आवास की नींव लगवा दी ,मुझे आज इतना घोर अचम्भा है की वो जो नींव लगवाई थी और ८३५ रूपये की रकम से मकान बनाना चाहते थे,आप भी अचम्भा करेंगे नींव लगने के बाद सिर्फ़ दो महीने में ही ५ अध्यापक आवास बन कर तैयार हो गए जिन पर लागत १०००० रूपये से कहीं अधिक आई थी,बाकि रुपया ग्रामीणों ने चंदे से इकठा किया था,वो इसलिए की हेड मास्टर जी ने घर घर जाकर ये कह दिया था कि जब बच्चे इतना कुछ कर सकते हैं तो,कुछ तो आपको भी करना चाहिए.ऐसा शानदार नजारा था मेरे गांव का.आज ३९ साल बाद ये सब कुछ मैं बताना इसलिए जरूरी समझता हूं  कि कम से कम कोई तो उस हालत कि कल्पना करे कि कैसे काम हुए होंगे,कैसे यह वर्तमान किस भूतकाल कि नींव पर टिका हुआ है?क्यों लोग अपने आपको नियमो के अलावा भी काम करने को prstut कर देते थे,यानि काम किसी को dikhane कि grj से नहीं blki अपने देश कि trkki के लिए किया जाना मूल bhawna कहा जाना चाहिए.

