Thursday, May 28, 2009

शेष..........

बात चल रही थी शिक्षण व्यवस्था की,मैंने ये बताया की किस तरह रेगिस्तान के रेतीले इलाके के एक गांव के स्कूल में हेड मास्टर जी बीकानेर के पब्लिक पार्क के चपरासी को पच्चीस पैसे देकर दूब की बोरी भरवा कर लाये थे वो दूब कितनी खुशी के साथ स्कूल के बच्चों और अध्यापकों ने लगाई थीजहाँ तक मुझे याद है दोनों भागों में काफी दूर तक खुदाई करके एक दिन में ही दूब लगा दी गईदूब में फूलों के पोधे लगाये गए,चारों तरफ़ मेहंदी के पोधों की बाड़ लगाई गई,करीब एक महीने में दूब खूब हो गई,हरियाली ही हरियाली,महकते कनेर के पुष्प,गेंदे,चमेली,रात की रानी,सूरजमुखी सहित बहुत कुछ थोड़े ही समय में विकसित हो गयामैं इतनी लम्बी चोडी भूमिका क्यों बाँध रहा हूँ ये मैं भी नहीं जानता लेकिन इतना जानता हूँ की जो कुछ मैं आपको बताना चाहता हूँ उसकी गंभीरता को जानने के लिए ये भूमिका बहुत जरूरी हैमैं यह बताना चाहता हूँ की किस प्रकार सीमित संसाधनों के बावजूद मजबूत इच्छाशक्ति से जंगल में मंगल किए जा सकते हैं,कैसे उजाड़ और सुनसान गांवों में रोनक पैदा की जा सकती है,कैसे नीरस और उबाऊ शिक्षण को रोचक और सरस बनाया जा सकता है,कैसे समूचे समाज और पूरे गांव को स्कूल से जोड़ा जा सकता हैआप अचम्भा करेंगे,मैं कहता हूँ की नालंदा और तक्षशिला क्या चीज रहे होंगे,उनसे भी बहुत बेहतर व्यवस्था आपको दिखा देगा मेरा ये गांव,जिसको मेरे बचपन ने खूब जिया है,जिसकी सुरभि बहुत दूर दूर तक फैली और जिसे देखने न जाने कहाँ कहाँ से लोग आते रहे.

Monday, May 4, 2009

हमारी शिक्षा व्यवस्था - दो दशक का भयावह बदलाव

मुझे आज भी याद है सन १९७५ का वो दिन जब मैं पांचवीं कक्षा में पढता था.१० साल की उम्र रही होगी मेरी.उस समय स्कूल आज की तरह टाइम में बंधे हुए नहीं होते थे.अध्यापक लोग पूरे समय के लिए स्कूलों में होते थे क्यों की दूर दराज के गांवों में आने जाने की सुविधा नहीं होती थी और गुरुजन हमेशा स्कूलों में ही रहकर सरे दिन पढाया करते थे.राजस्थान के बीकानेर जिले के बहुत रेगिस्तानी इलाके के एक गांव की बात कर रहा हूँ में.मुझे याद है उस गांव तक जाने के लिए १७ किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था.साधन के नाम पर पंडित बलराम जी का एक ऊँट गाडा हुआ करता था जिस पर फटी हुई बोरियों की छत लगा कर और फटा पुराना तिरपाल बिछा कर वो सवारियों को स्टेशन तक पहुँचाया करते थे.जिसको जाना होता वो सुबह सुबह ही उनके यहाँ जाकर अपनी जगह बुक करवा दे तो ठीक नहीं तो फ़िर पैदल जाओ या अगले दिन.बहरहाल मैं विषयांतर कर गया.हेडमास्टर जी ने उस रेगिस्तानी गांव के स्कूल में पेड़ पोधों और बगीचों की हरियाली बड़ी मुश्किलों से कायम कर रखी थी.मुझे याद है कोई पोधा अगर जरा सा कुम्हला जाता था तो हेडमास्टर जी भी खुम्हला जाते थे,उदास हो जाते थे.मुझे ये भी याद है की किस तरह वो बीकानेर के पब्लिक पार्क से एक बोरी घास की भर कर लाये थे और फ़िर प्रार्थना के बाद अपने प्रवचन में बताया था की इस घास को लगना है और हरा भरा रखना है क्यों की पब्लिक पार्क के चोकीदार ने यह बोरी भरने कर पूरे पचीस पैसे लिए हैं.

क्या करें------........------............ ?

