Saturday, November 22, 2008
जर्रा जर्रा रोमांचित है आज
कहते हैं की इतिहास अपने आपको रिपीट करता है बीकानेर आज भी उन्हीं भवनों और मकानों मैं रहता है जो रियासतकाल में बने बीकानेर को वर्षों बाद बदलने के मोका मिला है बीकानेर ने बहुत से नेता अभिनेता देखे हैं,बीकानेर ने सबको देखा परखा और जाना है,पहचाना है,नजदीक से देखा है और अजमाया भी है,सबने अपने अपने तौर पर बीकानेर को बदल डालने और काया पलट डालने की बहुत सी बातें भी कही हैं कहते रहे हैं,कहते भी रहेंगे एक स्थापित तथ्य है की जिन लोगों में जो हेरिडिटी अथवा वंशानुगत गुन होते हैं वो पीढी डर पीढी चलते आते हैं,राजा महाराजाओं में जनता की सेवा के गुन खानदानी होते हैं,उन्हें सिखाना नहीं पड़ता बीकानेर ने महाराजा करनी सिंह जी को लंबे समय तक संसद में बनाये रखा परिणामस्वरूप राजस्थान कैनाल की नींव पड़ी,बीकानेर उत्तरी भारत का शिक्षा का सबसे बड़ा केन्द्र बना,कास्तकारी अधिनियम भी बीकानेर के सांसद करनी सिंह जी ने संसद में पास करवाया,उन्होंने खेलों के लिए अपनी तरफ़ से जो प्रोत्साहन खिलाड़ियों को दिया वो आज भी अविस्मरणीय हैआधुनिक बीकानेर की नींव रखने वाले महाराजा डॉ.करणी सिंह जी को हमसे अलग हुए बहुत लंबा समय नहीं बीता है,बीकानेर का शानदार आधुनिक स्वरुप उनका सपना था जो आज भी अभिलाषित है
कैसे भूलें उनको
जिनके बनाये साढे पांच सो सालों के खूबसूरत बीकानेर मैं हम बैठे हैं,जिन्होंने हमारे पूर्वजों को जीना सिखाया और हमें अपने बच्चों की तरह समझा उन रियासतकालीन सूरमाओं के बड़प्पन का आज अहसास होता है.जमाना कितना ही बदल जाए,विज्ञानं कितनी भी तरक्की करले,लोग कितने ही अग्रणी हो जायें,चाहे कुछ भी बदल जाए,नहीं बदलेगा ये एतिहासिक परिवेश,नहीं पुराणी होगी लोगों के मन की श्रद्धा भावना और नहीं पुराना होगा लोगों का विश्वाश.राजे महाराजाओं ने ये कब सोचा था की कभी वे चुनाव लडेंगे,यदि ऐसा सोचा होता तो कहानी कुछ और ही होती और वे इसी लालच मैं आकार अपनी भूमिकाएं तय कर लेते.कहते हैं कि भारत के लोग श्रद्धा और प्रेम का कामयाब प्रतिकार करना जानते हैं,हम लोग अपने राजे महाराजाओं को इश्वर का प्रतिनिधि मानते रहे हैं,उनके सजदे मैं हम सदेव अपने आपको इसलिए प्रस्तुत करते रहे हैं कि उनके दम से हमने अपने आपको जिया है और उन्होंने हमें अपने बच्चों कि तरह पाला पोषा है.बहरहाल सदियाँ बीत गई हैं,राजा महाराजा नहीं रहे हैं लेकिन आज भी रियासतकालीन सच्चाई वैसी कि वैसी हैं,हम आज भी सेंकडों सालों के उस वीरतापूर्ण परिवेश मैं बैठे हैं जो तत्कालीन हमारे राजा महाराजाओं द्वारा निर्मित किया गया था और कितनी शानदार दूरदर्शिता को हम आज देखते हैं कि संसाधनों कि अल्पता के उस काल मैं भी इन आलीशान शानदार लोगों ने हमारे आज का ख्याल रखा और आज भी हम उनके द्वारा निर्धारित परिवेश मैं स्थापित हैं।
भूमिका का तात्पर्य यह है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और सामाजिकता उसे सदियों से विरासत मैं मिलती आ रही है.गिव एंड टेक का सिद्धांत हमारी परम्परा है,हम उस प्रत्येक बात को कभी नहीं भूलते जो हमारे लिए बेहतर हो या रही हो,चाहे वो कितनी भी पुराणी बात हो,हमारा जमीर उस देन को भूलने नहीं देता जो हमें कहीं से भी मिली हो,हमारी संस्कृति हमें पुरातन अतीत कि हर पल याद दिलाती है।
बीकानेर कि बात करें तो यह पुरातन शहर उस खूबसूरत अतीत का शानदार साक्षी है जो हमारे लिए रियासतदारों ने बेहद हेरिटेज स्वरुप मैं छोड़ा है,हम ही नहीं समूचा संसार बीकानेर कि स्थिति और इसकी प्राकृतिक सुन्दरता के गीत गाता है ,बीकानेर को देखने सारा संसार आता है,ऐसे शानदार बीकानेर के निर्माण का श्रेय जिन लोगों को जाता है वे और उनकी पीढी आज भी बीकानेर की जनता के लिए आदरणीय एवं सम्मानीय हैं.बीकानेर के लिए उन्होंने जो कुछ किया वो भुलाया नहीं जा सकता और बीकानेर की जनता की भूलने कि आदत भी नहीं है,जनता राजपरिवार और उनके वजूद के लिए कुछ भी करने को तत्पर और तैयार है.
