Friday, April 5, 2024

अमरबेल क्या है?

बरसों बाद इस ब्लॉग की याद तब आई जब इसके प्रेरक मेरे पिताजी मुझे छोड़ कर स्वर्गवासी हो गए।वास्तव में अमरबेल शीर्षक उनको ही समर्पित है,अमरबेल कोई काल्पनिक नहीं सचमुच का कथानक है जिसे मैंने बचपन से जिया है।इसकी एक अनुभूत परिस्थिति है कि 2009 में जिस कथानक को बनाया,जिसको मूर्त रूप देने का विचार किया उसको सच बनाने में एक दशक से अधिक का समय व्यतीत हो गया।कहा जाता है कि शाहकार जब बनते हैं तो उनकी नींव बहुत गहरी होती है,अमरबेल कोई साधारण घटनाक्रम नहीं है,अमरबेल की वास्तविकता में आधी शताब्दी की सच्चाइयां है,कई पीढ़ियों का उतार चढ़ाव है,बहुत कुछ ऐसा है जिसे वर्तमान परिवेश में सोचा भी नहीं का सकता। अमरबेल विषम परिस्थितियों का ऐसा लेखा जोखा है जो जीवन में श्रेष्ठ नागरिक निर्माण,शिक्षा की वास्तविक जरूरतों,ग्राम विकास सहित सर्वांगीण आमूलचूल परिवर्तन सहित अंततः देश के नवनिर्माण तथा नागरिक निर्माण की पृष्ठभूमि है।अमरबेल शीर्षक चाहे जो भी कुछ कहता हो लेकिन इस शीर्षक तले जो भी उकेरण होने जा रहा है वो अभूतपूर्व है।अमरबेल में हमारी संस्कृति,हमारी परंपराएं,हमारे परिवार,हमारे विद्यार्थी,अभिभावक,स्कूल,पाठ्यक्रम,प्रशासनिक व्यवस्था,शिक्षा में प्रशासन,शिक्षण की कला, संस्कृति का संरक्षण,नागरिक निर्माण की जिम्मेदारी और जवाबदेही सहित चारित्रिक उत्थान,चरित्र निर्माण,बालिका शिक्षा,महिला संबल,अंतिम छोर तक शैक्षिक जागृति,रूढ़ियों,अंधविश्वासों और स्थापित कुरीतियों के प्रति संजीदगी सहित वो सब कुछ है जो सामाजिक ताने बाने के लिए आवश्यक है। अमरबेल हमें बताता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में राजनीतिक हस्तक्षेप को कोई स्थान नहीं है, अमरबेल एक विशाल पुराण कहा जा सकता है जो हमें ये बताता है कि शिक्षा में अगर सबकी सामूहिक भागीदारी हो तो किसी शासन प्रशासन की बहुत जरूरत नहीं।आज से पचास साल पहले की शैक्षिक व्यवस्था को यदि हैं गौर से देखें तो एक ही बात समझ में आती है कि कक्षा कक्ष हो ना हो विद्यालय में प्राण होने अनिवार्य है।अमरबेल हमें बताती है कि कलेक्टर, एसपी थानेदार नाजिम हाकिम सब के सब स्कूल के बाद ही है।स्कूल अगर शिद्दत से चाह ले तो शेष प्रशासन को कुछ करने की दरकार नहीं।स्कूल ऐसा संस्थान होता है जहां आईपीसी सीपीसी और सभी पैनल कोड बात बात में समझा दिए जाते हैं,स्कूल वो जगह है जहां बताई और सिखाई गई बात के गंभीर और स्थाई मायने निकलते हैं।थानेदार और मजिस्ट्रेट जो बात डर और भय से नहीं सीखा सकते वो बात हमारे स्कूल सहज ही दिलों में पैबस्त कर देते हैं।अमरबेल एक कथानक है, अमरबेल एक सत्य वृतांत है, अमरबेल गवाह है उन विपन्न हालातों का जब पढ़ाई के लिए वातावरण की नहीं,कमरों की नहीं सिर्फ और सिर्फ माहौल और मनोबल की जरूरत होती है,अमरबेल कहता है कि विद्यालय चारदीवारी,कमरों,और आधुनिक सुख सुविधाओं से नही बल्कि शिक्षको, अभिभावकों और विद्यार्थियों के समूह से बनते हैं। ये न केवल विद्यालय बल्कि संस्कार निर्माण केंद्र,नागरिक निर्माण केंद्र होते हैं। अमरबेल के साथ वैसे तो अनकही अनथक सत्य वास्तविकताएं जुड़ी हुई है लेकिन उनका अगर दस प्रतिशत भी यहां उद्धृत किया जा सका तो इसकी सार्थकता होगी। अमरबेल का शाब्दिक विवेचन करें तो यह एक ऐसी बेल होती है जो विकास,उत्पादन और वृद्धि को इंगित करती है, अमरबेल इस कदर अच्छादित होती है की उसकी घनी छांव हो जाती है और इसके आसरे तले वृद्धि ही वृद्धि होती है। अमरबेल के बड़े बड़े गहरे हरे भरे पत्ते अपने भीतर रस और पोषक तत्व समाहित किए होते हैं और इसका तना गुंथ कर इतना मजबूत आकार ले लेता है कि इससे बेल के कमरे भी बनाए जा सकते हैं जो आवश्यकता पड़ने पर पूर्ण कक्ष का काम दे सकते हैं।