Friday, April 19, 2024

मोबाइल रिचार्ज

आज १९ अप्रैल है,पापा के चले जाने के बाद २३ वाँदिन।पापा के मोबाइल का रिचार्ज १३ तारीख़ को ख़त्म होता थालेकिन वो १० तारीख़ से ही मुझे याद दिलाना शुरू कर देते थे कि उनका मोबाइल रिचार्ज करना नहीं भूल जाऊँ।आज सहसा ध्यान आया कि पापा के मोबाइल को रिचार्ज हुए बिना छह दिन बीत गये है।बहुत भारी हो गया मेरा मन,इंसान कैसा है?इतने से दिनों में ही स्मृति लोप?मन में कसक उठ खड़ी हुई,वेदना व्याप्त हो गई सचमुच पापा को तीन चार बार याद दिलाना पड़ता था कि महेंद्र मेरा मोबाइल रिचार्ज करना मत भूल जाना।अपने मोबाइल रिचार्ज के लिए,अब ये शब्द मेरे कानों में कभी नहीं पड़ेंगे?महेंद्र,मेरा मोबाईल रीचार्ज करना मत भूल जाना।उनके अनमोल दस्तावेज के पाने पलटते हुए उनकी ऐतिहासिक स्मृतियाँ ताजाहो रही हैं।मेरे पापा का व्यक्तित्व अत्यंत विशाल था, उनके जीवन का पूरा हिस्सा इतना सुव्यवस्थित था।जब से जन्म लिया तब से लेकर ५८ वर्ष की उम्र तक पापा के साथ रहा,मुझे हमेशां यही लगा कि मैं उनके साथ रहता हूँ,उनके घर में रहता हूँ,मेरे घर मैं जो भी कुछ सामान है सब उनका है,मेरे घर में जीतने भी बर्तन हैं उन सब पर नाम मेरे पापा का है,मेरे घर की नेम प्लेट पर नाम मेरे पापा का है,ये घर मेरे नाम से नहीं उनके नाम से जाना जाता है,कॉलोनी के और बाहर के सभी लोग इसे मेरा घर नहीं जानते,सब इसको मेरे पापा के घर के नाम से जानते हैं,वे इस घर के सर्वोच्च मुखिया थे,उनकी एक आवाज से उनके एक आदेश से मेरे घर में सभी के हलचल मच जाती थी।आज उनका मोबाइल रिचार्ज के लिए नहीं कहता,आज उनका मोबाइल ख़ामोश भी है,अपनी डायरी में से देख देख कर अपने दोस्तों रिश्तेदारों को फ़ोन करके तेज आवाज में हाल चाल जानने के उनके चिर परिचित अन्दाज़ से हॉल गूंजता रहता था,आज सब कुछ शांत है,ख़ामोश है,घर का जर्रा जर्रा अजीब सी खामोशी का आवरण ओढ़े हुए है।घर में जब भी कोई आता,डोर बेल बजाता तो मुझे पक्का यक़ीन होता था कि अवश्य कोई ना कोई उनसे मिलने के लिये ही आये होंगे, और होता भी यही,आने वाले उनके लिए ही होते थे।बहुत बार तो पापा को लोगों को ये बताना पड़ता था कि ये महेंद्र, है छीटे वाला।मैंने कभी सपने में भी ये महसूस नहीं किया था कि मुझे उनके सानिध्य के बिना भी रहना होगा,अब जब वो नहीं है तो उनकी अनुपस्थिति को अभिव्यक्त करने के लिए शब्दों का अभाव है,किन शब्दों में बयान करूँ कि उनके बिना क्या है?कैसा है?दिल के भीतर एक ज्वार उठता है ,गिरता है,अपरिभाषित इस वेदना को किसी के सामने व्यक्त भी करूँ तो कलम ख़ामोश है,शब्द गूँगे है,पहली बार इतना असहाय महसूस करता हूँ किसको कहूँ,क्या कहूँ?क्योंकि जो बिना कहे ही समझ जाते थे वो तो अब हैं नहीं।पापा बहुत चुप चुप रहते थे,अनावश्यक बोलने की उनकी आदत नहीं थी,इसलिए उनकी आवश्यकता और भावना को बिना कहे ही समझ जाना होता था,उनके हाव भाव,उनके समय की पाबंदी आदि ऐसे तथ्य थे जिनके कारण उनके प्रति कुछ भी जानना मुश्किल नहीं रहा।
                आज इस प्लेटफ़ार्म पर मेरा यह कहने का मन है कि हम सब लोग इस वास्तविकता को जान लें कि यहाँ हम में से कोई भी स्थाई नहीं है सभी अस्थाई हैं और यहाँ हम केवल मात्र एक निश्चित समय के लिए हैं,ऐसे में हमें उतना ही करना चाहिए जितना ज़रूरी है,अन्यथा हम प्रकृति के ख़िलाफ़ चल रहे हैं।मेरे पापा का जाना मुझे बहुत से मायनों को समझा गया है हालाँकि मुझे अब लगता है कि पापा भी मुझे यही समझाना चाह रहे थे लेकिन शायद वो बहुत स्पष्ट नहीं समझा सके।मेरे पापा का जीवन अपने आपमें एक विस्तृत शब्दकोश है,आज मैं जब ५८ साल है की उम्र में आ कर अपने पापा के समूचे जीवन पर दृष्टिपात करता हूँ तो मेरी सामने चलचित्र की तरह एक एक बात घूम जाती है।