सत्तर के दशक में जब साधन संसाधन न के बराबर थे उस समय में जबरदस्त शिक्षण को माकूल अंदाज दिया जाना आज मुझे किसी आस्चर्य से कम नहीं लगता.उस गांव में जब कोई नया अध्यापक आता था तो वो जीवन का सबसे कठिन समय मान कर अपने दिन गिन गिन कर बिताने की कल्पना किया करता था,लेकिन यदि वो कम से कम एक सप्ताह इस गांव में टिक जाता था तो फ़िर जाने का नाम नहीं लेता था,क्योंकि तब वो जान लेता था की मजा किसे कहते हैं.घर में दूध दही की भरपूर आवक,चूल्हे में जलने के लिए छात्रों द्वारा रोजाना सर पर रख कर लाई जाने वाली लकडियाँ,बाल्टियों और घडों से भरपूर पानी,और न जाने क्या क्या सुविधाएँ उस गांव में उपलब्ध थी.मुझे याद है चांदनी रातों में खूबसूरत धोरों पर खेलते थे बच्चे और उनके अध्यापक,ग्रामीण भी साथ देने आते थे और हर दडा,धोलियो भाटो,चुना घाटी,घुत्ता,रतन तलाई आदि अनेक देशी खेल देर रात तक चलते थे.मैं आज महसूस करता हूँ की किस कदर लोग आपस में घनिष्ट हो जाते थे,कोई अन्तर नहीं रहता .शेष बहुत है .......
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