अध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक सचाइयों के बीच झूलता मेरा मन कभी कभी बहुत विचलित और विकल हो उठता है.समझ में नहीं आता कि क्या करूं? बहुत तेजी से बदल गया है सब कुछ-संस्कार,मान्यताएं,मर्यादाएं और अभिलाषाएं.मैं विगत बीस साल के इन परिवर्तनों को देखकर अनिर्णय कि स्थिति मैं हूँ.मुझे अब कहीं नजर नहीं आते वो नन्हें नन्हें बच्चे जो गर्मियों कि छुट्टियों से बहुत दिन पहले ही मां के साथ ननिहाल जाने कि तैयारिओं मैं बडे चाव से जुट जाते थे.उनको न तो किसी हिल स्टेशन पर घूमने जाने कि जिद होती थी न ही वो कहीं और जाने कि सोचते थे,आज कोई बच्चा नानी के पास जाकर उनके संस्कार लेने को राजी नहीं है,पुरानी और आउटडेट हो गई है नानी दादी.छुटियाँ शुरू होने के बाद अपने संस्कारों को गति देने के लिए अपने परिवार के साथ बीतने वाला वो डेढ़ माह का समय असल मैं एक मजबूत नैतिक शिक्षा देने वाला आयोजन होता था.एनी वे -मेरा तात्पर्य यह है कि वर्तमान बहुत बदल गया है लेकिन सवाल यह है कि यह बदलता वर्तमान किस प्रकार के भविष्य कि नींव रखने जा रहा है ?

Saturday, November 22, 2008

जर्रा जर्रा रोमांचित है आज

कहते हैं की इतिहास अपने आपको रिपीट करता है बीकानेर आज भी उन्हीं भवनों और मकानों मैं रहता है जो रियासतकाल में बने बीकानेर को वर्षों बाद बदलने के मोका मिला है बीकानेर ने बहुत से नेता अभिनेता देखे हैं,बीकानेर ने सबको देखा परखा और जाना है,पहचाना है,नजदीक से देखा है और अजमाया भी है,सबने अपने अपने तौर पर बीकानेर को बदल डालने और काया पलट डालने की बहुत सी बातें भी कही हैं कहते रहे हैं,कहते भी रहेंगे एक स्थापित तथ्य है की जिन लोगों में जो हेरिडिटी अथवा वंशानुगत गुन होते हैं वो पीढी डर पीढी चलते आते हैं,राजा महाराजाओं में जनता की सेवा के गुन खानदानी होते हैं,उन्हें सिखाना नहीं पड़ता बीकानेर ने महाराजा करनी सिंह जी को लंबे समय तक संसद में बनाये रखा परिणामस्वरूप राजस्थान कैनाल की नींव पड़ी,बीकानेर उत्तरी भारत का शिक्षा का सबसे बड़ा केन्द्र बना,कास्तकारी अधिनियम भी बीकानेर के सांसद करनी सिंह जी ने संसद में पास करवाया,उन्होंने खेलों के लिए अपनी तरफ़ से जो प्रोत्साहन खिलाड़ियों को दिया वो आज भी अविस्मरणीय हैआधुनिक बीकानेर की नींव रखने वाले महाराजा डॉ.करणी सिंह जी को हमसे अलग हुए बहुत लंबा समय नहीं बीता है,बीकानेर का शानदार आधुनिक स्वरुप उनका सपना था जो आज भी अभिलाषित है

