बात चल रही थी शिक्षण व्यवस्था की,मैंने ये बताया की किस तरह रेगिस्तान के रेतीले इलाके के एक गांव के स्कूल में हेड मास्टर जी बीकानेर के पब्लिक पार्क के चपरासी को पच्चीस पैसे देकर दूब की बोरी भरवा कर लाये थे वो दूब कितनी खुशी के साथ स्कूल के बच्चों और अध्यापकों ने लगाई थीजहाँ तक मुझे याद है दोनों भागों में काफी दूर तक खुदाई करके एक दिन में ही दूब लगा दी गईदूब में फूलों के पोधे लगाये गए,चारों तरफ़ मेहंदी के पोधों की बाड़ लगाई गई,करीब एक महीने में दूब खूब हो गई,हरियाली ही हरियाली,महकते कनेर के पुष्प,गेंदे,चमेली,रात की रानी,सूरजमुखी सहित बहुत कुछ थोड़े ही समय में विकसित हो गयामैं इतनी लम्बी चोडी भूमिका क्यों बाँध रहा हूँ ये मैं भी नहीं जानता लेकिन इतना जानता हूँ की जो कुछ मैं आपको बताना चाहता हूँ उसकी गंभीरता को जानने के लिए ये भूमिका बहुत जरूरी हैमैं यह बताना चाहता हूँ की किस प्रकार सीमित संसाधनों के बावजूद मजबूत इच्छाशक्ति से जंगल में मंगल किए जा सकते हैं,कैसे उजाड़ और सुनसान गांवों में रोनक पैदा की जा सकती है,कैसे नीरस और उबाऊ शिक्षण को रोचक और सरस बनाया जा सकता है,कैसे समूचे समाज और पूरे गांव को स्कूल से जोड़ा जा सकता हैआप अचम्भा करेंगे,मैं कहता हूँ की नालंदा और तक्षशिला क्या चीज रहे होंगे,उनसे भी बहुत बेहतर व्यवस्था आपको दिखा देगा मेरा ये गांव,जिसको मेरे बचपन ने खूब जिया है,जिसकी सुरभि बहुत दूर दूर तक फैली और जिसे देखने न जाने कहाँ कहाँ से लोग आते रहे.
Thursday, May 28, 2009
शेष..........
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