भूमिका का तात्पर्य यह है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और सामाजिकता उसे सदियों से विरासत मैं मिलती आ रही है.गिव एंड टेक का सिद्धांत हमारी परम्परा है,हम उस प्रत्येक बात को कभी नहीं भूलते जो हमारे लिए बेहतर हो या रही हो,चाहे वो कितनी भी पुराणी बात हो,हमारा जमीर उस देन को भूलने नहीं देता जो हमें कहीं से भी मिली हो,हमारी संस्कृति हमें पुरातन अतीत कि हर पल याद दिलाती है।
बीकानेर कि बात करें तो यह पुरातन शहर उस खूबसूरत अतीत का शानदार साक्षी है जो हमारे लिए रियासतदारों ने बेहद हेरिटेज स्वरुप मैं छोड़ा है,हम ही नहीं समूचा संसार बीकानेर कि स्थिति और इसकी प्राकृतिक सुन्दरता के गीत गाता है ,बीकानेर को देखने सारा संसार आता है,ऐसे शानदार बीकानेर के निर्माण का श्रेय जिन लोगों को जाता है वे और उनकी पीढी आज भी बीकानेर की जनता के लिए आदरणीय एवं सम्मानीय हैं.बीकानेर के लिए उन्होंने जो कुछ किया वो भुलाया नहीं जा सकता और बीकानेर की जनता की भूलने कि आदत भी नहीं है,जनता राजपरिवार और उनके वजूद के लिए कुछ भी करने को तत्पर और तैयार है.
Tuesday, November 4, 2008
तूफानों से बुझते नहीं दिये
निर्बल नहीं होता कभी नन्हा सा दिया
तूफानों से बुझता नहीं रोशनी का दिया
आत्मबल का अभाव होता है तूफानों की तेजी में
संकल्पों का विश्वास होता है नन्हें दीपक की ज्योति में
तिमिर का एक एक जर्रा ख़त्म करता है दिया
अंधेरों की काली चादर फैलता है बेलगाम तूफ़ान
काली चादर को भेद देता है नन्हें दिए का शालीन अनवान.....
तूफानों से बुझता नहीं रोशनी का दिया
आत्मबल का अभाव होता है तूफानों की तेजी में
संकल्पों का विश्वास होता है नन्हें दीपक की ज्योति में
तिमिर का एक एक जर्रा ख़त्म करता है दिया
अंधेरों की काली चादर फैलता है बेलगाम तूफ़ान
काली चादर को भेद देता है नन्हें दिए का शालीन अनवान.....
कैसा प्रजातंत्र???????
मैं अब तक ये न जान सका
की असल में प्रजातंत्र क्या है!
ये केवल वोट देने का काम है या
प्रजा का इसमें कहीं कोई नाम है!!
मैनें न तो प्रजा की कोई देखी भागीदारी
न कभी जिन्दा देखी इस प्रजा की खुद्दारी
जाने क्यों लोग वोट मांगने आते हैं
क्यों गरीब जैसी झोली चुनाव में फैलाते हैं
जबकि कोई वेतन इनको मिलते मैंने नहीं देखा
कोई मासिक इन्क्रीमेंट लगते भी कभी न पाया
फ़िर भी किस कदर दीवाने हैं चुनाव जीतने को
कोई भी कमी उठा कर नहीं रखते चुनावों में
जनता को रखते हैं किस कदर भुलावों में!!!!!!!