मैंने अपने पूरे ५८ साल में पापा से अलग समय कभी नहीं बिताया।मेरे पापा मेरे पिता तो थे ही लेकिन वो मेरे अध्यापक,मेरे गुरु और मेरे हेड मास्टर भी रहे थे।मेरे जीवन की शुरुआत मेरी माँ और पापा के साथ हुई उन्होंने मुझे सहज ही अप्रत्यक्ष रूप से जो दे दिया उसका मूल्य मुझे आज समझ आ रहा है,,सबकुछ इतना अनमोल कि कोई परिभाषा नहीं की जा सकती।मुझे इस बात की पीड़ा है कि जब हम अपने आपको अभिव्यक्त कर सकते हैं,सब कुछ अच्छे से बता सकते हैं तो फिर ऐसा करते क्यों नहीं हैं?मेरे पापा से बढ़ कर शानदार अभिव्यक्ति कर सकने वाला इंसान मिलना दुर्लभ है फिर भी उन्होनें बहुत कुछ समय पर क्यों छोड़ दिया?लर्निंग बाई डूइंग का उनका आदर्श वाक्य सबके लिए समान रहा,उनका मानना था कि जो करके सीखा जा सकता है वो अन्यत्र कहीं से नहीं सीखा जा सकता।इस सबके बावजूद उन्हों वो सब कुछ मेरे भीतर क्यों नहीं उँड़ेल दिया जो उनको कहना था,समझाना था।पचास के दशक में जब उनको कॉपरेटिव इंस्पेक्टर की ट्रेनिंग के लिए उदयपुर भेजा गया तब मात्र छह महीने में ही वहाँ से परेशान हो कर वापस गाँव की शुद्ध आबोहवा में आकर उन्होंने यह जता दिया था कि उनके,मन में कुछ और ही करने का माद्दा है।तब तत्कालीन काल में उनको अध्यापक लगा दिया गया और इससे वे बेहद संतुष्ट भी हुए क्योंकि उनके मन में नवाचार करने की भावनायें हिलोरे ले रही थी जिनको अध्यापक बन कर  ही शांत किया जा सकता था।उस समय उनके मन में यह था कि शिक्षा मनुष्य को पशुता से इंसानियत की और ले जाती है,उनके मन में उस समय ये बात किस वजह से कूट कूट कर भरी गई,ज्ञात नहीं।उनका पदस्थापन बीकानेर शहर की स्कूल पाबू पाठशाला में किया गया,जहां उन्होंने अध्ययन अध्यापन का कार्य तो किया लेकिन उनके मन मे चल रहे झंझावातों को मुक़ाम मिलता नज़र नहीं आया।उनको लगा कि पुस्तक ले कर बच्चों को कोई बात बताना या सिखाना न्यायसंगत नहीं हो सकता क्योंकि लिखित बातों का देश काल और परिस्थितियों से तालमेल हो यह संभव नज़र नहीं आता। जिस शिक्षक ने अपने विद्यार्थी जीवन में बेहद तकलीफ़ देख कर विद्याध्ययन किया हो,रोज़ाना बीसियों किलोमीटर पैदल चल कर पढ़ना सीखा हो,वो विद्यार्थी सही मायनों में शिक्षा के सही मायने जान जाता है।उनको लगा कि ये शहर की पाबू पाठशाला उनका मंतव्य नहीं है उनकी मंज़िल नहीं हैं।आईओएस, यह नाम था तत्कलीन ज़िला शिक्षा कार्यालय का जिसे इंस्पेक्टर ऑफ़ स्कूल्स कहा जाता था।उस समय प्रारंभिक और माध्यमिक का पृथक अस्तित्व नहीं होता था और आईओएस ही समूचे ज़िले में शिक्षा प्रबंध के लिए स्वतंत्र होते थे,किसी भी प्रकार का कोई भी निर्णय लेने की समग्र स्वतंत्रता के साथ आईओएस ऑफिस कार्य करता था।ऐसे आईओएस ऑफिस में जा कर उन्होंने कहा कि उनका पदस्थापन किसी भी गाँव में कर दिया जाये।आईओएस ने आश्चर्य से इसका कारण जानना चाहा लेकिन वो अपने हिक्स से इतना ही क्लीयर कर सके कि उनको अपनी योग्यता के लिहाज़ से गाँव में ही शिक्षा की ज़्यादा आवश्यकता महसूस होती है क्योंकि अपने स्वयं के अध्ययन के दौरान जो उन्होंने महसूस किया,जाना उसको एलोबोरेट करना है,क्या,क्यों और कैसे ये भविष्य के गर्भ में है।आईओएस भी चूँकि मूलत: शिक्षक ही थे, उनको ये तो अवश्य लगा कि शहर के आराम से गाँव की दुशवार हालत में सामान्यत कोई  नहीं जाना चाहता,कुछ तो बात है, लेकिन शिक्षक के निर्लिप्त आग्रह और आँखों में प्रबल आत्मविश्वास देख कर  उन्होंने भावनाओं  को समझा और गाँव की आबोहवा में स्वतंत्र विचरण के लिए उनका पदस्थापन गाँव में ही कर दिया। 

