Saturday, October 18, 2008

जीवन से भरी ऑंखें

मैं जब भी किसी से मिलता हूँ,बरबस आँखों मैं जीवन ढूंढता हूँ.कुछ चंद आँखों मैं मुझे जीवन की हलचल दिखाई पडती है,लेकिन ऐसी ऑंखें बहुत कम दिखती हैं,अधिकतर आँखों मैं तो जीवन ही दिखाई नहीं पड़ता,मेरी आदत जीवन देखने की है,यही कारण है की मैं हरेक की आँखों मैं झांकता फिरता हूँ.कतिपय ऑंखें जीवन के इर्दगिर्द नजर आती हैं परन्तु अन्ततःउनमें जीवन दिखाई नहीं देता,मैं ढूंढता रह जाता हूँ,जीवन नजर नहीं आता,सच नहीं आता.

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