Friday, May 29, 2009

लगातार....२९ मई ०९ (२)

मैं कह रहा था की तत्कालीन हालातों में जब शिक्षा के प्रति रुझान कम था,उस संक्रमण काल में कोसों पैदल चल कर स्कूलों में पहुंचना एक बडी चुनोती था.जिस स्कूल की में बात कर रहा हूँ,वहां तक पहुंचना बहुत बडी बात थी,फ़िर भी वहां छात्र संख्या पांचसो से पार थी,मजे की बात ये कि पढ़ने वाले विद्यार्थी आसपास और दूर दराज के गांवों के थे,न कोई जिले कि सीमा थी न कोई तहसील की,कोई चुरू का तो कोई नागोर का,कोई हनुमानगढ़ का तो कोई सीकर का और आसपास के गांवों से आने वाले तो सेंकडों की तादाद में थे.पहली से लेकर आठवीं तक का ये स्कूल अपने आप में इतना व्यवस्थित और कामयाब था कि यहाँ के अनुशासन और कायदों की लोग क़समें खाया करते थे.पहली से लेकर आठवीं तक हर एक क्लास को हेड मास्टर जी ख़ुद रोजाना जांचते थे,मुझे याद है जब कोई मास्टर जी क्लास को पढा रहे होते थे तो अनेक बार हेड मास्टर जी ख़ुद आकर पिछली तरफ़ बैठ जाते थे और मास्टर जी को पढाते हुए देखते थे। उस समय तो इसका कोई ज्ञान मुझे नहीं था लेकिन आज महसूस करता हूँ की वो ऐसा क्यों किया करते थे.बहरहाल नियमित तोर पर एक भी पढाई का पल खोये बिना चलने वाला वो स्कूल,पढाई के अलावा भी बहुत कुछ करवाता था,संस्कृतिक कार्यक्रमों में तो स्कूल राज्य में अपना विशेष स्थान रखता था,वहीँ व्रिक्षारोपन संचायिका,अल्पबचत,प्रौढ़ शिक्षा,खेलकूद,स्काउटिंग सहित अनेक सह पाठ्येतर गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र था.कितने अचम्भे की बात है कि उस काल में जब स्कूल भवनों के लिए किसी प्रकार कि सरकारी सुविधाएँ नहीं थी तब भी स्कूल कि शानदार बिल्डिंग में दस से अधिक कमरे थे और सब जनसहयोग से निर्मित थे,एक बहुत बडा हॉल,स्टोर,विशाल बगीचा,चारोंतरफ काँटों कि ऊंची ऊंची बाड़,करीब दस बीघा जमीन का कैम्पस,आज भी सुंदर नक्शा नयनाभिराम लगता है,जब आँखों के सामने आ जाता है।
मैं कहना चाहता हूँ कि जब किसी गांव में सिवाय स्कूल के कोई और संस्था ही नहीं हो और स्कूल समय के बाद करने के लिए कोई काम नहीं हो तो वहां टीचर्स क्या करें? इस गांव के टीचर्स के साथ यही दिक्कत थी कि खाली समय में क्या करें? इसका तरीका हेड मास्टर जी ने ये निकाल रखा था कि स्कूल के बाद भी पढ़ाई का काम जारी रखा,बच्चे छुट्टी के बाद घर जाते और खाना वाना खा कर वापस स्कूल आ जाते.

Thursday, May 28, 2009

लगातार ..............