Saturday, June 6, 2009

अमरबेल........(७) ६ जून ०९

....स्कूल में मैंने कभी किसी भी मास्टर जी को कुर्सी पर बैठ कर पढाते हुए कभी नहीं देखा,जब तक क्लास चलती थी मास्टर जी ब्लैक बोर्ड पर खडे खडे ही पढाते थे ,मुझे याद है गलती से भी स्कूल टाइम में क्लास रूम में कोई कुर्सी रह भी जाती तो चपरासी उसे उठा कर ले जाता.बच्चे हालाँकि दरियां बिछा कर नीचे फर्श पर ही बैठते थे,लेकिन पूरा डायरी के मुताबिक अध्ययन करवा कर मास्टर जी होमवर्क देते थे. स्कूल में सभी अध्यापक अपने विषयों की पूरी तयारी करके आते और पूरी कुशलता के साथ उसे सिखाने की कोशिश करते,यही कारण था कि उस काल में भी स्काउटिंग,टूर्नामेंट,सीखो कमाओ,अल्पबचत,खेती आदि को शिक्षा के साथ जोड़ दिया गया था.मैं ख़ुद अरंड के साबुन बनाना,मोमबत्ती बनाना,चाक निर्माण,अमृतधारा बनाना आदि सीखो कमाओ योजना के तहत सीखा था,जो मुझे आज भी याद है. स्कूल में जो बाग लगाया था उसे सींचने के लिए पाइप लाइन लगाने के लिए रुपयों कि जरूरत थी,हम सब बच्चे बाग को सूखता नहीं देख सकते थे,बरसात का मोसम था,हमने स्कूल के पिछली तरफ खली पडी जमीन पर ग्वार बीजने का फ़ैसला किया,जो फसल आयेगी उसे बेच कर पानी का नल लगवा लेंगे.हमने लकडियाँ आपस में जोड़ कर कल बनाये,कोई घर से ग्वार का बीज ले आया,कोई लोहे कि नुकीली चीज ले आया,ग्वार को जमीन पर छिड़क कर उस पर हल चला दिया.हल भी बडे मजेदार थे,दो लडके उसे आगे से खींचते और एक पीछे से पकड़ता,करीब काफी जमीन पर बुआई कर डाली,दो तीन बार बरसात और हो गई,ज्यों ज्यों ग्वार बढ़ता गया हमारी खुशियाँ बढ़ती गई,हम उस ग्वार से ग्वारफली कच्ची कच्ची तोड़ कर अपने गुरुजनों के घर भी पहुंचे करते थे,आखिरकार टाइम आने पर हमने ग्वार उखाडा,एक खलिहान बनाया,ग्वार कूट पीट कर निकल डाला,मुझे ये तो याद नहीं कि कितना हुआ,पर ये याद है कि बेचने पर १३५ रूपये मिले थे,इस राशिः से हमारे बाग के लिए ९० फीट पाइप आया था,हम वाटर वोर्क्स जा कर वहां से खडगावत जी को लेआए थे और हाथो हाथ कनेक्सन करवाया था,तब से हमारा बाग हर भरा हो गया था और उसमें कनेर,गेंदा,चमेली,रात कि रानी,जूही,सूरजमुखी,एलिया,मेहँदी,समेत अनेक प्रकार के फूल महकने लगे थे,मुझे याद है जब भी कोई अध्यापक या अभिभावक बाहर जाते थे तो उन्हें स्कूल के लिए कोई न कोई फूलदार फलदार पौधा लेकर आना ही पड़ता था.पानी कि सुविधा होते ही स्कूल की बाड़ के साथ साथ सिसम,सरेस,नीम,खेजडी,पर्किन्सोनिया,रोहिडा,अमरुद,अनार,आम बदाम,शहतूत,ल्हेसुआ,और न जाने कोन कोन से पौधे लग गये थे.हेड मास्टर जी ने एक एक विद्यार्थी को एक एक पौधा गोद दे दिया था,जिसका पौधा ज्यादा अच्छा होता और खूब बढ़ता उसे प्रार्थना में शाबाशी मिलती थी,पौधों को जीवित रखना एक प्रतियोगिता जैसा बन गया था,सब अपने अपने घरों से गोबर और मींगनी कि खाद लेकर आते थे और रोजाना अपने अपने पौधों कि निराई गुडाई करते थे.स्कोल शाम होते होते महक उठता था भिन्न भिन्न्प्रकर के फूलों कि खुसबू ठंडी रातों में दूर तक आती थी.खूब हरे भरे बाग में खूबसूरत माहोल में अब गांव वाले भी रातों को आकर बैठने लगे थे,अध्यापकों और गांव वालों का आपस में रोजाना शाम को घंटों तक मिलना होता था,और दिन में स्कूल न आ सकने वाले ग्रामीण रातों को स्कूल में आकर अपने बच्चों कि प्रगति जानने लगे.स्कूल का बाग चाहे पब्लिक पार्क जैसा नहीं बना होगा लेकिन पब्लिक पार्क कि वो दूब किसी भी प्रकार से मुझे पब्लिक पार्क से कम नहीं लगती.चाहे कैसे भी हो गांव का स्कूल के साथ एक प्रतिदिन का रिश्ता जरूर बन गया था.आज मैं सोचता हूँ कि कितनी मुश्किलों से तैयार हुआ था वो बाग और उसके असली मायने भी कितने खूबसूरत थे.जहाँ सैंकडों किलोमीटर तक कोई कस्बा या शहर नहीं था,जहाँ किसी भी प्रकार कि कोई सुविधा नहीं थी,जहाँ आने से लोग घबराते थे,उस दूर दराज के रेतीले धोरों वाले एक गांव में किस प्रकार जंगल में मंगल हो गया था,और इसके कितने शानदार मायने निकले?