मैं सोचता रहता हूँ के जब सब जानते हैं झूठों को
पहचानते हैं सरेआम इनकी झलकती करतूतों को
फ़िर क्यों अपने पर शासन करने को वोट देते हैं
क्यों अपने आप ही अपनों को चोट देते हैं
खुली खुली होती है बातें इन शाशकों की
हर पल झूठ से पुती होती है हरकतें इन नेताओं की
आम आदमी आखिर क्यों मजबूर है इनके लिए
क्यों देता है वोट क्यों नहीं रख लेता अपने लिए ????????????
की असल में प्रजातंत्र क्या है!
ये केवल वोट देने का काम है या
प्रजा का इसमें कहीं कोई नाम है!!
मैनें न तो प्रजा की कोई देखी भागीदारी
न कभी जिन्दा देखी इस प्रजा की खुद्दारी
जाने क्यों लोग वोट मांगने आते हैं
क्यों गरीब जैसी झोली चुनाव में फैलाते हैं
जबकि कोई वेतन इनको मिलते मैंने नहीं देखा
कोई मासिक इन्क्रीमेंट लगते भी कभी न पाया
फ़िर भी किस कदर दीवाने हैं चुनाव जीतने को
कोई भी कमी उठा कर नहीं रखते चुनावों में
जनता को रखते हैं किस कदर भुलावों में!!!!!!!
मैं सोचता रहता हूँ के जब सब जानते हैं झूठों को
पहचानते हैं सरेआम इनकी झलकती करतूतों को
फ़िर क्यों अपने पर शासन करने को वोट देते हैं
क्यों अपने आप ही अपनों को चोट देते हैं
खुली खुली होती है बातें इन शाशकों की
हर पल झूठ से पुती होती है हरकतें इन नेताओं की
आम आदमी आखिर क्यों मजबूर है इनके लिए
क्यों देता है वोट क्यों नहीं रख लेता अपने लिए ????????????
Monday, October 27, 2008
सज रही रंगोली
वही मैं, वही तुम, वही मकान, वही दिवाली
वही चहलपहल सब कुछ वही ,वही रात काली
चरों तरफ़ शोर वही,वही दीपो की आभा निराली
सन्नाटों को पछाडती,मनमोहक वही है हरियाली
सभी घरों मैं सदा की तरह खुशियों के आलम मैं
रंगीन सुर्ख रंगों से खूबसूरत देखो सज रही रंगोली!!!
रंगोली सजाओ खुशियाँ मनाओ हर पल आनंद करो
पर उनको कभी न भूलो जिनके दम से सजी है रंगोली
जिनके कल से हमारा आज है उन्हें पुरजोर याद करो
तब ही सार्थक होगी दीवाली की ये रंगीन रंगोली !!
वही चहलपहल सब कुछ वही ,वही रात काली
चरों तरफ़ शोर वही,वही दीपो की आभा निराली
सन्नाटों को पछाडती,मनमोहक वही है हरियाली
सभी घरों मैं सदा की तरह खुशियों के आलम मैं
रंगीन सुर्ख रंगों से खूबसूरत देखो सज रही रंगोली!!!
रंगोली सजाओ खुशियाँ मनाओ हर पल आनंद करो
पर उनको कभी न भूलो जिनके दम से सजी है रंगोली
जिनके कल से हमारा आज है उन्हें पुरजोर याद करो
तब ही सार्थक होगी दीवाली की ये रंगीन रंगोली !!
ये दीपावली है
माँ तेरे बिना ये कैसी दीपावली?
इस बार कुछ अलग सी दीपावली है,मन कुछ अलग सी अनुभूति से अभिभूत है,
ऐसा लगता है कहीं कोई रिक्तिका सी है
किसी का अभाव भीतर से कचोटता है
समवेत स्वर कुछ दबे दबे से हैं
मन के झिलमिल दीप बुझे बुझे हैं
आशाओं के आख्यानों पर झीना परदा है
मन की उमंगों को कोई जैसे दबोचता है
ममतामई हाथों का सुहाना स्पर्श
उन आँखों से छलकता निस्पृह आशीष
दीपावली पर निर्झर बहता प्रेम स्रोत
अनजाने मैं ही सही मुझे अब भी सहेजता है
मैं सिर्फ़ तेरे आशीर्वाद का फल हूँ
तेरी वजह से तेरे अतीत का कल हूँ
तूं चाहे कहीं भी हो मेरे आसपास है
फ़िर भी इस दिवाली पर बहुत विकल हूँ !!!