वनस्पति के रूप में अमरबेल के बारे में और भी कुछ कहा जा सकता है लेकिन यहां अमरबेल का जिक्र विषयांतर के लिए है।अमरबेल यहां वह सच्चाई है जहां इसकी छांव में कितने ही शिक्षाविद अपनी विद्वता को प्रस्तुत कर गए,कितने ही विद्यार्थी गुरुकुल की तर्ज पर इसकी घनी छांव में बैठ कर पढ़ पढ़ कर कामयाब हो गए,कितने ही अधिकारी इस अमरबेल का दीदार कर के प्रत्यक्षदृष्ट हो गए कि गुरुकुल कमोबेश ऐसे ही हुआ करते हैं। अमरबेल शीर्षक के सच्चे घटनाक्रम का जिक्र करना प्रासंगिक है क्योंकि अमरबेल नमक यह ग्रंथ चाहे कोई क्रांति करने में कामयाब हो न हो लेकिन यह मानवता,इंसानियत और कर्तव्यनिष्ठा का अद्भुत दर्शन होगा। 1970 का कोई दिन,बीकानेर से करीब 115 किलोमीटर दूर लूणकरणसर तहसील का ऐतिहासिक गांव शेखसर,मलकीसर से ठीक 15 किलोमीटर रेतीले धोरों में बसा एक पुराना गांव जहां आने जाने के लिए कोई साधन नहीं,ऊंचे नीचे पहाड़ जैसे रेत के धोरे जिनमे से चल कर जा सकना लगभग असंभव।ऐसे शेखसर गांव की स्कूल प्राइमरी मिडल बनी और वहां मिडल स्कूल के हेडमास्टर के रूप में पदस्थापित हुए कुंवर भंवर सिंह शेखावत।भंवर सिंह शेखावत यहां के पहले हेडमास्टर के रूप में यहां आए तो यहां पहुंचना भी उन्हें चुनौती लगा।सुदूर रेत के धोरों में बसे इस गांव में मिडल स्कूल का होना अपने आपमें किसी उपलब्धि से कम नहीं।समूचे बीकानेर जिले में ही जहां एक दर्जन से अधिक मिडल स्कूल और आधा दर्जन से अधिक सेकेंडरी स्कूल नहीं होंगे ऐसे में मिडल स्कूल के महत्व को समझा जा सकता है। शेखसर का स्कूल,एक नीम का विशाल पेड़,और दो कमरे,गांव से एकदम बाहर।ग्रामीण पृष्ठभूमि में पले बढ़े और सीमित संसाधनों का महत्व समझ सकने वाले युवा हेडमास्टर जी जिनकी उम्र तकरीबन 28 साल रही होगी।उन्होंने स्कूल को देखा,नीम के पेड़ और उस पर लटकी रेल की पटरी की घंटी को देखा और देखा एक जाल के पेड़ को।बस इतना सा स्कूल।बहरहाल,ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़े हेडमास्टर जी गांव के चौधरी जी के घर गए,अपना परिचय दिया और रहने की व्यवस्था चाही।चौधरी साहब ने स्वागत किया,मिडल स्कूल के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने यथोचित आदर सत्कार किया और हरसंभव मदद का आश्वासन दिया।हेडमास्टर जी के पास स्टाफ के नाम पर उसी गांव के दो अध्यापक वो भी तृतीय श्रेणी। हेडमास्टर जी ने स्कूल संचालन शुरू किया।बेतरतीब सिस्टम को संभालने की जुगत में ग्रामीणों को बुलाया मीटिंग की।गाँव में जब ये खबर हुई कि कोई हेडमास्टर ऐसा भी है जो गंभीरता के साथ स्कूल संचालन चाहता है तो उनमें रुचि जागृत हुई।जब गाँव वालों को ये पता चला कि यह व्यक्ति शहर की विकसित चकाचौंध को त्याग कर सुदूर गाँव में रह कर स्कूल संचालन करने का इच्छुक है तो गाँव में सकारात्मक माहौल तैयार हुआ।अंततः जब गाँव में यह पता चला कि ये हेडमास्टर ख़ुद ही पास के हाँव का रहने वाला है और ग्रामीण परिवेश और पृष्ठभूमि को हृदयंगम करने वाला है,तो गाँव का उत्साह और अधिक बढ़ा।हेडमास्टर जी ने भी जब देखा कि गाँव ठेठ ग्रामीण संस्कारों  से परिपूर्ण है और ठीक वैसा ही है जैसा उनका ख़ुद का गाँव है,तो उनका विश्वास जम गया और उन्होंने यहाँ अपने आपको ठहराने का मानस बना लिया।उनकी ग्रामीणों से अभ्यर्थना थी कि उनको सपरिवार रहने की माकूल व्यवस्था कर दी जाये,बाक़ी काम वो ख़ुद देख लेंगे।