....स्कूल में मैंने कभी किसी भी मास्टर जी को कुर्सी पर बैठ कर पढाते हुए कभी नहीं देखा,जब तक क्लास चलती थी मास्टर जी ब्लैक बोर्ड पर खडे खडे ही पढाते थे ,मुझे याद है गलती से भी स्कूल टाइम में क्लास रूम में कोई कुर्सी रह भी जाती तो चपरासी उसे उठा कर ले जाता.बच्चे हालाँकि दरियां बिछा कर नीचे फर्श पर ही बैठते थे,लेकिन पूरा डायरी के मुताबिक अध्ययन करवा कर मास्टर जी होमवर्क देते थे. स्कूल में सभी अध्यापक अपने विषयों की पूरी तयारी करके आते और पूरी कुशलता के साथ उसे सिखाने की कोशिश करते,यही कारण था कि उस काल में भी स्काउटिंग,टूर्नामेंट,सीखो कमाओ,अल्पबचत,खेती आदि को शिक्षा के साथ जोड़ दिया गया था.मैं ख़ुद अरंड के साबुन बनाना,मोमबत्ती बनाना,चाक निर्माण,अमृतधारा बनाना आदि सीखो कमाओ योजना के तहत सीखा था,जो मुझे आज भी याद है. स्कूल में जो बाग लगाया था उसे सींचने के लिए पाइप लाइन लगाने के लिए रुपयों कि जरूरत थी,हम सब बच्चे बाग को सूखता नहीं देख सकते थे,बरसात का मोसम था,हमने स्कूल के पिछली तरफ खली पडी जमीन पर ग्वार बीजने का फ़ैसला किया,जो फसल आयेगी उसे बेच कर पानी का नल लगवा लेंगे.हमने लकडियाँ आपस में जोड़ कर कल बनाये,कोई घर से ग्वार का बीज ले आया,कोई लोहे कि नुकीली चीज ले आया,ग्वार को जमीन पर छिड़क कर उस पर हल चला दिया.हल भी बडे मजेदार थे,दो लडके उसे आगे से खींचते और एक पीछे से पकड़ता,करीब काफी जमीन पर बुआई कर डाली,दो तीन बार बरसात और हो गई,ज्यों ज्यों ग्वार बढ़ता गया हमारी खुशियाँ बढ़ती गई,हम उस ग्वार से ग्वारफली कच्ची कच्ची तोड़ कर अपने गुरुजनों के घर भी पहुंचे करते थे,आखिरकार टाइम आने पर हमने ग्वार उखाडा,एक खलिहान बनाया,ग्वार कूट पीट कर निकल डाला,मुझे ये तो याद नहीं कि कितना हुआ,पर ये याद है कि बेचने पर १३५ रूपये मिले थे,इस राशिः से हमारे बाग के लिए ९० फीट पाइप आया था,हम वाटर वोर्क्स जा कर वहां से खडगावत जी को लेआए थे और हाथो हाथ कनेक्सन करवाया था,तब से हमारा बाग हर भरा हो गया था और उसमें कनेर,गेंदा,चमेली,रात कि रानी,जूही,सूरजमुखी,एलिया,मेहँदी,समेत अनेक प्रकार के फूल महकने लगे थे,मुझे याद है जब भी कोई अध्यापक या अभिभावक बाहर जाते थे तो उन्हें स्कूल के लिए कोई न कोई फूलदार फलदार पौधा लेकर आना ही पड़ता था.पानी कि सुविधा होते ही स्कूल की बाड़ के साथ साथ सिसम,सरेस,नीम,खेजडी,पर्किन्सोनिया,रोहिडा,अमरुद,अनार,आम बदाम,शहतूत,ल्हेसुआ,और न जाने कोन कोन से पौधे लग गये थे.हेड मास्टर जी ने एक एक विद्यार्थी को एक एक पौधा गोद दे दिया था,जिसका पौधा ज्यादा अच्छा होता और खूब बढ़ता उसे प्रार्थना में शाबाशी मिलती थी,पौधों को जीवित रखना एक प्रतियोगिता जैसा बन गया था,सब अपने अपने घरों से गोबर और मींगनी कि खाद लेकर आते थे और रोजाना अपने अपने पौधों कि निराई गुडाई करते थे.स्कोल शाम होते होते महक उठता था भिन्न भिन्न्प्रकर के फूलों कि खुसबू ठंडी रातों में दूर तक आती थी.खूब हरे भरे बाग में खूबसूरत माहोल में अब गांव वाले भी रातों को आकर बैठने लगे थे,अध्यापकों और गांव वालों का आपस में रोजाना शाम को घंटों तक मिलना होता था,और दिन में स्कूल न आ सकने वाले ग्रामीण रातों को स्कूल में आकर अपने बच्चों कि प्रगति जानने लगे.स्कूल का बाग चाहे पब्लिक पार्क जैसा नहीं बना होगा लेकिन पब्लिक पार्क कि वो दूब किसी भी प्रकार से मुझे पब्लिक पार्क से कम नहीं लगती.चाहे कैसे भी हो गांव का स्कूल के साथ एक प्रतिदिन का रिश्ता जरूर बन गया था.आज मैं सोचता हूँ कि कितनी मुश्किलों से तैयार हुआ था वो बाग और उसके असली मायने भी कितने खूबसूरत थे.जहाँ सैंकडों किलोमीटर तक कोई कस्बा या शहर नहीं था,जहाँ किसी भी प्रकार कि कोई सुविधा नहीं थी,जहाँ आने से लोग घबराते थे,उस दूर दराज के रेतीले धोरों वाले एक गांव में किस प्रकार जंगल में मंगल हो गया था,और इसके कितने शानदार मायने निकले?