कार्तिक कृष्ण अमावश्या,२०६५!दीपावली २००८!२८-१०-२००८
Wednesday, October 22, 2008
लोगों की दुकान
लोगों की दुकान चलाने वाले, किस होश मैं भीगा फिरता है !!!
तेरे मन की अभिमानी हालत,सच्चाई से बडी दूर है
जो सीट मिली है तुझे पल भर,वो दुनिया का दस्तूर है
तेरे जैसे सूटेड बूटेड कई आए कई चले गए
कुछ चल निकले दो पल,कुछ होश गंवाए पडे रहे
आनन फानन तेरा ये जीवन,बर्बाद तुझे कर डालेगा
आंख खुलेगी जब तेरी,तूं चौंक चौंक कर उछलेगा
अपने अस्तित्व का भान करना सीखले उत्साही न बन
सदा ही नहीं रहते जीवन में महकते शालीन उपवन
किक एक लगेगी जब किसी छोटी सी नासाज गलती पर
पल भर में समझ अज्येगा तुझे की तूं है किस धरती पर!!!
तेरे मन की अभिमानी हालत,सच्चाई से बडी दूर है
जो सीट मिली है तुझे पल भर,वो दुनिया का दस्तूर है
तेरे जैसे सूटेड बूटेड कई आए कई चले गए
कुछ चल निकले दो पल,कुछ होश गंवाए पडे रहे
आनन फानन तेरा ये जीवन,बर्बाद तुझे कर डालेगा
आंख खुलेगी जब तेरी,तूं चौंक चौंक कर उछलेगा
अपने अस्तित्व का भान करना सीखले उत्साही न बन
सदा ही नहीं रहते जीवन में महकते शालीन उपवन
किक एक लगेगी जब किसी छोटी सी नासाज गलती पर
पल भर में समझ अज्येगा तुझे की तूं है किस धरती पर!!!
नितगुन
कोई भी इन्सान तब तक ही तुझे सोचेगा
जब तक तू उसके काम का है
तेरे मन में चाहे अपनेपन के हिलोर उमड़ें
वो तो तेरा पैमाना नाप कर स्वार्थ देखता है
तेरे संस्कार तेरे हैं तेरे खून में गिरावट नहीं है
तूं चाह कर भी हद से नीचे नहीं गिर सकता
पर चिंता न कर तेरा भरोसा पक्का है
अन्तत तेरा विश्वाश तो जीतेगा ही
वो मरेंगे बेवजह जिनको तेरी खुद्दारी
पर यकीन नहीं.......
जब तक तू उसके काम का है
तेरे मन में चाहे अपनेपन के हिलोर उमड़ें
वो तो तेरा पैमाना नाप कर स्वार्थ देखता है
तेरे संस्कार तेरे हैं तेरे खून में गिरावट नहीं है
तूं चाह कर भी हद से नीचे नहीं गिर सकता
पर चिंता न कर तेरा भरोसा पक्का है
अन्तत तेरा विश्वाश तो जीतेगा ही
वो मरेंगे बेवजह जिनको तेरी खुद्दारी
पर यकीन नहीं.......
Sunday, October 19, 2008
कठै गया बै गांव????
चरभर चरभर खेलता गैरी जाल्लां री छांव!
बटाऊ आंव्ता-जान्व्ता नासेठू गैला मांय,
लुक मीचणी कुरा घुत्तो धोलियो भाटो खेलता,
झाद्दकी री बाड़ा मान्खर बा चालती लाय.....
कोई तो मने बताओ रै कठै गया बै गांव ???
काचर खेलरी फोफलिया,काकदिये रा बीज,
खेरडी पर मांड्यो हिंदों सावनियै री तीज,,
लुळ लुळ हिंडती तीजन्याँ लहरिये री खीज,
सुरंगों बायरो सिरकतो होलै साँव साँव ,,,,
कोई तो मनै बताओ रे भाई कठै गया बै गांव.....
कठै गया बै गांव,कठै गया बै गांव ............?
बटाऊ आंव्ता-जान्व्ता नासेठू गैला मांय,
लुक मीचणी कुरा घुत्तो धोलियो भाटो खेलता,
झाद्दकी री बाड़ा मान्खर बा चालती लाय.....
