Saturday, June 6, 2009

अमरबेल......(६) ६ जून २००९

हेड मास्टर जी की डायरी मेरे हाथ लगी थी,मैनें उसमें से काफी कुछ उतार लिया था,कुछ अंश इस प्रकार हैं."११.९.७७ को शाला की स्थिति-शाला बाउंड्री नही के समान है,मामूली काँटों की बाड़ जो जगह जगह से टूटी हुई है,पशु रात को शाला के कमरों में घुस जाते हैं,मेन गेट नहीं है,मेनगेट की जगह दो लकड खडे करके बीच मेन काँटों का एक भीन्टका खडा कर दिया जाता है,शाला के तीन कमरों के पुराणी टाइप के दरवाजे हैं.एक हॉल,दो कमरे व बरामदा गिरने वाले हैं,समस्त कमरों में पानी चूता है,हॉल व दो कमरों के किवाड़ नहीं है,बारियाँ,अलमारियां भी नहीं है,दो कमरों के रोशनदान भी नहीं है,दो कमरों की छत गिरने वाली है,बाले(शहतीर)टूट चुके हैं,चोक टूट टूट कर निचे गिर रहे हैं,इस सूरत में बच्चों को कमरों में बिठाया जाना सम्भव नहीं है,ऐसा अहसास होता है की किसी भी मौसम के काबिल ये कमरे नहीं है,क्योंकि दरवाजों और खिड़कियों के नहीं होने से हवा,वर्षा,सर्दी आदि का बचाव किसी भी स्थिति में नहीं किया जा सकता."
इसी डायरी में मुझे कुछ स्लोगन लिखे भी मिले जिनका वजूद मुझे बहुत सामयिक लगता है ,और लगता है की कुछ बातें कभी पुराणी नहीं होती ।
आज हम हैं ,कल हमारी यादें होगी ,
जब हम न होंगे ,तब हमारी बातें होंगी ।
"ईर्ष्या और प्रतिशोध,मानव के दो बडे शत्रु हैं."
"मानव परिस्थितियों का दास है,मगर परिस्थितियाँ मानव द्वारा ही पैदा की जाती हैं.मानव परिस्थितियों पर काबू पा सकता है,परिस्थिति अनुकूल और प्रतिकूल होती ही रहती है.मानव में परिस्थितियों पर काबू पाने की हिम्मत होनी चाहिए"
"जिसकी अन्य पुरूष सर्वत्र प्रशंशा करते हैं वह निर्गुण होते हुए भी स्तुति करने योग्य हो जाता है,किंतु यदि कोई इन्द्र के समान ऐश्वर्यशाली होकर भी अपने मुख से अपनी बडाई करने लगे तो वह पुरूष निश्चय ही लोलुपता को प्राप्त हो जाता है ,अतःअच्छे व्यक्ति को चाहिए की वह अपने मुख से अपनी स्तुति न करे "
"जिस कार्य को आप करना चाहते हैं ,उसका फल देखलो ,यह भी देखलो कि क्या आप इसे कर सकते हैं?अगर फल अच्छा है तो तो कार्य चालू कर दो ,साहस में प्रतिभा ,शक्ति और जादू है ,सिर्फ़ काम के लिए जुट जाओ ,बाधाएं आयेंगी,पर कार्य पूर्ण होगा ,विश्वास द्रढ़ होना चाहिए "
कुछ इस प्रकार कि बातें डायरी में लिखी हुई है,बहुत कुछ और भी लिखा हुआ है लेकिन मुझे इस बात पर बहुत हैरानी है कि जब किसी भी प्रकार का कोई संसाधन नहीं था,तब वहाँ अधिकारी, नेता ,पत्रकार आदि कैसे पहुंच जाते थे और क्यों?१९७० से पहले के स्कूल का चित्रं देखें तो वो ये था कि दो मास्टर थे,बहुत कम आते थे और जब आते थे तो सारे दिन कोई पढाई नहीं होती थी,गांव का स्कूल की तरफ कोई लगाव नहीं था,बच्चे आते थे खेल कूद कर वापस चले जाते थे,कोई nirikshan करने wala होने का तो सवाल ही नहीं था.स्कूल की हालत ये थी की न तो पढाई का कोई माहोल था न पढ़ने वालों का.ऐसा स्कूल और देश के लिए नजीर बन जाए ऐसा किसी ने सोचा नहीं था.

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