अमरबेल......(६) ६ जून २००९

हेड मास्टर जी की डायरी मेरे हाथ लगी थी,मैनें उसमें से काफी कुछ उतार लिया था,कुछ अंश इस प्रकार हैं."११.९.७७ को शाला की स्थिति-शाला बाउंड्री नही के समान है,मामूली काँटों की बाड़ जो जगह जगह से टूटी हुई है,पशु रात को शाला के कमरों में घुस जाते हैं,मेन गेट नहीं है,मेनगेट की जगह दो लकड खडे करके बीच मेन काँटों का एक भीन्टका खडा कर दिया जाता है,शाला के तीन कमरों के पुराणी टाइप के दरवाजे हैं.एक हॉल,दो कमरे व बरामदा गिरने वाले हैं,समस्त कमरों में पानी चूता है,हॉल व दो कमरों के किवाड़ नहीं है,बारियाँ,अलमारियां भी नहीं है,दो कमरों के रोशनदान भी नहीं है,दो कमरों की छत गिरने वाली है,बाले(शहतीर)टूट चुके हैं,चोक टूट टूट कर निचे गिर रहे हैं,इस सूरत में बच्चों को कमरों में बिठाया जाना सम्भव नहीं है,ऐसा अहसास होता है की किसी भी मौसम के काबिल ये कमरे नहीं है,क्योंकि दरवाजों और खिड़कियों के नहीं होने से हवा,वर्षा,सर्दी आदि का बचाव किसी भी स्थिति में नहीं किया जा सकता."
इसी डायरी में मुझे कुछ स्लोगन लिखे भी मिले जिनका वजूद मुझे बहुत सामयिक लगता है ,और लगता है की कुछ बातें कभी पुराणी नहीं होती ।
आज हम हैं ,कल हमारी यादें होगी ,
जब हम न होंगे ,तब हमारी बातें होंगी ।
"ईर्ष्या और प्रतिशोध,मानव के दो बडे शत्रु हैं."
"मानव परिस्थितियों का दास है,मगर परिस्थितियाँ मानव द्वारा ही पैदा की जाती हैं.मानव परिस्थितियों पर काबू पा सकता है,परिस्थिति अनुकूल और प्रतिकूल होती ही रहती है.मानव में परिस्थितियों पर काबू पाने की हिम्मत होनी चाहिए"
"जिसकी अन्य पुरूष सर्वत्र प्रशंशा करते हैं वह निर्गुण होते हुए भी स्तुति करने योग्य हो जाता है,किंतु यदि कोई इन्द्र के समान ऐश्वर्यशाली होकर भी अपने मुख से अपनी बडाई करने लगे तो वह पुरूष निश्चय ही लोलुपता को प्राप्त हो जाता है ,अतःअच्छे व्यक्ति को चाहिए की वह अपने मुख से अपनी स्तुति न करे "
"जिस कार्य को आप करना चाहते हैं ,उसका फल देखलो ,यह भी देखलो कि क्या आप इसे कर सकते हैं?अगर फल अच्छा है तो तो कार्य चालू कर दो ,साहस में प्रतिभा ,शक्ति और जादू है ,सिर्फ़ काम के लिए जुट जाओ ,बाधाएं आयेंगी,पर कार्य पूर्ण होगा ,विश्वास द्रढ़ होना चाहिए "
कुछ इस प्रकार कि बातें डायरी में लिखी हुई है,बहुत कुछ और भी लिखा हुआ है लेकिन मुझे इस बात पर बहुत हैरानी है कि जब किसी भी प्रकार का कोई संसाधन नहीं था,तब वहाँ अधिकारी, नेता ,पत्रकार आदि कैसे पहुंच जाते थे और क्यों?१९७० से पहले के स्कूल का चित्रं देखें तो वो ये था कि दो मास्टर थे,बहुत कम आते थे और जब आते थे तो सारे दिन कोई पढाई नहीं होती थी,गांव का स्कूल की तरफ कोई लगाव नहीं था,बच्चे आते थे खेल कूद कर वापस चले जाते थे,कोई nirikshan करने wala होने का तो सवाल ही नहीं था.स्कूल की हालत ये थी की न तो पढाई का कोई माहोल था न पढ़ने वालों का.ऐसा स्कूल और देश के लिए नजीर बन जाए ऐसा किसी ने सोचा नहीं था.

Saturday, May 30, 2009

अमरबेल..........३० मई २००९ (५)