कोई तो मने बताओ रै कठै गया बै गांव ???
काचर खेलरी फोफलिया,काकदिये रा बीज,
खेरडी पर मांड्यो हिंदों सावनियै री तीज,,
लुळ लुळ हिंडती तीजन्याँ लहरिये री खीज,
सुरंगों बायरो सिरकतो होलै साँव साँव ,,,,
कोई तो मनै बताओ रे भाई कठै गया बै गांव.....
कठै गया बै गांव,कठै गया बै गांव ............?
सिलसिला
उम्र भर रास आया यही सिलसिला
बनाते रहे कल्पना का किला,
कटे पंख लेकिन कभी तो उडेंगे,
गगन से अगर निमंत्रण जो मिला!!!!!
बनाते रहे कल्पना का किला,
कटे पंख लेकिन कभी तो उडेंगे,
गगन से अगर निमंत्रण जो मिला!!!!!
माँ - एक किवदन्ती,एक अभूतपूर्व सच्चाई
मैनें एक बार माँ से कहा था-"माँ मुझे रात को डर लगता है1उस रात से मैनें माँ को कभी रात को सोते हुए नहीं देखा"।
सहज अंदाज मैं बडी से बडी समस्या का निवारण माँ !
अद्भुत साहस अविकल अहसास का आभास माँ !!
चूल्हे चाकी पनघट बाखल होकर हर पल आसपास माँ !!!
पलक झपकते अहसासों की आवृति स्पंदन का मधुमास माँ !!!!
जिजीविषा ही रही तेरे क़दमों मैं पुष्प बिछाने की ममतामयी,
तेरे भीतर के पुराने फफोलों को सहलाने की तुझे बहलाने की ,
सिहर उठता हूँ यह सोच कर कि किस कदर सिहरती रही है तूँ,
तेरे जीवन का एक एक पल क्योंकर सिहर सिहर गुजरा होगा?
संसाधनों के बियावनों में मुझे बचाने को क्या क्या न किया होगा तूने !
अपनी गोद मैं उठा कर मीलों तक अनथक पैदल चलने वाली देवी!!!
स्निग्ध सुकोमल उस पावन स्पर्श को तत्समय मैं मूढ़ न जान सका !
सहज अंदाज मैं बडी से बडी समस्या का निवारण माँ !
अद्भुत साहस अविकल अहसास का आभास माँ !!
चूल्हे चाकी पनघट बाखल होकर हर पल आसपास माँ !!!
पलक झपकते अहसासों की आवृति स्पंदन का मधुमास माँ !!!!
जिजीविषा ही रही तेरे क़दमों मैं पुष्प बिछाने की ममतामयी,
तेरे भीतर के पुराने फफोलों को सहलाने की तुझे बहलाने की ,
सिहर उठता हूँ यह सोच कर कि किस कदर सिहरती रही है तूँ,
तेरे जीवन का एक एक पल क्योंकर सिहर सिहर गुजरा होगा?
संसाधनों के बियावनों में मुझे बचाने को क्या क्या न किया होगा तूने !
अपनी गोद मैं उठा कर मीलों तक अनथक पैदल चलने वाली देवी!!!
स्निग्ध सुकोमल उस पावन स्पर्श को तत्समय मैं मूढ़ न जान सका !
