वही मैं, वही तुम, वही मकान, वही दिवाली
वही चहलपहल सब कुछ वही ,वही रात काली
चरों तरफ़ शोर वही,वही दीपो की आभा निराली
सन्नाटों को पछाडती,मनमोहक वही है हरियाली
सभी घरों मैं सदा की तरह खुशियों के आलम मैं
रंगीन सुर्ख रंगों से खूबसूरत देखो सज रही रंगोली!!!
रंगोली सजाओ खुशियाँ मनाओ हर पल आनंद करो
पर उनको कभी न भूलो जिनके दम से सजी है रंगोली
जिनके कल से हमारा आज है उन्हें पुरजोर याद करो
तब ही सार्थक होगी दीवाली की ये रंगीन रंगोली !!
Monday, October 27, 2008
ये दीपावली है
माँ तेरे बिना ये कैसी दीपावली?
इस बार कुछ अलग सी दीपावली है,मन कुछ अलग सी अनुभूति से अभिभूत है,
ऐसा लगता है कहीं कोई रिक्तिका सी है
किसी का अभाव भीतर से कचोटता है
समवेत स्वर कुछ दबे दबे से हैं
मन के झिलमिल दीप बुझे बुझे हैं
आशाओं के आख्यानों पर झीना परदा है
मन की उमंगों को कोई जैसे दबोचता है
ममतामई हाथों का सुहाना स्पर्श
उन आँखों से छलकता निस्पृह आशीष
दीपावली पर निर्झर बहता प्रेम स्रोत
अनजाने मैं ही सही मुझे अब भी सहेजता है
मैं सिर्फ़ तेरे आशीर्वाद का फल हूँ
तेरी वजह से तेरे अतीत का कल हूँ
तूं चाहे कहीं भी हो मेरे आसपास है
फ़िर भी इस दिवाली पर बहुत विकल हूँ !!!
कार्तिक कृष्ण अमावश्या,२०६५!दीपावली २००८!२८-१०-२००८
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