Saturday, June 6, 2009
अमरबेल......(६) ६ जून २००९
हेड मास्टर जी की डायरी मेरे हाथ लगी थी,मैनें उसमें से काफी कुछ उतार लिया था,कुछ अंश इस प्रकार हैं."११.९.७७ को शाला की स्थिति-शाला बाउंड्री नही के समान है,मामूली काँटों की बाड़ जो जगह जगह से टूटी हुई है,पशु रात को शाला के कमरों में घुस जाते हैं,मेन गेट नहीं है,मेनगेट की जगह दो लकड खडे करके बीच मेन काँटों का एक भीन्टका खडा कर दिया जाता है,शाला के तीन कमरों के पुराणी टाइप के दरवाजे हैं.एक हॉल,दो कमरे व बरामदा गिरने वाले हैं,समस्त कमरों में पानी चूता है,हॉल व दो कमरों के किवाड़ नहीं है,बारियाँ,अलमारियां भी नहीं है,दो कमरों के रोशनदान भी नहीं है,दो कमरों की छत गिरने वाली है,बाले(शहतीर)टूट चुके हैं,चोक टूट टूट कर निचे गिर रहे हैं,इस सूरत में बच्चों को कमरों में बिठाया जाना सम्भव नहीं है,ऐसा अहसास होता है की किसी भी मौसम के काबिल ये कमरे नहीं है,क्योंकि दरवाजों और खिड़कियों के नहीं होने से हवा,वर्षा,सर्दी आदि का बचाव किसी भी स्थिति में नहीं किया जा सकता."
इसी डायरी में मुझे कुछ स्लोगन लिखे भी मिले जिनका वजूद मुझे बहुत सामयिक लगता है ,और लगता है की कुछ बातें कभी पुराणी नहीं होती ।
आज हम हैं ,कल हमारी यादें होगी ,
जब हम न होंगे ,तब हमारी बातें होंगी ।
"ईर्ष्या और प्रतिशोध,मानव के दो बडे शत्रु हैं."
"मानव परिस्थितियों का दास है,मगर परिस्थितियाँ मानव द्वारा ही पैदा की जाती हैं.मानव परिस्थितियों पर काबू पा सकता है,परिस्थिति अनुकूल और प्रतिकूल होती ही रहती है.मानव में परिस्थितियों पर काबू पाने की हिम्मत होनी चाहिए"
"जिसकी अन्य पुरूष सर्वत्र प्रशंशा करते हैं वह निर्गुण होते हुए भी स्तुति करने योग्य हो जाता है,किंतु यदि कोई इन्द्र के समान ऐश्वर्यशाली होकर भी अपने मुख से अपनी बडाई करने लगे तो वह पुरूष निश्चय ही लोलुपता को प्राप्त हो जाता है ,अतःअच्छे व्यक्ति को चाहिए की वह अपने मुख से अपनी स्तुति न करे "
"जिस कार्य को आप करना चाहते हैं ,उसका फल देखलो ,यह भी देखलो कि क्या आप इसे कर सकते हैं?अगर फल अच्छा है तो तो कार्य चालू कर दो ,साहस में प्रतिभा ,शक्ति और जादू है ,सिर्फ़ काम के लिए जुट जाओ ,बाधाएं आयेंगी,पर कार्य पूर्ण होगा ,विश्वास द्रढ़ होना चाहिए "
कुछ इस प्रकार कि बातें डायरी में लिखी हुई है,बहुत कुछ और भी लिखा हुआ है लेकिन मुझे इस बात पर बहुत हैरानी है कि जब किसी भी प्रकार का कोई संसाधन नहीं था,तब वहाँ अधिकारी, नेता ,पत्रकार आदि कैसे पहुंच जाते थे और क्यों?१९७० से पहले के स्कूल का चित्रं देखें तो वो ये था कि दो मास्टर थे,बहुत कम आते थे और जब आते थे तो सारे दिन कोई पढाई नहीं होती थी,गांव का स्कूल की तरफ कोई लगाव नहीं था,बच्चे आते थे खेल कूद कर वापस चले जाते थे,कोई nirikshan करने wala होने का तो सवाल ही नहीं था.स्कूल की हालत ये थी की न तो पढाई का कोई माहोल था न पढ़ने वालों का.ऐसा स्कूल और देश के लिए नजीर बन जाए ऐसा किसी ने सोचा नहीं था.
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