जीने के लिए जरूरी टिप्स-साबुन से हाथ धोलो नहीं तो जीवन से हाथ धो बैठोगे
हमारा देश आज भी आम आदमी को बिमारियों से मुक्त करने में कामयाब नहीं हो पा रहा है,समूचा विश्व आज अपने नागरिकों को स्वस्थ जीवन देने की हर मुमकिन कोशिश कर रहा है,यू.एन.ओ.के यूनिसेफ ने भारत में सम्पूर्ण स्वास्थ्य के मध्यनजर महत्वपूर्ण पहलकदमी की है,बहुत आश्चर्य की बात है की भारत में आज भी दो लाख टन मैला रोजाना धरती पर खुले में फैलता है,यानि हमारे देश की पैंसठ प्रतिशत आबादी खुले में शोच करती है,इस खुली गंदगी से फैलने वाले किटानू हमारी क्षमता को रोक कर प्रतिरोधक क्षमता को खत्म करते हैं.यह आश्चर्य की बात है कि एक ग्राम मानव मल में एक करोड़ बैक्टेरिया होते हैं जो शारीरिक नुकसान पहुँचने में समर्थ होते हैंहमारे देश में आज भी रोजाना एक हजार बच्चे गंदगी के कारन मौत के मुंह में चले जाते हैं,एक हजार माताओं की कोख रोजाना सूनी हो जाती है,यानि प्रतिदिन एक रेल दुर्घटना का आंकडा हम रोजाना देखते हैं।
पन्द्रह अक्टूबर को हमने ग्लोबल हैण्ड वाशिंग डे मनाया,इसके पीछे की मूल भावना भी गंदगी से हो रही बर्बादी की जानकारी जन जन तक पहुँचाना था.हमारे देश में सिर्फ़ पैंतीस फीसदी लोग खाना खाने से पहले हाथ अच्छी तरह धोते हैं,इसी प्रकार मात्र पैंसठ फीसदी लोग शोच के बाद साबुन से हाथ धोते हैं,इस कारन गंदगी का अवशेष हाथों के माध्यम से मानव शरीर के भीतर चला जाता है और बीमारी लगातार बनी रहती है।
भारत सरकार ने सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान चला कर गंदगी के विरूद्ध जंग छेड़ दी है,सन २०१२ तक समूचा भारत घर घर में शोचालयों से युक्त होगा ऐसा संकल्प संजोया गया है.इसे अंजाम तक पहुँचने के लिए सरकार ने निर्मल ग्राम पुरस्कार योजना प्रारम्भ की है,जिसके तहत सम्पूर्ण स्वच्छता के सभी सात घटक पूरे करने वाली ग्राम पंचायतों को राष्ट्रीय निर्मल ग्राम पुरस्कार एक भव्य समारोह में भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा दिया जाता है.इस परिणाम को देखकर संतुष्टि है की जहाँ वर्ष २००३ में ऐसी पंचायतों की संख्या शून्य थी,२००४-०५ में ३८ पंचायतों को निर्मल ग्राम पुरस्कार मिला,वर्ष २००५-०६ में यह संख्या बढ़ कर ७६० हो गई वहीं २००६-०७ में देश की ४९४५ ग्राम पंचायतों को निर्मल ग्राम पुरस्कार प्राप्त हुआ .इस वर्ष २००७-०८ में यह संख्या बढ़ कर ग्यारह हजार पंचायतों से भी अधिक हो गई,स्पष्ट है की भारत में स्वच्छता के प्रति जागृति तेजी से बढ़ रही है।
निर्मल ग्राम पुरस्कार के तहत एक हजार आबादी वाली पंचायत को पचास हजार रूपये,दो हजार आबादी तक वाली पंचायत को एक लाख रूपये,पॉँच हजार आबादी तक वाली पंचायत को दो लाख रूपये,दस हजार तक आबादी वाली पंचायत को चार लाख रूपये तथा दस हजार से अधिक आबादी वाली पंचायत को पॉँच लाख रूपये पुरस्कार के रूप में दिए जाते हैं।
सम्पूर्ण स्वच्छता के सात घटकों में पहला पेयजल का सुरक्षित रख रखाव,दूसरा बेकार पानी का सुरक्षित निपटान,तीसरा मानव मल का सुरक्षित निपटान,चौथा ठोस कचरे का निपटान,पांचवां व्यक्तिगत स्वच्छता,छटा घर एवं भोजन की सफ़ाई और सातवां घटक समुदायिक एवं ग्रामीण स्वच्छता शामिल है.इन सभी घटकों की शत प्रतिशत पूर्ति करने वाली पंचायत निर्मल ग्राम पुरस्कार की हक़दार होती हैं
