...प्रार्थना के बाद सबसे पहले पहली कक्षा अपने कमरे में भेजी जाती,ध्यान रखा जाता की कमरे में प्रवेश तक लाइन न टूटे,कमरे में भी सबके लिए स्थान नियत थे,कोन कहाँ बैठेगा?फ़िर दूसरी,तीसरी,और सभी क्लासें अपने अपने कमरों में जाती थी.हर एक क्लास के पीछे होते थे हाथ में हाजरी रजिस्टर लिए क्लास टीचर.हेड मास्टर जी तुंरत एक राउंड पूरी क्लास्सों का लगाते,कोन गेरहाजिर रहा पूछते और अपने ऑफिस में आ जाते.ऑफिस में आकर वे सभी अध्यापकों की टीचर डायरी पढ़ते,कौन अध्यापक आज क्या पढाएगा?क्या तयारी करके आए हैं? सबकी डायरियां देखने के बाद वे एक एक करकर क्लास में जाते,सबसे पीछे कुछ देर खडे रहते,कुछ अपनी डायरी में लिखते,फ़िर चुप चाप चले जाते। उनका ये रूटीन मैंने लगातार नो साल तक देखा,कभी भी वे अपने इस रूटीन से इधर उधर नहीं होते थे.चपरासी को निर्देश थे,जब तक हेड मास्टर जी नहीं कहें घन्टा(पीरीअड)नहीं बजेगा,पुराणी रेल लाइन का एक लम्बा सा टुकडा घंटी हुआ करता था,४० मिनट पूरे होते ही हेड मास्टर जी की निगाहों से चपरासी बजरंग की निगाहें मिलती थी और घन्टा घनघना उठता था,मजाल है एक सेकंड की भी देर हो जाए?आधी छुट्टी के बाद पांचवां,छटा,सातवां,और आठवां घंटा पॉँच पॉँच मिनट कम करके आखिरी २० मिनट का एक घन्टा खेल के लिए होता था.खेल का विशाल मैदान और उसमें वोलीबाल,फुटबाल,खो खो,कबड्डी,दोड़,लम्बी कूद,ऊंची कूद,रिंग,रस्सी कूद,और न जाने कोन कोन से खेल रोजाना खिलाये जाते थे.तोला राम जी की स्काउटिंग भी प्रत्येक सोमवार को नियत थी.हाँ एक बात मैं बताना भूल गया,एक सप्ताह में एक दिन एक क्लास की बारी पुस्तकालय और वाचनालय में जाने की होती थी,जहाँ पर पत्र पत्रिकाएं होती थी जैसे-साप्ताहिक हिंदुस्तान,धरमयुग,चंदामामा,लोटपोट,पराग,नंदन,कादम्बिनी,हंस,सरिता,मुक्ता,चंपक,आदि .इनके अलावा जो लाइब्ररी में कहानियों की किताबें लेने चाहते थे उन्हें इंचार्ज शिव कर्ण जी रजिस्टर में नाम लिख कर किताबें इस्स्यु कर देते थे.मुझे जो किताब सबसे अच्छी लगती थी वो "बाताँ री फुलवारी" थी ,उस समय तो लेखक का ध्यान नहीं देते थे लेकिन आज पता चला की वो तो विजय दान देथा थे जिनकी किताब पर पहेली फ़िल्म बनी.इतनी बडी लाइब्रेरी हजारों किताबें थी उसमें,पढ़ने का मजा आ जाता था.