Tuesday, April 16, 2024

शिक्षा कैसी हो

शिक्षा मानव को पशु से इंसान बनाती है,उसमें विकास की परिस्थिति को पैदा करती है लेकिन इस तथ्य को समझना वस्तुत बहुत गहन समझ को रेखांकित करता है।शिक्षा को आत्मसात करके इसकी समाज के लिए उपयोगिता स्थापित करना अपने आप में परोपकार के साथ जुड़ा सच है।चुनिंदा तीन प्रतिशत पढ़े लिखे लोगों के ज़िम्मे शेष सतानवें प्रतिशत लोगों का जीवन हो तो ऐसे में तीन प्रतिशत लोगों की जवाबदेही बहुत अधिक बढ़ जाती है।शिक्षा का मूल यह है कि वह व्यक्ति को स्वयं के लिये कम और दूसरों के लिए अधिक जीने के लिए तैयार करती है।आज से पचास साल पहले तक के माहौल में यही सच था।आज जहां शिक्षा का मूल्यांकन स्वयं के उत्थान और अपने तक ही सीमित है वहीं कालांतर में इसका तात्पर्य समाज के सर्वांगीण विकास से था।असल में नालंदा और तक्षशिला में जो तत्कालीन शैक्षिक परिवेश था वो वास्तव में अनुकरणीय था क्योंकि वहाँ सही मायनों में नागरिक निर्माण का कार्य किया जाता था।१९७० के दशक में चाहे शिक्षा का प्रसार बहुत अधिक न था लेकिन शिक्षा की ज़रूरत को शिद्दत से महसूस कर के असाक्षर लोग भी इसके वांगमय को समझते थे।

