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Tuesday, April 16, 2024
शिक्षा कैसी हो
शिक्षा मानव को पशु से इंसान बनाती है,उसमें विकास की परिस्थिति को पैदा करती है लेकिन इस तथ्य को समझना वस्तुत बहुत गहन समझ को रेखांकित करता है।शिक्षा को आत्मसात करके इसकी समाज के लिए उपयोगिता स्थापित करना अपने आप में परोपकार के साथ जुड़ा सच है।चुनिंदा तीन प्रतिशत पढ़े लिखे लोगों के ज़िम्मे शेष सतानवें प्रतिशत लोगों का जीवन हो तो ऐसे में तीन प्रतिशत लोगों की जवाबदेही बहुत अधिक बढ़ जाती है।शिक्षा का मूल यह है कि वह व्यक्ति को स्वयं के लिये कम और दूसरों के लिए अधिक जीने के लिए तैयार करती है।आज से पचास साल पहले तक के माहौल में यही सच था।आज जहां शिक्षा का मूल्यांकन स्वयं के उत्थान और अपने तक ही सीमित है वहीं कालांतर में इसका तात्पर्य समाज के सर्वांगीण विकास से था।असल में नालंदा और तक्षशिला में जो तत्कालीन शैक्षिक परिवेश था वो वास्तव में अनुकरणीय था क्योंकि वहाँ सही मायनों में नागरिक निर्माण का कार्य किया जाता था।१९७० के दशक में चाहे शिक्षा का प्रसार बहुत अधिक न था लेकिन शिक्षा की ज़रूरत को शिद्दत से महसूस कर के असाक्षर लोग भी इसके वांगमय को समझते थे।
बीकानेर ज़िले में उस काल में संभवतः आधा दर्जन से अधिक माध्यमिक और इतने ही उच्च प्राथमिक विद्यालय थे जिनमें तीस हज़ार वर्ग किलोमीटर में पसरे इस ज़िले के विद्यार्थी और आसपास के ज़िलों के विद्यार्थी पढ़ने के लिए आते थे।जिस स्कूल के लिए ये भूमिका बनाई गई है वो उच्च प्राथमिक विद्यालय शेखसर उस समय में शिक्षा का अभूतपूर्व केंद्र बना हुआ था।संसाधनों की पर्याप्त विपन्नता के बावजूद इस गाँव में शिक्षा के प्रति अनूठा अनुराग था यही कारण था कि इस गाँव में मिडिल स्कूल बनाया गया।सही कहें तो तत्कालीन समय में स्कूलों की व्यवस्था ग्रामीणों की रुचि और उनके सहयोग के दम पर निर्भर करती थी।हालाँकि सरकारी नौकरी करने के क्रेज़ को लेकर उस समय स्कूलों में पढ़ाई और पाठ्यक्रम निर्मित नहीं होते थे,स्कूलों में आदर्श इंसान निर्माण के पाठ्यक्रम के साथ साथ बालकों के सर्वांगीण विकास की बानगी तय होती थी।शेखसर हालाँकि ज़िला मुख्यालय से बहुत दूर और संसाधन विहीन गाँव था लेकिन यहाँ के लोगों की शिक्षा के प्रति ललक और रुचि देख कर यह कहा जा सकता है कि यहाँ के लोग सहाय मानव निर्माण के प्रति बेहद सजग है।ऐसा एनी गाँवों में नहीं देखा सुना गया,इसका क्या कारण रहा हो सकता है इसका विश्लेषण करें तो यह सामने आता है कि यह गाँव चूँकि राजाओं महाराजाओं के संपर्क में था और यहाँ के ज़मींदार तत्कालीन राजाओं के साथ मिलते जुलते रहते थे इस कारण इनका ज्ञान वर्धन होता रहता था।
शेखसर के मिडल स्कूल में शेखसर गाँव के विद्यार्थी तो आवश्यक रूप से अध्ययन करते ही थे जबकि ज़िले के अन्य इलाक़ों से आने वाले छात्र यहाँ मनोयोग से पढ़ते थे।इस विद्यालय ने ज़िलों की सीमाओं को लांघ कर जो माहौल क़ायम किया वो किसी आश्चर्य से कम नहीं हो सकता।श्री गंगानगर,चूरु,जोधपुर,जैसलमेर आदि ज़िलों के निकटवर्ती गाँवों से छात्र यहाँ इसलिए अध्ययन करने के लिए आते थे कि यहाँ असल में शिक्षा का वास्तविक परिवेश क़ायम था।स्कूलों में कक्षा संचालन,प्रार्थना सभा,सह पाठ्येतर गतिविधियों,सांस्कृतिक आयोजन,सामाजिक सरोकार,अध्यापक अभिभावक परिषदें सहित वो सब कुछ यहाँ उपलब्ध था जो असल में शिक्षण संस्थानों की प्राथमिक अवश्यकता होती है।
इस विद्यालय में शिक्षकों के अभाव की वजह यह थी कि इस गाँव तक पहुँचने के लिये किसी भी प्रकार का कोई साधन उपलब्ध नहीं था इसलिए लोग यहाँ आने में बेहद हिचकिचाते थे।इस विद्यालय में व्यवस्थित माहौल के कारण विद्यार्थियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही थी लेकिन शिक्षकों की कमी के कारण शैक्षिक माहौल निर्मित नहीं हो पा रहा था।उस समय भी इस स्कूल में अध्यापाक अभिभावक समिति बहुत ज़िम्मेदारी के साथ कार्यरत थी।गाँव में चाहे कितनी भी पार्टी पॉलिटिक्स रही होगी लेकिन स्कूल के मामले में समूचा गाँव सदैव एक जाजम पर होता था।
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