निर्बल नहीं होता कभी नन्हा सा दिया
तूफानों से बुझता नहीं रोशनी का दिया
आत्मबल का अभाव होता है तूफानों की तेजी में
संकल्पों का विश्वास होता है नन्हें दीपक की ज्योति में
तिमिर का एक एक जर्रा ख़त्म करता है दिया
अंधेरों की काली चादर फैलता है बेलगाम तूफ़ान
काली चादर को भेद देता है नन्हें दिए का शालीन अनवान.....
Tuesday, November 4, 2008
कैसा प्रजातंत्र???????
मैं अब तक ये न जान सका
की असल में प्रजातंत्र क्या है!
ये केवल वोट देने का काम है या
प्रजा का इसमें कहीं कोई नाम है!!
मैनें न तो प्रजा की कोई देखी भागीदारी
न कभी जिन्दा देखी इस प्रजा की खुद्दारी
जाने क्यों लोग वोट मांगने आते हैं
क्यों गरीब जैसी झोली चुनाव में फैलाते हैं
जबकि कोई वेतन इनको मिलते मैंने नहीं देखा
कोई मासिक इन्क्रीमेंट लगते भी कभी न पाया
फ़िर भी किस कदर दीवाने हैं चुनाव जीतने को
कोई भी कमी उठा कर नहीं रखते चुनावों में
जनता को रखते हैं किस कदर भुलावों में!!!!!!!
मैं सोचता रहता हूँ के जब सब जानते हैं झूठों को
पहचानते हैं सरेआम इनकी झलकती करतूतों को
फ़िर क्यों अपने पर शासन करने को वोट देते हैं
क्यों अपने आप ही अपनों को चोट देते हैं
खुली खुली होती है बातें इन शाशकों की
हर पल झूठ से पुती होती है हरकतें इन नेताओं की
आम आदमी आखिर क्यों मजबूर है इनके लिए
क्यों देता है वोट क्यों नहीं रख लेता अपने लिए ????????????
की असल में प्रजातंत्र क्या है!
ये केवल वोट देने का काम है या
प्रजा का इसमें कहीं कोई नाम है!!
मैनें न तो प्रजा की कोई देखी भागीदारी
न कभी जिन्दा देखी इस प्रजा की खुद्दारी
जाने क्यों लोग वोट मांगने आते हैं
क्यों गरीब जैसी झोली चुनाव में फैलाते हैं
जबकि कोई वेतन इनको मिलते मैंने नहीं देखा
कोई मासिक इन्क्रीमेंट लगते भी कभी न पाया
फ़िर भी किस कदर दीवाने हैं चुनाव जीतने को
कोई भी कमी उठा कर नहीं रखते चुनावों में
जनता को रखते हैं किस कदर भुलावों में!!!!!!!
मैं सोचता रहता हूँ के जब सब जानते हैं झूठों को
पहचानते हैं सरेआम इनकी झलकती करतूतों को
फ़िर क्यों अपने पर शासन करने को वोट देते हैं
क्यों अपने आप ही अपनों को चोट देते हैं
खुली खुली होती है बातें इन शाशकों की
हर पल झूठ से पुती होती है हरकतें इन नेताओं की
आम आदमी आखिर क्यों मजबूर है इनके लिए
क्यों देता है वोट क्यों नहीं रख लेता अपने लिए ????????????
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