बीकानेर ज़िले में उस काल में संभवतः आधा दर्जन से अधिक माध्यमिक और इतने ही उच्च प्राथमिक विद्यालय थे जिनमें तीस हज़ार वर्ग किलोमीटर में पसरे इस ज़िले के विद्यार्थी और आसपास के ज़िलों के विद्यार्थी पढ़ने के लिए आते थे।जिस स्कूल के लिए ये भूमिका बनाई गई है वो उच्च प्राथमिक विद्यालय शेखसर उस समय में शिक्षा का अभूतपूर्व केंद्र बना हुआ था।संसाधनों की पर्याप्त विपन्नता के बावजूद इस गाँव में  शिक्षा के प्रति अनूठा अनुराग था यही कारण था कि इस गाँव में मिडिल स्कूल बनाया गया।सही कहें तो तत्कालीन समय में स्कूलों की व्यवस्था ग्रामीणों की रुचि और उनके  सहयोग के दम पर निर्भर करती थी।हालाँकि सरकारी नौकरी करने के क्रेज़ को लेकर उस समय स्कूलों में पढ़ाई और पाठ्यक्रम निर्मित नहीं होते थे,स्कूलों में आदर्श इंसान निर्माण के पाठ्यक्रम के साथ साथ बालकों के सर्वांगीण विकास की बानगी तय होती थी।शेखसर हालाँकि ज़िला मुख्यालय से बहुत दूर और संसाधन विहीन गाँव था लेकिन यहाँ के लोगों की शिक्षा के प्रति ललक और रुचि देख कर यह कहा जा सकता है कि यहाँ के लोग सहाय मानव निर्माण के प्रति बेहद सजग है।ऐसा एनी गाँवों में नहीं देखा सुना गया,इसका क्या कारण रहा हो सकता है इसका विश्लेषण करें तो यह सामने आता है कि यह गाँव चूँकि राजाओं महाराजाओं के संपर्क में था और यहाँ के ज़मींदार तत्कालीन  राजाओं के साथ मिलते जुलते रहते थे इस कारण इनका ज्ञान वर्धन होता रहता था। 

शेखसर के मिडल स्कूल में शेखसर गाँव के विद्यार्थी तो आवश्यक रूप से अध्ययन करते ही थे जबकि ज़िले के अन्य इलाक़ों से आने वाले छात्र यहाँ मनोयोग से पढ़ते थे।इस विद्यालय ने ज़िलों की सीमाओं को लांघ कर जो माहौल क़ायम किया वो किसी आश्चर्य से कम नहीं हो सकता।श्री गंगानगर,चूरु,जोधपुर,जैसलमेर आदि ज़िलों के निकटवर्ती गाँवों से छात्र यहाँ इसलिए अध्ययन करने के लिए आते थे कि यहाँ असल में शिक्षा का वास्तविक परिवेश क़ायम था।स्कूलों में कक्षा संचालन,प्रार्थना सभा,सह पाठ्येतर गतिविधियों,सांस्कृतिक आयोजन,सामाजिक सरोकार,अध्यापक अभिभावक परिषदें सहित वो सब कुछ यहाँ उपलब्ध था जो असल में शिक्षण संस्थानों की प्राथमिक अवश्यकता होती है।

इस विद्यालय में शिक्षकों के अभाव की वजह यह थी कि इस गाँव तक पहुँचने के लिये किसी भी प्रकार का कोई साधन उपलब्ध नहीं था इसलिए लोग यहाँ आने में बेहद हिचकिचाते थे।इस विद्यालय में व्यवस्थित माहौल के कारण विद्यार्थियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही थी लेकिन शिक्षकों की कमी के कारण शैक्षिक माहौल निर्मित नहीं हो पा रहा था।उस समय भी इस स्कूल में अध्यापाक अभिभावक समिति बहुत ज़िम्मेदारी के साथ कार्यरत थी।गाँव में चाहे कितनी भी पार्टी पॉलिटिक्स रही होगी लेकिन स्कूल के मामले में समूचा गाँव सदैव एक जाजम पर होता था।