Monday, May 4, 2009

क्या करें------........------............ ?

अध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक सचाइयों के बीच झूलता मेरा मन कभी कभी बहुत विचलित और विकल हो उठता है.समझ में नहीं आता कि क्या करूं? बहुत तेजी से बदल गया है सब कुछ-संस्कार,मान्यताएं,मर्यादाएं और अभिलाषाएं.मैं विगत बीस साल के इन परिवर्तनों को देखकर अनिर्णय कि स्थिति मैं हूँ.मुझे अब कहीं नजर नहीं आते वो नन्हें नन्हें बच्चे जो गर्मियों कि छुट्टियों से बहुत दिन पहले ही मां के साथ ननिहाल जाने कि तैयारिओं मैं बडे चाव से जुट जाते थे.उनको न तो किसी हिल स्टेशन पर घूमने जाने कि जिद होती थी न ही वो कहीं और जाने कि सोचते थे,आज कोई बच्चा नानी के पास जाकर उनके संस्कार लेने को राजी नहीं है,पुरानी और आउटडेट हो गई है नानी दादी.छुटियाँ शुरू होने के बाद अपने संस्कारों को गति देने के लिए अपने परिवार के साथ बीतने वाला वो डेढ़ माह का समय असल मैं एक मजबूत नैतिक शिक्षा देने वाला आयोजन होता था.एनी वे -मेरा तात्पर्य यह है कि वर्तमान बहुत बदल गया है लेकिन सवाल यह है कि यह बदलता वर्तमान किस प्रकार के भविष्य कि नींव रखने जा रहा है ?

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