आठ कक्षाएं और इतने ही मास्टर,इतने ही कमरे,सबके सब सुंदर और साफ सुथरे,सुबह स्कूल खुलते ही जिनकी सफाई की बारी होती थी वो छात्र जल्दी आकर कमरों की सफाई करते थे,दरी पट्टियाँ करीने से बिछाते थे और बैठने की व्यवस्था को खूबसूरती से जमा लेते थे.ठीक टाइम पर प्रार्थना की पहली घंटी बजती थी,जिसके पॉँच मिनट बाद दूसरी घंटी बज जाती थी,इस पॉँच मिनट के वक्फे में पहली से आठवीं तक की आठ लाइनें सीधी सीधी लग चुकी होती थी,पीटीआई साहब प्रत्येक लाइन के सामने खडे होकर लाइन सीधी करवा देते थे,सबसे छोटा सबसे आगे,सबसे लम्बा सबसे पीछे,लड़कियों की लाइन भी इसी प्रकार अलग से लगती थी.पिन ड्राप साइलेंस,कोई खुसर फुसर नहीं,पीटीआई जी सावधान विश्राम करवाते,फ़िर जिनकी बारी होती थी वो दो लड़के और दो लड़कियां सामने के चोक पर आ जाते,प्रार्थना स्थिति का आदेश मिलता,सबके दोनों हाथ छाती के आगे आकर नफासत से जुड़ जाते,प्रार्थना शुरू करने का आदेश मिलता,आगे वाली टीम एक पंक्ति गाती,सभी उनका उसी लयऔर ताल में अनुसरण करते.प्रत्येक वर की अलग अलग प्रार्थना होती थी,मुझे कुछ प्रार्थनाओं की पहली पंक्तियाँ आज भी याद है,करीब ३४ साल बाद भी,वो इसलिए की केवल मैं ही नहीं उस समय पढ़ने वाले सभी बच्चों के दिल में वो स्कूल एकदम वैसा ही स्थापित होगा जैसा मेरे दिल दिमाग में है,क्योंकि वो स्कूल और वो गुरुजन थे ही ऐसे,जिन्हें जीवन भर विस्मृत नहीं किया जा सकता या यूँ कहें वे विस्मृत हो ही नहीं सकते.बहरहाल,प्रार्थना होती,फ़िर रास्ट्र गान ,फ़िर प्रतिज्ञा स्थिति में आकर प्रतिज्ञा बोली जाती."भारत मेरा देश है,समस्त भारतीय मेरे भाई बहन है...."इसके बाद सभी गुरुजन जो जिस जिस क्लास के क्लास टीचर होते थे वो एक एक करके सबके नाखून और दांत देखते,कपडे देखते की धुले हुए हैं या नहीं,जिनके नाखून बढे होते,दांत खराब होते या कपडे मैले होते,उन्हें अलग से चोकी पर एक लाइन में खडा कर लिया जाता और सबको उनके नाखून और दांत दिखाए जाते,यानि सार्वजनिक रूप से उन्हें उनकी कमियां बतादी जाती थी.इसके बाद हेड मास्टर जी,सामयिक बात बताते,फ़िर कोई न कोई प्रेरक प्रसंग बडे रोचक अंदाज में सुनाते.यहाँ में इस बात का विशेष उल्लेख करना जरूरी समझता हूँ की एक अध्यापक में बोलने की और प्रस्तुतिकरण की कला का होना बहुत जरूरी है,हेड मास्टर जी की इस शानदार कला का में आज भी कायल हूँ,उनकी कही गई एक एक बात आज भी न केवल मेरे बल्कि मैं समझता हूँ उनके प्रत्येक विद्यार्थी के दिल पर लिखी मिलेगी.बहुत कम लोग जानते होंगे "नाग कन्या मनसा ","वीर बालक रत्नसेन,""धन्ना भक्त","भक्त प्रह्लाद","राक्षस जिसकी जान तोते में थी","बालक रोहिताश ","पन्ना धाय " आदि अनेक कहानियाँ संक्षेप में प्रार्थना में ही सुना देते थे हेड मास्टर जी.
Saturday, May 30, 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
.jpg)
No comments:
Post a Comment