Monday, May 4, 2009

हमारी शिक्षा व्यवस्था - दो दशक का भयावह बदलाव

मुझे आज भी याद है सन १९७५ का वो दिन जब मैं पांचवीं कक्षा में पढता था.१० साल की उम्र रही होगी मेरी.उस समय स्कूल आज की तरह टाइम में बंधे हुए नहीं होते थे.अध्यापक लोग पूरे समय के लिए स्कूलों में होते थे क्यों की दूर दराज के गांवों में आने जाने की सुविधा नहीं होती थी और गुरुजन हमेशा स्कूलों में ही रहकर सरे दिन पढाया करते थे.राजस्थान के बीकानेर जिले के बहुत रेगिस्तानी इलाके के एक गांव की बात कर रहा हूँ में.मुझे याद है उस गांव तक जाने के लिए १७ किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था.साधन के नाम पर पंडित बलराम जी का एक ऊँट गाडा हुआ करता था जिस पर फटी हुई बोरियों की छत लगा कर और फटा पुराना तिरपाल बिछा कर वो सवारियों को स्टेशन तक पहुँचाया करते थे.जिसको जाना होता वो सुबह सुबह ही उनके यहाँ जाकर अपनी जगह बुक करवा दे तो ठीक नहीं तो फ़िर पैदल जाओ या अगले दिन.बहरहाल मैं विषयांतर कर गया.हेडमास्टर जी ने उस रेगिस्तानी गांव के स्कूल में पेड़ पोधों और बगीचों की हरियाली बड़ी मुश्किलों से कायम कर रखी थी.मुझे याद है कोई पोधा अगर जरा सा कुम्हला जाता था तो हेडमास्टर जी भी खुम्हला जाते थे,उदास हो जाते थे.मुझे ये भी याद है की किस तरह वो बीकानेर के पब्लिक पार्क से एक बोरी घास की भर कर लाये थे और फ़िर प्रार्थना के बाद अपने प्रवचन में बताया था की इस घास को लगना है और हरा भरा रखना है क्यों की पब्लिक पार्क के चोकीदार ने यह बोरी भरने कर पूरे पचीस पैसे लिए हैं.

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