सत्तर के दशक में जब साधन संसाधन न के बराबर थे उस समय में जबरदस्त शिक्षण को माकूल अंदाज दिया जाना आज मुझे किसी आस्चर्य से कम नहीं लगता.उस गांव में जब कोई नया अध्यापक आता था तो वो जीवन का सबसे कठिन समय मान कर अपने दिन गिन गिन कर बिताने की कल्पना किया करता था,लेकिन यदि वो कम से कम एक सप्ताह इस गांव में टिक जाता था तो फ़िर जाने का नाम नहीं लेता था,क्योंकि तब वो जान लेता था की मजा किसे कहते हैं.घर में दूध दही की भरपूर आवक,चूल्हे में जलने के लिए छात्रों द्वारा रोजाना सर पर रख कर लाई जाने वाली लकडियाँ,बाल्टियों और घडों से भरपूर पानी,और न जाने क्या क्या सुविधाएँ उस गांव में उपलब्ध थी.मुझे याद है चांदनी रातों में खूबसूरत धोरों पर खेलते थे बच्चे और उनके अध्यापक,ग्रामीण भी साथ देने आते थे और हर दडा,धोलियो भाटो,चुना घाटी,घुत्ता,रतन तलाई आदि अनेक देशी खेल देर रात तक चलते थे.मैं आज महसूस करता हूँ की किस कदर लोग आपस में घनिष्ट हो जाते थे,कोई अन्तर नहीं रहता .शेष बहुत है .......

शेष..........

बात चल रही थी शिक्षण व्यवस्था की,मैंने ये बताया की किस तरह रेगिस्तान के रेतीले इलाके के एक गांव के स्कूल में हेड मास्टर जी बीकानेर के पब्लिक पार्क के चपरासी को पच्चीस पैसे देकर दूब की बोरी भरवा कर लाये थे वो दूब कितनी खुशी के साथ स्कूल के बच्चों और अध्यापकों ने लगाई थीजहाँ तक मुझे याद है दोनों भागों में काफी दूर तक खुदाई करके एक दिन में ही दूब लगा दी गईदूब में फूलों के पोधे लगाये गए,चारों तरफ़ मेहंदी के पोधों की बाड़ लगाई गई,करीब एक महीने में दूब खूब हो गई,हरियाली ही हरियाली,महकते कनेर के पुष्प,गेंदे,चमेली,रात की रानी,सूरजमुखी सहित बहुत कुछ थोड़े ही समय में विकसित हो गयामैं इतनी लम्बी चोडी भूमिका क्यों बाँध रहा हूँ ये मैं भी नहीं जानता लेकिन इतना जानता हूँ की जो कुछ मैं आपको बताना चाहता हूँ उसकी गंभीरता को जानने के लिए ये भूमिका बहुत जरूरी हैमैं यह बताना चाहता हूँ की किस प्रकार सीमित संसाधनों के बावजूद मजबूत इच्छाशक्ति से जंगल में मंगल किए जा सकते हैं,कैसे उजाड़ और सुनसान गांवों में रोनक पैदा की जा सकती है,कैसे नीरस और उबाऊ शिक्षण को रोचक और सरस बनाया जा सकता है,कैसे समूचे समाज और पूरे गांव को स्कूल से जोड़ा जा सकता हैआप अचम्भा करेंगे,मैं कहता हूँ की नालंदा और तक्षशिला क्या चीज रहे होंगे,उनसे भी बहुत बेहतर व्यवस्था आपको दिखा देगा मेरा ये गांव,जिसको मेरे बचपन ने खूब जिया है,जिसकी सुरभि बहुत दूर दूर तक फैली और जिसे देखने न जाने कहाँ कहाँ से लोग आते रहे.