...प्रार्थना के बाद सबसे पहले पहली कक्षा अपने कमरे में भेजी जाती,ध्यान रखा जाता की कमरे में प्रवेश तक लाइन न टूटे,कमरे में भी सबके लिए स्थान नियत थे,कोन कहाँ बैठेगा?फ़िर दूसरी,तीसरी,और सभी क्लासें अपने अपने कमरों में जाती थी.हर एक क्लास के पीछे होते थे हाथ में हाजरी रजिस्टर लिए क्लास टीचर.हेड मास्टर जी तुंरत एक राउंड पूरी क्लास्सों का लगाते,कोन गेरहाजिर रहा पूछते और अपने ऑफिस में आ जाते.ऑफिस में आकर वे सभी अध्यापकों की टीचर डायरी पढ़ते,कौन अध्यापक आज क्या पढाएगा?क्या तयारी करके आए हैं? सबकी डायरियां देखने के बाद वे एक एक करकर क्लास में जाते,सबसे पीछे कुछ देर खडे रहते,कुछ अपनी डायरी में लिखते,फ़िर चुप चाप चले जाते। उनका ये रूटीन मैंने लगातार नो साल तक देखा,कभी भी वे अपने इस रूटीन से इधर उधर नहीं होते थे.चपरासी को निर्देश थे,जब तक हेड मास्टर जी नहीं कहें घन्टा(पीरीअड)नहीं बजेगा,पुराणी रेल लाइन का एक लम्बा सा टुकडा घंटी हुआ करता था,४० मिनट पूरे होते ही हेड मास्टर जी की निगाहों से चपरासी बजरंग की निगाहें मिलती थी और घन्टा घनघना उठता था,मजाल है एक सेकंड की भी देर हो जाए?आधी छुट्टी के बाद पांचवां,छटा,सातवां,और आठवां घंटा पॉँच पॉँच मिनट कम करके आखिरी २० मिनट का एक घन्टा खेल के लिए होता था.खेल का विशाल मैदान और उसमें वोलीबाल,फुटबाल,खो खो,कबड्डी,दोड़,लम्बी कूद,ऊंची कूद,रिंग,रस्सी कूद,और न जाने कोन कोन से खेल रोजाना खिलाये जाते थे.तोला राम जी की स्काउटिंग भी प्रत्येक सोमवार को नियत थी.हाँ एक बात मैं बताना भूल गया,एक सप्ताह में एक दिन एक क्लास की बारी पुस्तकालय और वाचनालय में जाने की होती थी,जहाँ पर पत्र पत्रिकाएं होती थी जैसे-साप्ताहिक हिंदुस्तान,धरमयुग,चंदामामा,लोटपोट,पराग,नंदन,कादम्बिनी,हंस,सरिता,मुक्ता,चंपक,आदि .इनके अलावा जो लाइब्ररी में कहानियों की किताबें लेने चाहते थे उन्हें इंचार्ज शिव कर्ण जी रजिस्टर में नाम लिख कर किताबें इस्स्यु कर देते थे.मुझे जो किताब सबसे अच्छी लगती थी वो "बाताँ री फुलवारी" थी ,उस समय तो लेखक का ध्यान नहीं देते थे लेकिन आज पता चला की वो तो विजय दान देथा थे जिनकी किताब पर पहेली फ़िल्म बनी.इतनी बडी लाइब्रेरी हजारों किताबें थी उसमें,पढ़ने का मजा आ जाता था.

अमरबेल......३० मई २००९ (४)

