Friday, May 29, 2009

अमरबेल ......२९ मई २००९ (३)

मैं आपको बताता हूँ कि वास्तव में और दिखावे में कितना और क्या फरक होता है?आज जब हम हर काम दिखावे के लिए करके अपने आप को तुर्रम खान समझ रहे हैं,वही इस स्कूल का उदाहरण देखिये,मेरा आँखों देखा सच है,दावा है कि आप इसे सुन कर रोमांचित हो उठेंगे.शायद सन १९७५ का कोई दिन था,दिन का स्कूल हुआ करता था,१२ बजे छुट्टी हो गई थी,हॉल के आगे वाले बरामदे के आगे एक बहुत बडी अमरबेल थी जिसकी जड़ें बहुत गहरी थी और उसका तना पेड़ के तने जैसा था,हेड मास्टर जी कई दिन से इस बेल को दुरुस्त करने कि बात कह रहे थे लेकिन शायद उन्हें समय नहीं मिला था,आखिरकार टाइम मिला और वो बनियान और तोलिया पहन कर उस बेल के निचे घुस गए उनके साथ सहयोगी अध्यापक भी थे.मैं वहीँ खड़ा था,देख रहा था,बहुत भारी भरकम बेल को उठाना बहुत जोर लगने वाला काम था,तीन चार बच्चे,हेड मास्टर जी और अन्य मास्टर जी जोर लगा कर भारी बेल को उठाने कि कोशिश कर रहे थे.पसीना चू रहा था,हाल बेहाल थे,मुझे ज्यों का त्यों याद है. एक पीले रंग कि जीप आई,दो अफसर उतरे,पूछा हेड मास्टर जी कहाँ है? अब हेड मास्टर जी कैसे निकले?उनके सर पर तो अमरबेल का भार था,तोलिया गिर चुका था,खली कच्छे में हेड मास्टर जी,बेल को छोडे तो बेल गिर जाए,तोलिया कौन संभाले? अफसर थे इंसपेक्टर ऑफ़ स्कूल देवी सिंह कछावा,उन्होंने अमरबेल के नीचे हलचल देखी वहां जा पहुंचे,देखा तो हेड मास्टर जी कच्छे में सर पर भारी बेल.दोनों किन्कर्तव्यविमूध हालत में.विद्वान इंसपेक्टर ने स्थिति समझी,जैसे तैसे हेड मास्टर जी को बेल के निचे से बाहर निकाला और गले से लगा लिया,उनकी ऑंखें भरी हुई थी,न जाने कौनसा भाव उनके भीतर उमडा पड़ रहा था,वो भाव विव्हल हो गए.मुझे याद है कछावा साहब पूरे दिन रुके थे और समूची स्कूल को गोर से देखा था,न जाने वो क्या क्या ढूंढ रहे थे.कहने को तो यह साधारण सी बात है लेकिन उस विद्वान अधिकारी ने एक स्कूल की जो परिभाषा उस दिन देखी ऐसी अन्यत्र कहीं मिल सकती है भला?

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