पूरा तो मुझे नहीं याद लेकिन एक बार के आयोजन में विद्यार्थियों ने संजय -विदुला संवाद का नाटकीय प्रस्तुतीकरण किया था उसकी मेरे जीवन पर बहुत गहरी छाप पडी,किस अंदाज में सावित्री नामक विदुला बनी विद्यार्थी ने संजय बनी मगन कँवर को सीख पिलाई और उस वक्त कतई नहीं लगता था की ये कोई नाटकीय प्रस्तुति है,वास्तव में संजय विदुला साकार हो उठा था ,किस कदर माता की आँखों से चिंगारियां निकल रही थी और कैसे संजय गर्दन झुकाए सुनने को विवश था मेरे कहने का अर्थ यह है की किस प्रकार शाला के स्टाफ ने सीमित संसाधनों के बाद भी रेतीले उस बियावान इलाके में इस तरह की तैयारियां की होगी,कैसे चरित्रों को बच्चों के भीतर डाला होगा कैसे शानदार सजीव प्रस्तुतियां देते होंगे?जरा कल्पना तो करें?
विद्यालयों में सांस्कृतिक गतिविधियों और सह पाठ्येटर गर्तिविधियों के प्रबल हिमायती तत्कालीन शिक्षक इन गतिविधियों के सहारे ही बहुत बड़ा हिस्सा बच्चों को समझाने में कामयाब होते थे,किताबों को मात्र एक सहारे के रूप में इस्तेमाल करने वाले तत्कालीन योग्य शिक्षक बालकों के भीतर समूल परिवर्तन करने के पक्षधर होते थे।मुझे याद है कि अध्यापक स्वयं फुटबॉल और वॉलीबॉल के मैदानों में बच्चों के साथ खेल कर उन्हें खेल की बारीक से बारीक बातें सिखाते थे।उस समय की सबसे ख़ास बात ये थी कि उस काल के प्राचीन खेल जो परंपरागत थे ,उनको प्राथमिकता से बच्चों को सिखाना विद्यालय की प्राथमिकता में शामिल था।स्कूल में तत्कालीन माहौल इस प्रकार का था कि बच्चे विद्यालय समय पश्चात भी अपने घर जाना पसंद नहीं करते थे,स्कूल को को करिकुलर गतिविधियों का इतना शानदार केंद्र बनाया हुआ था कि बच्चे अपने आपको यहीं पूरी तरह से खपा देते थे।
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