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Saturday, May 30, 2009

अमरबेल..........३० मई २००९ (५)

...प्रार्थना के बाद सबसे पहले पहली कक्षा अपने कमरे में भेजी जाती,ध्यान रखा जाता की कमरे में प्रवेश तक लाइन न टूटे,कमरे में भी सबके लिए स्थान नियत थे,कोन कहाँ बैठेगा?फ़िर दूसरी,तीसरी,और सभी क्लासें अपने अपने कमरों में जाती थी.हर एक क्लास के पीछे होते थे हाथ में हाजरी रजिस्टर लिए क्लास टीचर.हेड मास्टर जी तुंरत एक राउंड पूरी क्लास्सों का लगाते,कोन गेरहाजिर रहा पूछते और अपने ऑफिस में आ जाते.ऑफिस में आकर वे सभी अध्यापकों की टीचर डायरी पढ़ते,कौन अध्यापक आज क्या पढाएगा?क्या तयारी करके आए हैं? सबकी डायरियां देखने के बाद वे एक एक करकर क्लास में जाते,सबसे पीछे कुछ देर खडे रहते,कुछ अपनी डायरी में लिखते,फ़िर चुप चाप चले जाते। उनका ये रूटीन मैंने लगातार नो साल तक देखा,कभी भी वे अपने इस रूटीन से इधर उधर नहीं होते थे.चपरासी को निर्देश थे,जब तक हेड मास्टर जी नहीं कहें घन्टा(पीरीअड)नहीं बजेगा,पुराणी रेल लाइन का एक लम्बा सा टुकडा घंटी हुआ करता था,४० मिनट पूरे होते ही हेड मास्टर जी की निगाहों से चपरासी बजरंग की निगाहें मिलती थी और घन्टा घनघना उठता था,मजाल है एक सेकंड की भी देर हो जाए?आधी छुट्टी के बाद पांचवां,छटा,सातवां,और आठवां घंटा पॉँच पॉँच मिनट कम करके आखिरी २० मिनट का एक घन्टा खेल के लिए होता था.खेल का विशाल मैदान और उसमें वोलीबाल,फुटबाल,खो खो,कबड्डी,दोड़,लम्बी कूद,ऊंची कूद,रिंग,रस्सी कूद,और न जाने कोन कोन से खेल रोजाना खिलाये जाते थे.तोला राम जी की स्काउटिंग भी प्रत्येक सोमवार को नियत थी.हाँ एक बात मैं बताना भूल गया,एक सप्ताह में एक दिन एक क्लास की बारी पुस्तकालय और वाचनालय में जाने की होती थी,जहाँ पर पत्र पत्रिकाएं होती थी जैसे-साप्ताहिक हिंदुस्तान,धरमयुग,चंदामामा,लोटपोट,पराग,नंदन,कादम्बिनी,हंस,सरिता,मुक्ता,चंपक,आदि .इनके अलावा जो लाइब्ररी में कहानियों की किताबें लेने चाहते थे उन्हें इंचार्ज शिव कर्ण जी रजिस्टर में नाम लिख कर किताबें इस्स्यु कर देते थे.मुझे जो किताब सबसे अच्छी लगती थी वो "बाताँ री फुलवारी" थी ,उस समय तो लेखक का ध्यान नहीं देते थे लेकिन आज पता चला की वो तो विजय दान देथा थे जिनकी किताब पर पहेली फ़िल्म बनी.इतनी बडी लाइब्रेरी हजारों किताबें थी उसमें,पढ़ने का मजा आ जाता था.