कैसे भूलें उनको

जिनके बनाये साढे पांच सो सालों के खूबसूरत बीकानेर मैं हम बैठे हैं,जिन्होंने हमारे पूर्वजों को जीना सिखाया और हमें अपने बच्चों की तरह समझा उन रियासतकालीन सूरमाओं के बड़प्पन का आज अहसास होता है.जमाना कितना ही बदल जाए,विज्ञानं कितनी भी तरक्की करले,लोग कितने ही अग्रणी हो जायें,चाहे कुछ भी बदल जाए,नहीं बदलेगा ये एतिहासिक परिवेश,नहीं पुराणी होगी लोगों के मन की श्रद्धा भावना और नहीं पुराना होगा लोगों का विश्वाश.राजे महाराजाओं ने ये कब सोचा था की कभी वे चुनाव लडेंगे,यदि ऐसा सोचा होता तो कहानी कुछ और ही होती और वे इसी लालच मैं आकार अपनी भूमिकाएं तय कर लेते.कहते हैं कि भारत के लोग श्रद्धा और प्रेम का कामयाब प्रतिकार करना जानते हैं,हम लोग अपने राजे महाराजाओं को इश्वर का प्रतिनिधि मानते रहे हैं,उनके सजदे मैं हम सदेव अपने आपको इसलिए प्रस्तुत करते रहे हैं कि उनके दम से हमने अपने आपको जिया है और उन्होंने हमें अपने बच्चों कि तरह पाला पोषा है.बहरहाल सदियाँ बीत गई हैं,राजा महाराजा नहीं रहे हैं लेकिन आज भी रियासतकालीन सच्चाई वैसी कि वैसी हैं,हम आज भी सेंकडों सालों के उस वीरतापूर्ण परिवेश मैं बैठे हैं जो तत्कालीन हमारे राजा महाराजाओं द्वारा निर्मित किया गया था और कितनी शानदार दूरदर्शिता को हम आज देखते हैं कि संसाधनों कि अल्पता के उस काल मैं भी इन आलीशान शानदार लोगों ने हमारे आज का ख्याल रखा और आज भी हम उनके द्वारा निर्धारित परिवेश मैं स्थापित हैं।
भूमिका का तात्पर्य यह है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और सामाजिकता उसे सदियों से विरासत मैं मिलती आ रही है.गिव एंड टेक का सिद्धांत हमारी परम्परा है,हम उस प्रत्येक बात को कभी नहीं भूलते जो हमारे लिए बेहतर हो या रही हो,चाहे वो कितनी भी पुराणी बात हो,हमारा जमीर उस देन को भूलने नहीं देता जो हमें कहीं से भी मिली हो,हमारी संस्कृति हमें पुरातन अतीत कि हर पल याद दिलाती है।
बीकानेर कि बात करें तो यह पुरातन शहर उस खूबसूरत अतीत का शानदार साक्षी है जो हमारे लिए रियासतदारों ने बेहद हेरिटेज स्वरुप मैं छोड़ा है,हम ही नहीं समूचा संसार बीकानेर कि स्थिति और इसकी प्राकृतिक सुन्दरता के गीत गाता है ,बीकानेर को देखने सारा संसार आता है,ऐसे शानदार बीकानेर के निर्माण का श्रेय जिन लोगों को जाता है वे और उनकी पीढी आज भी बीकानेर की जनता के लिए आदरणीय एवं सम्मानीय हैं.बीकानेर के लिए उन्होंने जो कुछ किया वो भुलाया नहीं जा सकता और बीकानेर की जनता की भूलने कि आदत भी नहीं है,जनता राजपरिवार और उनके वजूद के लिए कुछ भी करने को तत्पर और तैयार है.

Tuesday, November 4, 2008

तूफानों से बुझते नहीं दिये

निर्बल नहीं होता कभी नन्हा सा दिया
तूफानों से बुझता नहीं रोशनी का दिया
आत्मबल का अभाव होता है तूफानों की तेजी में
संकल्पों का विश्वास होता है नन्हें दीपक की ज्योति में
तिमिर का एक एक जर्रा ख़त्म करता है दिया
अंधेरों की काली चादर फैलता है बेलगाम तूफ़ान
काली चादर को भेद देता है नन्हें दिए का शालीन अनवान.....

कैसा प्रजातंत्र???????

मैं अब तक ये न जान सका
की असल में प्रजातंत्र क्या है!
ये केवल वोट देने का काम है या
प्रजा का इसमें कहीं कोई नाम है!!
मैनें न तो प्रजा की कोई देखी भागीदारी
न कभी जिन्दा देखी इस प्रजा की खुद्दारी
जाने क्यों लोग वोट मांगने आते हैं
क्यों गरीब जैसी झोली चुनाव में फैलाते हैं
जबकि कोई वेतन इनको मिलते मैंने नहीं देखा
कोई मासिक इन्क्रीमेंट लगते भी कभी न पाया
फ़िर भी किस कदर दीवाने हैं चुनाव जीतने को
कोई भी कमी उठा कर नहीं रखते चुनावों में
जनता को रखते हैं किस कदर भुलावों में!!!!!!!
मैं सोचता रहता हूँ के जब सब जानते हैं झूठों को
पहचानते हैं सरेआम इनकी झलकती करतूतों को
फ़िर क्यों अपने पर शासन करने को वोट देते हैं
क्यों अपने आप ही अपनों को चोट देते हैं
खुली खुली होती है बातें इन शाशकों की
हर पल झूठ से पुती होती है हरकतें इन नेताओं की
आम आदमी आखिर क्यों मजबूर है इनके लिए
क्यों देता है वोट क्यों नहीं रख लेता अपने लिए ????????????