आठ कक्षाएं और इतने ही मास्टर,इतने ही कमरे,सबके सब सुंदर और साफ सुथरे,सुबह स्कूल खुलते ही जिनकी सफाई की बारी होती थी वो छात्र जल्दी आकर कमरों की सफाई करते थे,दरी पट्टियाँ करीने से बिछाते थे और बैठने की व्यवस्था को खूबसूरती से जमा लेते थे.ठीक टाइम पर प्रार्थना की पहली घंटी बजती थी,जिसके पॉँच मिनट बाद दूसरी घंटी बज जाती थी,इस पॉँच मिनट के वक्फे में पहली से आठवीं तक की आठ लाइनें सीधी सीधी लग चुकी होती थी,पीटीआई साहब प्रत्येक लाइन के सामने खडे होकर लाइन सीधी करवा देते थे,सबसे छोटा सबसे आगे,सबसे लम्बा सबसे पीछे,लड़कियों की लाइन भी इसी प्रकार अलग से लगती थी.पिन ड्राप साइलेंस,कोई खुसर फुसर नहीं,पीटीआई जी सावधान विश्राम करवाते,फ़िर जिनकी बारी होती थी वो दो लड़के और दो लड़कियां सामने के चोक पर आ जाते,प्रार्थना स्थिति का आदेश मिलता,सबके दोनों हाथ छाती के आगे आकर नफासत से जुड़ जाते,प्रार्थना शुरू करने का आदेश मिलता,आगे वाली टीम एक पंक्ति गाती,सभी उनका उसी लयऔर ताल में अनुसरण करते.प्रत्येक वर की अलग अलग प्रार्थना होती थी,मुझे कुछ प्रार्थनाओं की पहली पंक्तियाँ आज भी याद है,करीब ३४ साल बाद भी,वो इसलिए की केवल मैं ही नहीं उस समय पढ़ने वाले सभी बच्चों के दिल में वो स्कूल एकदम वैसा ही स्थापित होगा जैसा मेरे दिल दिमाग में है,क्योंकि वो स्कूल और वो गुरुजन थे ही ऐसे,जिन्हें जीवन भर विस्मृत नहीं किया जा सकता या यूँ कहें वे विस्मृत हो ही नहीं सकते.बहरहाल,प्रार्थना होती,फ़िर रास्ट्र गान ,फ़िर प्रतिज्ञा स्थिति में आकर प्रतिज्ञा बोली जाती."भारत मेरा देश है,समस्त भारतीय मेरे भाई बहन है...."इसके बाद सभी गुरुजन जो जिस जिस क्लास के क्लास टीचर होते थे वो एक एक करके सबके नाखून और दांत देखते,कपडे देखते की धुले हुए हैं या नहीं,जिनके नाखून बढे होते,दांत खराब होते या कपडे मैले होते,उन्हें अलग से चोकी पर एक लाइन में खडा कर लिया जाता और सबको उनके नाखून और दांत दिखाए जाते,यानि सार्वजनिक रूप से उन्हें उनकी कमियां बतादी जाती थी.इसके बाद हेड मास्टर जी,सामयिक बात बताते,फ़िर कोई न कोई प्रेरक प्रसंग बडे रोचक अंदाज में सुनाते.यहाँ में इस बात का विशेष उल्लेख करना जरूरी समझता हूँ की एक अध्यापक में बोलने की और प्रस्तुतिकरण की कला का होना बहुत जरूरी है,हेड मास्टर जी की इस शानदार कला का में आज भी कायल हूँ,उनकी कही गई एक एक बात आज भी न केवल मेरे बल्कि मैं समझता हूँ उनके प्रत्येक विद्यार्थी के दिल पर लिखी मिलेगी.बहुत कम लोग जानते होंगे "नाग कन्या मनसा ","वीर बालक रत्नसेन,""धन्ना भक्त","भक्त प्रह्लाद","राक्षस जिसकी जान तोते में थी","बालक रोहिताश ","पन्ना धाय " आदि अनेक कहानियाँ संक्षेप में प्रार्थना में ही सुना देते थे हेड मास्टर जी.

Friday, May 29, 2009

विप्लव.......



तेरे सीने में नहीं तो मेरे सीने में ही सही

हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए,

सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं

मेरी कोशिश है की ये सूरत बदलनी चाहिए

जिसके बिना कुछ भी नहीं.....


जिसके बिना मैं कुछ भी नहीं,मेरा वजूद कुछ भी नहीं,उसके जिक्र के बिना मेरा ब्लॉग कैसे पूरा हो सकता है?खुले अंतःकरण से मेरा सब कुछ उसको समर्पित,जिसने बिना किसी शिकवा शिकायत के अपने जीवन को मेरे नाम कर दिया और प्रतिफल में कभी कुछ नहीं चाहा.अपने जीवन की सफलता का श्रेय मैं खुले दिल से अपनी माँ के बाद यदि किसी को देता हूँ तो वह यही तस्वीर है,जो निरंतर,अनथक,मुझे सच्चाई बनाये हुए है,जिसके किसी भी पल का बदला में नहीं उतार सकता,इस सत्य को सार्वजनिक करके मैं गौरव महसूस करता हूँ.

अमरबेल ......२९ मई २००९ (३)