Saturday, May 30, 2009
अमरबेल......३० मई २००९ (४)
आठ कक्षाएं और इतने ही मास्टर,इतने ही कमरे,सबके सब सुंदर और साफ सुथरे,सुबह स्कूल खुलते ही जिनकी सफाई की बारी होती थी वो छात्र जल्दी आकर कमरों की सफाई करते थे,दरी पट्टियाँ करीने से बिछाते थे और बैठने की व्यवस्था को खूबसूरती से जमा लेते थे.ठीक टाइम पर प्रार्थना की पहली घंटी बजती थी,जिसके पॉँच मिनट बाद दूसरी घंटी बज जाती थी,इस पॉँच मिनट के वक्फे में पहली से आठवीं तक की आठ लाइनें सीधी सीधी लग चुकी होती थी,पीटीआई साहब प्रत्येक लाइन के सामने खडे होकर लाइन सीधी करवा देते थे,सबसे छोटा सबसे आगे,सबसे लम्बा सबसे पीछे,लड़कियों की लाइन भी इसी प्रकार अलग से लगती थी.पिन ड्राप साइलेंस,कोई खुसर फुसर नहीं,पीटीआई जी सावधान विश्राम करवाते,फ़िर जिनकी बारी होती थी वो दो लड़के और दो लड़कियां सामने के चोक पर आ जाते,प्रार्थना स्थिति का आदेश मिलता,सबके दोनों हाथ छाती के आगे आकर नफासत से जुड़ जाते,प्रार्थना शुरू करने का आदेश मिलता,आगे वाली टीम एक पंक्ति गाती,सभी उनका उसी लयऔर ताल में अनुसरण करते.प्रत्येक वर की अलग अलग प्रार्थना होती थी,मुझे कुछ प्रार्थनाओं की पहली पंक्तियाँ आज भी याद है,करीब ३४ साल बाद भी,वो इसलिए की केवल मैं ही नहीं उस समय पढ़ने वाले सभी बच्चों के दिल में वो स्कूल एकदम वैसा ही स्थापित होगा जैसा मेरे दिल दिमाग में है,क्योंकि वो स्कूल और वो गुरुजन थे ही ऐसे,जिन्हें जीवन भर विस्मृत नहीं किया जा सकता या यूँ कहें वे विस्मृत हो ही नहीं सकते.बहरहाल,प्रार्थना होती,फ़िर रास्ट्र गान ,फ़िर प्रतिज्ञा स्थिति में आकर प्रतिज्ञा बोली जाती."भारत मेरा देश है,समस्त भारतीय मेरे भाई बहन है...."इसके बाद सभी गुरुजन जो जिस जिस क्लास के क्लास टीचर होते थे वो एक एक करके सबके नाखून और दांत देखते,कपडे देखते की धुले हुए हैं या नहीं,जिनके नाखून बढे होते,दांत खराब होते या कपडे मैले होते,उन्हें अलग से चोकी पर एक लाइन में खडा कर लिया जाता और सबको उनके नाखून और दांत दिखाए जाते,यानि सार्वजनिक रूप से उन्हें उनकी कमियां बतादी जाती थी.इसके बाद हेड मास्टर जी,सामयिक बात बताते,फ़िर कोई न कोई प्रेरक प्रसंग बडे रोचक अंदाज में सुनाते.यहाँ में इस बात का विशेष उल्लेख करना जरूरी समझता हूँ की एक अध्यापक में बोलने की और प्रस्तुतिकरण की कला का होना बहुत जरूरी है,हेड मास्टर जी की इस शानदार कला का में आज भी कायल हूँ,उनकी कही गई एक एक बात आज भी न केवल मेरे बल्कि मैं समझता हूँ उनके प्रत्येक विद्यार्थी के दिल पर लिखी मिलेगी.बहुत कम लोग जानते होंगे "नाग कन्या मनसा ","वीर बालक रत्नसेन,""धन्ना भक्त","भक्त प्रह्लाद","राक्षस जिसकी जान तोते में थी","बालक रोहिताश ","पन्ना धाय " आदि अनेक कहानियाँ संक्षेप में प्रार्थना में ही सुना देते थे हेड मास्टर जी.
Friday, May 29, 2009
विप्लव.......
जिसके बिना कुछ भी नहीं.....

जिसके बिना मैं कुछ भी नहीं,मेरा वजूद कुछ भी नहीं,उसके जिक्र के बिना मेरा ब्लॉग कैसे पूरा हो सकता है?खुले अंतःकरण से मेरा सब कुछ उसको समर्पित,जिसने बिना किसी शिकवा शिकायत के अपने जीवन को मेरे नाम कर दिया और प्रतिफल में कभी कुछ नहीं चाहा.अपने जीवन की सफलता का श्रेय मैं खुले दिल से अपनी माँ के बाद यदि किसी को देता हूँ तो वह यही तस्वीर है,जो निरंतर,अनथक,मुझे सच्चाई बनाये हुए है,जिसके किसी भी पल का बदला में नहीं उतार सकता,इस सत्य को सार्वजनिक करके मैं गौरव महसूस करता हूँ.