Monday, May 4, 2009

हमारी शिक्षा व्यवस्था - दो दशक का भयावह बदलाव

मुझे आज भी याद है सन १९७५ का वो दिन जब मैं पांचवीं कक्षा में पढता था.१० साल की उम्र रही होगी मेरी.उस समय स्कूल आज की तरह टाइम में बंधे हुए नहीं होते थे.अध्यापक लोग पूरे समय के लिए स्कूलों में होते थे क्यों की दूर दराज के गांवों में आने जाने की सुविधा नहीं होती थी और गुरुजन हमेशा स्कूलों में ही रहकर सरे दिन पढाया करते थे.राजस्थान के बीकानेर जिले के बहुत रेगिस्तानी इलाके के एक गांव की बात कर रहा हूँ में.मुझे याद है उस गांव तक जाने के लिए १७ किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था.साधन के नाम पर पंडित बलराम जी का एक ऊँट गाडा हुआ करता था जिस पर फटी हुई बोरियों की छत लगा कर और फटा पुराना तिरपाल बिछा कर वो सवारियों को स्टेशन तक पहुँचाया करते थे.जिसको जाना होता वो सुबह सुबह ही उनके यहाँ जाकर अपनी जगह बुक करवा दे तो ठीक नहीं तो फ़िर पैदल जाओ या अगले दिन.बहरहाल मैं विषयांतर कर गया.हेडमास्टर जी ने उस रेगिस्तानी गांव के स्कूल में पेड़ पोधों और बगीचों की हरियाली बड़ी मुश्किलों से कायम कर रखी थी.मुझे याद है कोई पोधा अगर जरा सा कुम्हला जाता था तो हेडमास्टर जी भी खुम्हला जाते थे,उदास हो जाते थे.मुझे ये भी याद है की किस तरह वो बीकानेर के पब्लिक पार्क से एक बोरी घास की भर कर लाये थे और फ़िर प्रार्थना के बाद अपने प्रवचन में बताया था की इस घास को लगना है और हरा भरा रखना है क्यों की पब्लिक पार्क के चोकीदार ने यह बोरी भरने कर पूरे पचीस पैसे लिए हैं.

क्या करें------........------............ ?

अध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक सचाइयों के बीच झूलता मेरा मन कभी कभी बहुत विचलित और विकल हो उठता है.समझ में नहीं आता कि क्या करूं? बहुत तेजी से बदल गया है सब कुछ-संस्कार,मान्यताएं,मर्यादाएं और अभिलाषाएं.मैं विगत बीस साल के इन परिवर्तनों को देखकर अनिर्णय कि स्थिति मैं हूँ.मुझे अब कहीं नजर नहीं आते वो नन्हें नन्हें बच्चे जो गर्मियों कि छुट्टियों से बहुत दिन पहले ही मां के साथ ननिहाल जाने कि तैयारिओं मैं बडे चाव से जुट जाते थे.उनको न तो किसी हिल स्टेशन पर घूमने जाने कि जिद होती थी न ही वो कहीं और जाने कि सोचते थे,आज कोई बच्चा नानी के पास जाकर उनके संस्कार लेने को राजी नहीं है,पुरानी और आउटडेट हो गई है नानी दादी.छुटियाँ शुरू होने के बाद अपने संस्कारों को गति देने के लिए अपने परिवार के साथ बीतने वाला वो डेढ़ माह का समय असल मैं एक मजबूत नैतिक शिक्षा देने वाला आयोजन होता था.एनी वे -मेरा तात्पर्य यह है कि वर्तमान बहुत बदल गया है लेकिन सवाल यह है कि यह बदलता वर्तमान किस प्रकार के भविष्य कि नींव रखने जा रहा है ?

Saturday, November 22, 2008

जर्रा जर्रा रोमांचित है आज

कहते हैं की इतिहास अपने आपको रिपीट करता है बीकानेर आज भी उन्हीं भवनों और मकानों मैं रहता है जो रियासतकाल में बने बीकानेर को वर्षों बाद बदलने के मोका मिला है बीकानेर ने बहुत से नेता अभिनेता देखे हैं,बीकानेर ने सबको देखा परखा और जाना है,पहचाना है,नजदीक से देखा है और अजमाया भी है,सबने अपने अपने तौर पर बीकानेर को बदल डालने और काया पलट डालने की बहुत सी बातें भी कही हैं कहते रहे हैं,कहते भी रहेंगे एक स्थापित तथ्य है की जिन लोगों में जो हेरिडिटी अथवा वंशानुगत गुन होते हैं वो पीढी डर पीढी चलते आते हैं,राजा महाराजाओं में जनता की सेवा के गुन खानदानी होते हैं,उन्हें सिखाना नहीं पड़ता बीकानेर ने महाराजा करनी सिंह जी को लंबे समय तक संसद में बनाये रखा परिणामस्वरूप राजस्थान कैनाल की नींव पड़ी,बीकानेर उत्तरी भारत का शिक्षा का सबसे बड़ा केन्द्र बना,कास्तकारी अधिनियम भी बीकानेर के सांसद करनी सिंह जी ने संसद में पास करवाया,उन्होंने खेलों के लिए अपनी तरफ़ से जो प्रोत्साहन खिलाड़ियों को दिया वो आज भी अविस्मरणीय हैआधुनिक बीकानेर की नींव रखने वाले महाराजा डॉ.करणी सिंह जी को हमसे अलग हुए बहुत लंबा समय नहीं बीता है,बीकानेर का शानदार आधुनिक स्वरुप उनका सपना था जो आज भी अभिलाषित है