मैं आपको बताता हूँ कि वास्तव में और दिखावे में कितना और क्या फरक होता है?आज जब हम हर काम दिखावे के लिए करके अपने आप को तुर्रम खान समझ रहे हैं,वही इस स्कूल का उदाहरण देखिये,मेरा आँखों देखा सच है,दावा है कि आप इसे सुन कर रोमांचित हो उठेंगे.शायद सन १९७५ का कोई दिन था,दिन का स्कूल हुआ करता था,१२ बजे छुट्टी हो गई थी,हॉल के आगे वाले बरामदे के आगे एक बहुत बडी अमरबेल थी जिसकी जड़ें बहुत गहरी थी और उसका तना पेड़ के तने जैसा था,हेड मास्टर जी कई दिन से इस बेल को दुरुस्त करने कि बात कह रहे थे लेकिन शायद उन्हें समय नहीं मिला था,आखिरकार टाइम मिला और वो बनियान और तोलिया पहन कर उस बेल के निचे घुस गए उनके साथ सहयोगी अध्यापक भी थे.मैं वहीँ खड़ा था,देख रहा था,बहुत भारी भरकम बेल को उठाना बहुत जोर लगने वाला काम था,तीन चार बच्चे,हेड मास्टर जी और अन्य मास्टर जी जोर लगा कर भारी बेल को उठाने कि कोशिश कर रहे थे.पसीना चू रहा था,हाल बेहाल थे,मुझे ज्यों का त्यों याद है. एक पीले रंग कि जीप आई,दो अफसर उतरे,पूछा हेड मास्टर जी कहाँ है? अब हेड मास्टर जी कैसे निकले?उनके सर पर तो अमरबेल का भार था,तोलिया गिर चुका था,खली कच्छे में हेड मास्टर जी,बेल को छोडे तो बेल गिर जाए,तोलिया कौन संभाले? अफसर थे इंसपेक्टर ऑफ़ स्कूल देवी सिंह कछावा,उन्होंने अमरबेल के नीचे हलचल देखी वहां जा पहुंचे,देखा तो हेड मास्टर जी कच्छे में सर पर भारी बेल.दोनों किन्कर्तव्यविमूध हालत में.विद्वान इंसपेक्टर ने स्थिति समझी,जैसे तैसे हेड मास्टर जी को बेल के निचे से बाहर निकाला और गले से लगा लिया,उनकी ऑंखें भरी हुई थी,न जाने कौनसा भाव उनके भीतर उमडा पड़ रहा था,वो भाव विव्हल हो गए.मुझे याद है कछावा साहब पूरे दिन रुके थे और समूची स्कूल को गोर से देखा था,न जाने वो क्या क्या ढूंढ रहे थे.कहने को तो यह साधारण सी बात है लेकिन उस विद्वान अधिकारी ने एक स्कूल की जो परिभाषा उस दिन देखी ऐसी अन्यत्र कहीं मिल सकती है भला?

लगातार....२९ मई ०९ (२)

मैं कह रहा था की तत्कालीन हालातों में जब शिक्षा के प्रति रुझान कम था,उस संक्रमण काल में कोसों पैदल चल कर स्कूलों में पहुंचना एक बडी चुनोती था.जिस स्कूल की में बात कर रहा हूँ,वहां तक पहुंचना बहुत बडी बात थी,फ़िर भी वहां छात्र संख्या पांचसो से पार थी,मजे की बात ये कि पढ़ने वाले विद्यार्थी आसपास और दूर दराज के गांवों के थे,न कोई जिले कि सीमा थी न कोई तहसील की,कोई चुरू का तो कोई नागोर का,कोई हनुमानगढ़ का तो कोई सीकर का और आसपास के गांवों से आने वाले तो सेंकडों की तादाद में थे.पहली से लेकर आठवीं तक का ये स्कूल अपने आप में इतना व्यवस्थित और कामयाब था कि यहाँ के अनुशासन और कायदों की लोग क़समें खाया करते थे.पहली से लेकर आठवीं तक हर एक क्लास को हेड मास्टर जी ख़ुद रोजाना जांचते थे,मुझे याद है जब कोई मास्टर जी क्लास को पढा रहे होते थे तो अनेक बार हेड मास्टर जी ख़ुद आकर पिछली तरफ़ बैठ जाते थे और मास्टर जी को पढाते हुए देखते थे। उस समय तो इसका कोई ज्ञान मुझे नहीं था लेकिन आज महसूस करता हूँ की वो ऐसा क्यों किया करते थे.बहरहाल नियमित तोर पर एक भी पढाई का पल खोये बिना चलने वाला वो स्कूल,पढाई के अलावा भी बहुत कुछ करवाता था,संस्कृतिक कार्यक्रमों में तो स्कूल राज्य में अपना विशेष स्थान रखता था,वहीँ व्रिक्षारोपन संचायिका,अल्पबचत,प्रौढ़ शिक्षा,खेलकूद,स्काउटिंग सहित अनेक सह पाठ्येतर गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र था.कितने अचम्भे की बात है कि उस काल में जब स्कूल भवनों के लिए किसी प्रकार कि सरकारी सुविधाएँ नहीं थी तब भी स्कूल कि शानदार बिल्डिंग में दस से अधिक कमरे थे और सब जनसहयोग से निर्मित थे,एक बहुत बडा हॉल,स्टोर,विशाल बगीचा,चारोंतरफ काँटों कि ऊंची ऊंची बाड़,करीब दस बीघा जमीन का कैम्पस,आज भी सुंदर नक्शा नयनाभिराम लगता है,जब आँखों के सामने आ जाता है।
मैं कहना चाहता हूँ कि जब किसी गांव में सिवाय स्कूल के कोई और संस्था ही नहीं हो और स्कूल समय के बाद करने के लिए कोई काम नहीं हो तो वहां टीचर्स क्या करें? इस गांव के टीचर्स के साथ यही दिक्कत थी कि खाली समय में क्या करें? इसका तरीका हेड मास्टर जी ने ये निकाल रखा था कि स्कूल के बाद भी पढ़ाई का काम जारी रखा,बच्चे छुट्टी के बाद घर जाते और खाना वाना खा कर वापस स्कूल आ जाते.