अमरबेल ......२९ मई २००९ (३)
मैं आपको बताता हूँ कि वास्तव में और दिखावे में कितना और क्या फरक होता है?आज जब हम हर काम दिखावे के लिए करके अपने आप को तुर्रम खान समझ रहे हैं,वही इस स्कूल का उदाहरण देखिये,मेरा आँखों देखा सच है,दावा है कि आप इसे सुन कर रोमांचित हो उठेंगे.शायद सन १९७५ का कोई दिन था,दिन का स्कूल हुआ करता था,१२ बजे छुट्टी हो गई थी,हॉल के आगे वाले बरामदे के आगे एक बहुत बडी अमरबेल थी जिसकी जड़ें बहुत गहरी थी और उसका तना पेड़ के तने जैसा था,हेड मास्टर जी कई दिन से इस बेल को दुरुस्त करने कि बात कह रहे थे लेकिन शायद उन्हें समय नहीं मिला था,आखिरकार टाइम मिला और वो बनियान और तोलिया पहन कर उस बेल के निचे घुस गए उनके साथ सहयोगी अध्यापक भी थे.मैं वहीँ खड़ा था,देख रहा था,बहुत भारी भरकम बेल को उठाना बहुत जोर लगने वाला काम था,तीन चार बच्चे,हेड मास्टर जी और अन्य मास्टर जी जोर लगा कर भारी बेल को उठाने कि कोशिश कर रहे थे.पसीना चू रहा था,हाल बेहाल थे,मुझे ज्यों का त्यों याद है. एक पीले रंग कि जीप आई,दो अफसर उतरे,पूछा हेड मास्टर जी कहाँ है? अब हेड मास्टर जी कैसे निकले?उनके सर पर तो अमरबेल का भार था,तोलिया गिर चुका था,खली कच्छे में हेड मास्टर जी,बेल को छोडे तो बेल गिर जाए,तोलिया कौन संभाले? अफसर थे इंसपेक्टर ऑफ़ स्कूल देवी सिंह कछावा,उन्होंने अमरबेल के नीचे हलचल देखी वहां जा पहुंचे,देखा तो हेड मास्टर जी कच्छे में सर पर भारी बेल.दोनों किन्कर्तव्यविमूध हालत में.विद्वान इंसपेक्टर ने स्थिति समझी,जैसे तैसे हेड मास्टर जी को बेल के निचे से बाहर निकाला और गले से लगा लिया,उनकी ऑंखें भरी हुई थी,न जाने कौनसा भाव उनके भीतर उमडा पड़ रहा था,वो भाव विव्हल हो गए.मुझे याद है कछावा साहब पूरे दिन रुके थे और समूची स्कूल को गोर से देखा था,न जाने वो क्या क्या ढूंढ रहे थे.कहने को तो यह साधारण सी बात है लेकिन उस विद्वान अधिकारी ने एक स्कूल की जो परिभाषा उस दिन देखी ऐसी अन्यत्र कहीं मिल सकती है भला?
लगातार....२९ मई ०९ (२)
मैं कह रहा था की तत्कालीन हालातों में जब शिक्षा के प्रति रुझान कम था,उस संक्रमण काल में कोसों पैदल चल कर स्कूलों में पहुंचना एक बडी चुनोती था.जिस स्कूल की में बात कर रहा हूँ,वहां तक पहुंचना बहुत बडी बात थी,फ़िर भी वहां छात्र संख्या पांचसो से पार थी,मजे की बात ये कि पढ़ने वाले विद्यार्थी आसपास और दूर दराज के गांवों के थे,न कोई जिले कि सीमा थी न कोई तहसील की,कोई चुरू का तो कोई नागोर का,कोई हनुमानगढ़ का तो कोई सीकर का और आसपास के गांवों से आने वाले तो सेंकडों की तादाद में थे.पहली से लेकर आठवीं तक का ये स्कूल अपने आप में इतना व्यवस्थित और कामयाब था कि यहाँ के अनुशासन और कायदों की लोग क़समें खाया करते थे.पहली से लेकर आठवीं तक हर एक क्लास को हेड मास्टर जी ख़ुद रोजाना जांचते थे,मुझे याद है जब कोई मास्टर जी क्लास को पढा रहे होते थे तो अनेक बार हेड मास्टर जी ख़ुद आकर पिछली तरफ़ बैठ जाते थे और मास्टर जी को पढाते हुए देखते थे। उस समय तो इसका कोई ज्ञान मुझे नहीं था लेकिन आज महसूस करता हूँ की वो ऐसा क्यों किया करते थे.बहरहाल नियमित तोर पर एक भी पढाई का पल खोये बिना चलने वाला वो स्कूल,पढाई के अलावा भी बहुत कुछ करवाता था,संस्कृतिक कार्यक्रमों में तो स्कूल राज्य में अपना विशेष स्थान रखता था,वहीँ व्रिक्षारोपन संचायिका,अल्पबचत,प्रौढ़ शिक्षा,खेलकूद,स्काउटिंग सहित अनेक सह पाठ्येतर गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र था.कितने अचम्भे की बात है कि उस काल में जब स्कूल भवनों के लिए किसी प्रकार कि सरकारी सुविधाएँ नहीं थी तब भी स्कूल कि शानदार बिल्डिंग में दस से अधिक कमरे थे और सब जनसहयोग से निर्मित थे,एक बहुत बडा हॉल,स्टोर,विशाल बगीचा,चारोंतरफ काँटों कि ऊंची ऊंची बाड़,करीब दस बीघा जमीन का कैम्पस,आज भी सुंदर नक्शा नयनाभिराम लगता है,जब आँखों के सामने आ जाता है।
मैं कहना चाहता हूँ कि जब किसी गांव में सिवाय स्कूल के कोई और संस्था ही नहीं हो और स्कूल समय के बाद करने के लिए कोई काम नहीं हो तो वहां टीचर्स क्या करें? इस गांव के टीचर्स के साथ यही दिक्कत थी कि खाली समय में क्या करें? इसका तरीका हेड मास्टर जी ने ये निकाल रखा था कि स्कूल के बाद भी पढ़ाई का काम जारी रखा,बच्चे छुट्टी के बाद घर जाते और खाना वाना खा कर वापस स्कूल आ जाते.