पन्द्रह अक्टूबर को हमने ग्लोबल हैण्ड वाशिंग डे मनाया,इसके पीछे की मूल भावना भी गंदगी से हो रही बर्बादी की जानकारी जन जन तक पहुँचाना था.हमारे देश में सिर्फ़ पैंतीस फीसदी लोग खाना खाने से पहले हाथ अच्छी तरह धोते हैं,इसी प्रकार मात्र पैंसठ फीसदी लोग शोच के बाद साबुन से हाथ धोते हैं,इस कारन गंदगी का अवशेष हाथों के माध्यम से मानव शरीर के भीतर चला जाता है और बीमारी लगातार बनी रहती है।
भारत सरकार ने सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान चला कर गंदगी के विरूद्ध जंग छेड़ दी है,सन २०१२ तक समूचा भारत घर घर में शोचालयों से युक्त होगा ऐसा संकल्प संजोया गया है.इसे अंजाम तक पहुँचने के लिए सरकार ने निर्मल ग्राम पुरस्कार योजना प्रारम्भ की है,जिसके तहत सम्पूर्ण स्वच्छता के सभी सात घटक पूरे करने वाली ग्राम पंचायतों को राष्ट्रीय निर्मल ग्राम पुरस्कार एक भव्य समारोह में भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा दिया जाता है.इस परिणाम को देखकर संतुष्टि है की जहाँ वर्ष २००३ में ऐसी पंचायतों की संख्या शून्य थी,२००४-०५ में ३८ पंचायतों को निर्मल ग्राम पुरस्कार मिला,वर्ष २००५-०६ में यह संख्या बढ़ कर ७६० हो गई वहीं २००६-०७ में देश की ४९४५ ग्राम पंचायतों को निर्मल ग्राम पुरस्कार प्राप्त हुआ .इस वर्ष २००७-०८ में यह संख्या बढ़ कर ग्यारह हजार पंचायतों से भी अधिक हो गई,स्पष्ट है की भारत में स्वच्छता के प्रति जागृति तेजी से बढ़ रही है।
निर्मल ग्राम पुरस्कार के तहत एक हजार आबादी वाली पंचायत को पचास हजार रूपये,दो हजार आबादी तक वाली पंचायत को एक लाख रूपये,पॉँच हजार आबादी तक वाली पंचायत को दो लाख रूपये,दस हजार तक आबादी वाली पंचायत को चार लाख रूपये तथा दस हजार से अधिक आबादी वाली पंचायत को पॉँच लाख रूपये पुरस्कार के रूप में दिए जाते हैं।
सम्पूर्ण स्वच्छता के सात घटकों में पहला पेयजल का सुरक्षित रख रखाव,दूसरा बेकार पानी का सुरक्षित निपटान,तीसरा मानव मल का सुरक्षित निपटान,चौथा ठोस कचरे का निपटान,पांचवां व्यक्तिगत स्वच्छता,छटा घर एवं भोजन की सफ़ाई और सातवां घटक समुदायिक एवं ग्रामीण स्वच्छता शामिल है.इन सभी घटकों की शत प्रतिशत पूर्ति करने वाली पंचायत निर्मल ग्राम पुरस्कार की हक़दार होती हैं
Saturday, October 18, 2008
जीवन से भरी ऑंखें
मैं जब भी किसी से मिलता हूँ,बरबस आँखों मैं जीवन ढूंढता हूँ.कुछ चंद आँखों मैं मुझे जीवन की हलचल दिखाई पडती है,लेकिन ऐसी ऑंखें बहुत कम दिखती हैं,अधिकतर आँखों मैं तो जीवन ही दिखाई नहीं पड़ता,मेरी आदत जीवन देखने की है,यही कारण है की मैं हरेक की आँखों मैं झांकता फिरता हूँ.कतिपय ऑंखें जीवन के इर्दगिर्द नजर आती हैं परन्तु अन्ततःउनमें जीवन दिखाई नहीं देता,मैं ढूंढता रह जाता हूँ,जीवन नजर नहीं आता,सच नहीं आता.
mahendrashekhawat
अपने बारे में पूरी तरह विश्वस्त मैं आपसे मुखातिब हूँमैं जानता हूँ की मेरी खासियतें हर किसी को मालूम नहीं लेकिन ये भरोसा भारी है कि मेरी ये खासियतें मुझे मेरे ढूँढने वालों तक ले जायेगीहालाँकि अपने बारे मैं ऐसा कुछ कहना अजीब लगता है लेकिन इतना अजीब भी नहीं,क्यों कि इस दुनिया मैं किसी के पास इतना समय कहाँ है जो ढूंढता फिरे,इसीलिये अपनी खूबी या खासियत बतानी जरूरी हैयकीनन अज के लोगों को सच्चाई पसंद है लेकिन इसे बताने वाले नहीं मिलते,इसलिए यह प्रयत्न करना जरूरी हैमैं इसलिए परेशान रहता हूँ कि मुझे आज तक कोई ऐसा नाम नहीं मिला जिसे मैं अपना गोड फादर कह सकूँ,गोड फादरों की कमी है या मैं पहचान नहीं पाया ये नहीं जानता
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