Thursday, May 28, 2009

लगातार ..............

सत्तर के दशक में जब साधन संसाधन न के बराबर थे उस समय में जबरदस्त शिक्षण को माकूल अंदाज दिया जाना आज मुझे किसी आस्चर्य से कम नहीं लगता.उस गांव में जब कोई नया अध्यापक आता था तो वो जीवन का सबसे कठिन समय मान कर अपने दिन गिन गिन कर बिताने की कल्पना किया करता था,लेकिन यदि वो कम से कम एक सप्ताह इस गांव में टिक जाता था तो फ़िर जाने का नाम नहीं लेता था,क्योंकि तब वो जान लेता था की मजा किसे कहते हैं.घर में दूध दही की भरपूर आवक,चूल्हे में जलने के लिए छात्रों द्वारा रोजाना सर पर रख कर लाई जाने वाली लकडियाँ,बाल्टियों और घडों से भरपूर पानी,और न जाने क्या क्या सुविधाएँ उस गांव में उपलब्ध थी.मुझे याद है चांदनी रातों में खूबसूरत धोरों पर खेलते थे बच्चे और उनके अध्यापक,ग्रामीण भी साथ देने आते थे और हर दडा,धोलियो भाटो,चुना घाटी,घुत्ता,रतन तलाई आदि अनेक देशी खेल देर रात तक चलते थे.मैं आज महसूस करता हूँ की किस कदर लोग आपस में घनिष्ट हो जाते थे,कोई अन्तर नहीं रहता .शेष बहुत है .......

शेष..........

बात चल रही थी शिक्षण व्यवस्था की,मैंने ये बताया की किस तरह रेगिस्तान के रेतीले इलाके के एक गांव के स्कूल में हेड मास्टर जी बीकानेर के पब्लिक पार्क के चपरासी को पच्चीस पैसे देकर दूब की बोरी भरवा कर लाये थे वो दूब कितनी खुशी के साथ स्कूल के बच्चों और अध्यापकों ने लगाई थीजहाँ तक मुझे याद है दोनों भागों में काफी दूर तक खुदाई करके एक दिन में ही दूब लगा दी गईदूब में फूलों के पोधे लगाये गए,चारों तरफ़ मेहंदी के पोधों की बाड़ लगाई गई,करीब एक महीने में दूब खूब हो गई,हरियाली ही हरियाली,महकते कनेर के पुष्प,गेंदे,चमेली,रात की रानी,सूरजमुखी सहित बहुत कुछ थोड़े ही समय में विकसित हो गयामैं इतनी लम्बी चोडी भूमिका क्यों बाँध रहा हूँ ये मैं भी नहीं जानता लेकिन इतना जानता हूँ की जो कुछ मैं आपको बताना चाहता हूँ उसकी गंभीरता को जानने के लिए ये भूमिका बहुत जरूरी हैमैं यह बताना चाहता हूँ की किस प्रकार सीमित संसाधनों के बावजूद मजबूत इच्छाशक्ति से जंगल में मंगल किए जा सकते हैं,कैसे उजाड़ और सुनसान गांवों में रोनक पैदा की जा सकती है,कैसे नीरस और उबाऊ शिक्षण को रोचक और सरस बनाया जा सकता है,कैसे समूचे समाज और पूरे गांव को स्कूल से जोड़ा जा सकता हैआप अचम्भा करेंगे,मैं कहता हूँ की नालंदा और तक्षशिला क्या चीज रहे होंगे,उनसे भी बहुत बेहतर व्यवस्था आपको दिखा देगा मेरा ये गांव,जिसको मेरे बचपन ने खूब जिया है,जिसकी सुरभि बहुत दूर दूर तक फैली और जिसे देखने न जाने कहाँ कहाँ से लोग आते रहे.