Thursday, May 28, 2009
लगातार ..............
सत्तर के दशक में जब साधन संसाधन न के बराबर थे उस समय में जबरदस्त शिक्षण को माकूल अंदाज दिया जाना आज मुझे किसी आस्चर्य से कम नहीं लगता.उस गांव में जब कोई नया अध्यापक आता था तो वो जीवन का सबसे कठिन समय मान कर अपने दिन गिन गिन कर बिताने की कल्पना किया करता था,लेकिन यदि वो कम से कम एक सप्ताह इस गांव में टिक जाता था तो फ़िर जाने का नाम नहीं लेता था,क्योंकि तब वो जान लेता था की मजा किसे कहते हैं.घर में दूध दही की भरपूर आवक,चूल्हे में जलने के लिए छात्रों द्वारा रोजाना सर पर रख कर लाई जाने वाली लकडियाँ,बाल्टियों और घडों से भरपूर पानी,और न जाने क्या क्या सुविधाएँ उस गांव में उपलब्ध थी.मुझे याद है चांदनी रातों में खूबसूरत धोरों पर खेलते थे बच्चे और उनके अध्यापक,ग्रामीण भी साथ देने आते थे और हर दडा,धोलियो भाटो,चुना घाटी,घुत्ता,रतन तलाई आदि अनेक देशी खेल देर रात तक चलते थे.मैं आज महसूस करता हूँ की किस कदर लोग आपस में घनिष्ट हो जाते थे,कोई अन्तर नहीं रहता .शेष बहुत है .......
शेष..........
बात चल रही थी शिक्षण व्यवस्था की,मैंने ये बताया की किस तरह रेगिस्तान के रेतीले इलाके के एक गांव के स्कूल में हेड मास्टर जी बीकानेर के पब्लिक पार्क के चपरासी को पच्चीस पैसे देकर दूब की बोरी भरवा कर लाये थे वो दूब कितनी खुशी के साथ स्कूल के बच्चों और अध्यापकों ने लगाई थीजहाँ तक मुझे याद है दोनों भागों में काफी दूर तक खुदाई करके एक दिन में ही दूब लगा दी गईदूब में फूलों के पोधे लगाये गए,चारों तरफ़ मेहंदी के पोधों की बाड़ लगाई गई,करीब एक महीने में दूब खूब हो गई,हरियाली ही हरियाली,महकते कनेर के पुष्प,गेंदे,चमेली,रात की रानी,सूरजमुखी सहित बहुत कुछ थोड़े ही समय में विकसित हो गयामैं इतनी लम्बी चोडी भूमिका क्यों बाँध रहा हूँ ये मैं भी नहीं जानता लेकिन इतना जानता हूँ की जो कुछ मैं आपको बताना चाहता हूँ उसकी गंभीरता को जानने के लिए ये भूमिका बहुत जरूरी हैमैं यह बताना चाहता हूँ की किस प्रकार सीमित संसाधनों के बावजूद मजबूत इच्छाशक्ति से जंगल में मंगल किए जा सकते हैं,कैसे उजाड़ और सुनसान गांवों में रोनक पैदा की जा सकती है,कैसे नीरस और उबाऊ शिक्षण को रोचक और सरस बनाया जा सकता है,कैसे समूचे समाज और पूरे गांव को स्कूल से जोड़ा जा सकता हैआप अचम्भा करेंगे,मैं कहता हूँ की नालंदा और तक्षशिला क्या चीज रहे होंगे,उनसे भी बहुत बेहतर व्यवस्था आपको दिखा देगा मेरा ये गांव,जिसको मेरे बचपन ने खूब जिया है,जिसकी सुरभि बहुत दूर दूर तक फैली और जिसे देखने न जाने कहाँ कहाँ से लोग आते रहे.
Subscribe to:
Comments (Atom)

.jpg)