कैसे भूलें उनको

जिनके बनाये साढे पांच सो सालों के खूबसूरत बीकानेर मैं हम बैठे हैं,जिन्होंने हमारे पूर्वजों को जीना सिखाया और हमें अपने बच्चों की तरह समझा उन रियासतकालीन सूरमाओं के बड़प्पन का आज अहसास होता है.जमाना कितना ही बदल जाए,विज्ञानं कितनी भी तरक्की करले,लोग कितने ही अग्रणी हो जायें,चाहे कुछ भी बदल जाए,नहीं बदलेगा ये एतिहासिक परिवेश,नहीं पुराणी होगी लोगों के मन की श्रद्धा भावना और नहीं पुराना होगा लोगों का विश्वाश.राजे महाराजाओं ने ये कब सोचा था की कभी वे चुनाव लडेंगे,यदि ऐसा सोचा होता तो कहानी कुछ और ही होती और वे इसी लालच मैं आकार अपनी भूमिकाएं तय कर लेते.कहते हैं कि भारत के लोग श्रद्धा और प्रेम का कामयाब प्रतिकार करना जानते हैं,हम लोग अपने राजे महाराजाओं को इश्वर का प्रतिनिधि मानते रहे हैं,उनके सजदे मैं हम सदेव अपने आपको इसलिए प्रस्तुत करते रहे हैं कि उनके दम से हमने अपने आपको जिया है और उन्होंने हमें अपने बच्चों कि तरह पाला पोषा है.बहरहाल सदियाँ बीत गई हैं,राजा महाराजा नहीं रहे हैं लेकिन आज भी रियासतकालीन सच्चाई वैसी कि वैसी हैं,हम आज भी सेंकडों सालों के उस वीरतापूर्ण परिवेश मैं बैठे हैं जो तत्कालीन हमारे राजा महाराजाओं द्वारा निर्मित किया गया था और कितनी शानदार दूरदर्शिता को हम आज देखते हैं कि संसाधनों कि अल्पता के उस काल मैं भी इन आलीशान शानदार लोगों ने हमारे आज का ख्याल रखा और आज भी हम उनके द्वारा निर्धारित परिवेश मैं स्थापित हैं।
भूमिका का तात्पर्य यह है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और सामाजिकता उसे सदियों से विरासत मैं मिलती आ रही है.गिव एंड टेक का सिद्धांत हमारी परम्परा है,हम उस प्रत्येक बात को कभी नहीं भूलते जो हमारे लिए बेहतर हो या रही हो,चाहे वो कितनी भी पुराणी बात हो,हमारा जमीर उस देन को भूलने नहीं देता जो हमें कहीं से भी मिली हो,हमारी संस्कृति हमें पुरातन अतीत कि हर पल याद दिलाती है।
बीकानेर कि बात करें तो यह पुरातन शहर उस खूबसूरत अतीत का शानदार साक्षी है जो हमारे लिए रियासतदारों ने बेहद हेरिटेज स्वरुप मैं छोड़ा है,हम ही नहीं समूचा संसार बीकानेर कि स्थिति और इसकी प्राकृतिक सुन्दरता के गीत गाता है ,बीकानेर को देखने सारा संसार आता है,ऐसे शानदार बीकानेर के निर्माण का श्रेय जिन लोगों को जाता है वे और उनकी पीढी आज भी बीकानेर की जनता के लिए आदरणीय एवं सम्मानीय हैं.बीकानेर के लिए उन्होंने जो कुछ किया वो भुलाया नहीं जा सकता और बीकानेर की जनता की भूलने कि आदत भी नहीं है,जनता राजपरिवार और उनके वजूद के लिए कुछ भी करने को तत्पर और तैयार है.