Monday, May 4, 2009

हमारी शिक्षा व्यवस्था - दो दशक का भयावह बदलाव

मुझे आज भी याद है सन १९७५ का वो दिन जब मैं पांचवीं कक्षा में पढता था.१० साल की उम्र रही होगी मेरी.उस समय स्कूल आज की तरह टाइम में बंधे हुए नहीं होते थे.अध्यापक लोग पूरे समय के लिए स्कूलों में होते थे क्यों की दूर दराज के गांवों में आने जाने की सुविधा नहीं होती थी और गुरुजन हमेशा स्कूलों में ही रहकर सरे दिन पढाया करते थे.राजस्थान के बीकानेर जिले के बहुत रेगिस्तानी इलाके के एक गांव की बात कर रहा हूँ में.मुझे याद है उस गांव तक जाने के लिए १७ किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था.साधन के नाम पर पंडित बलराम जी का एक ऊँट गाडा हुआ करता था जिस पर फटी हुई बोरियों की छत लगा कर और फटा पुराना तिरपाल बिछा कर वो सवारियों को स्टेशन तक पहुँचाया करते थे.जिसको जाना होता वो सुबह सुबह ही उनके यहाँ जाकर अपनी जगह बुक करवा दे तो ठीक नहीं तो फ़िर पैदल जाओ या अगले दिन.बहरहाल मैं विषयांतर कर गया.हेडमास्टर जी ने उस रेगिस्तानी गांव के स्कूल में पेड़ पोधों और बगीचों की हरियाली बड़ी मुश्किलों से कायम कर रखी थी.मुझे याद है कोई पोधा अगर जरा सा कुम्हला जाता था तो हेडमास्टर जी भी खुम्हला जाते थे,उदास हो जाते थे.मुझे ये भी याद है की किस तरह वो बीकानेर के पब्लिक पार्क से एक बोरी घास की भर कर लाये थे और फ़िर प्रार्थना के बाद अपने प्रवचन में बताया था की इस घास को लगना है और हरा भरा रखना है क्यों की पब्लिक पार्क के चोकीदार ने यह बोरी भरने कर पूरे पचीस पैसे लिए हैं.

क्या करें------........------............ ?

अध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक सचाइयों के बीच झूलता मेरा मन कभी कभी बहुत विचलित और विकल हो उठता है.समझ में नहीं आता कि क्या करूं? बहुत तेजी से बदल गया है सब कुछ-संस्कार,मान्यताएं,मर्यादाएं और अभिलाषाएं.मैं विगत बीस साल के इन परिवर्तनों को देखकर अनिर्णय कि स्थिति मैं हूँ.मुझे अब कहीं नजर नहीं आते वो नन्हें नन्हें बच्चे जो गर्मियों कि छुट्टियों से बहुत दिन पहले ही मां के साथ ननिहाल जाने कि तैयारिओं मैं बडे चाव से जुट जाते थे.उनको न तो किसी हिल स्टेशन पर घूमने जाने कि जिद होती थी न ही वो कहीं और जाने कि सोचते थे,आज कोई बच्चा नानी के पास जाकर उनके संस्कार लेने को राजी नहीं है,पुरानी और आउटडेट हो गई है नानी दादी.छुटियाँ शुरू होने के बाद अपने संस्कारों को गति देने के लिए अपने परिवार के साथ बीतने वाला वो डेढ़ माह का समय असल मैं एक मजबूत नैतिक शिक्षा देने वाला आयोजन होता था.एनी वे -मेरा तात्पर्य यह है कि वर्तमान बहुत बदल गया है लेकिन सवाल यह है कि यह बदलता वर्तमान किस प्रकार के भविष्य कि नींव रखने जा रहा है ?