Saturday, June 6, 2009

अमरबेल........(७) ६ जून ०९

....स्कूल में मैंने कभी किसी भी मास्टर जी को कुर्सी पर बैठ कर पढाते हुए कभी नहीं देखा,जब तक क्लास चलती थी मास्टर जी ब्लैक बोर्ड पर खडे खडे ही पढाते थे ,मुझे याद है गलती से भी स्कूल टाइम में क्लास रूम में कोई कुर्सी रह भी जाती तो चपरासी उसे उठा कर ले जाता.बच्चे हालाँकि दरियां बिछा कर नीचे फर्श पर ही बैठते थे,लेकिन पूरा डायरी के मुताबिक अध्ययन करवा कर मास्टर जी होमवर्क देते थे. स्कूल में सभी अध्यापक अपने विषयों की पूरी तयारी करके आते और पूरी कुशलता के साथ उसे सिखाने की कोशिश करते,यही कारण था कि उस काल में भी स्काउटिंग,टूर्नामेंट,सीखो कमाओ,अल्पबचत,खेती आदि को शिक्षा के साथ जोड़ दिया गया था.मैं ख़ुद अरंड के साबुन बनाना,मोमबत्ती बनाना,चाक निर्माण,अमृतधारा बनाना आदि सीखो कमाओ योजना के तहत सीखा था,जो मुझे आज भी याद है. स्कूल में जो बाग लगाया था उसे सींचने के लिए पाइप लाइन लगाने के लिए रुपयों कि जरूरत थी,हम सब बच्चे बाग को सूखता नहीं देख सकते थे,बरसात का मोसम था,हमने स्कूल के पिछली तरफ खली पडी जमीन पर ग्वार बीजने का फ़ैसला किया,जो फसल आयेगी उसे बेच कर पानी का नल लगवा लेंगे.हमने लकडियाँ आपस में जोड़ कर कल बनाये,कोई घर से ग्वार का बीज ले आया,कोई लोहे कि नुकीली चीज ले आया,ग्वार को जमीन पर छिड़क कर उस पर हल चला दिया.हल भी बडे मजेदार थे,दो लडके उसे आगे से खींचते और एक पीछे से पकड़ता,करीब काफी जमीन पर बुआई कर डाली,दो तीन बार बरसात और हो गई,ज्यों ज्यों ग्वार बढ़ता गया हमारी खुशियाँ बढ़ती गई,हम उस ग्वार से ग्वारफली कच्ची कच्ची तोड़ कर अपने गुरुजनों के घर भी पहुंचे करते थे,आखिरकार टाइम आने पर हमने ग्वार उखाडा,एक खलिहान बनाया,ग्वार कूट पीट कर निकल डाला,मुझे ये तो याद नहीं कि कितना हुआ,पर ये याद है कि बेचने पर १३५ रूपये मिले थे,इस राशिः से हमारे बाग के लिए ९० फीट पाइप आया था,हम वाटर वोर्क्स जा कर वहां से खडगावत जी को लेआए थे और हाथो हाथ कनेक्सन करवाया था,तब से हमारा बाग हर भरा हो गया था और उसमें कनेर,गेंदा,चमेली,रात कि रानी,जूही,सूरजमुखी,एलिया,मेहँदी,समेत अनेक प्रकार के फूल महकने लगे थे,मुझे याद है जब भी कोई अध्यापक या अभिभावक बाहर जाते थे तो उन्हें स्कूल के लिए कोई न कोई फूलदार फलदार पौधा लेकर आना ही पड़ता था.पानी कि सुविधा होते ही स्कूल की बाड़ के साथ साथ सिसम,सरेस,नीम,खेजडी,पर्किन्सोनिया,रोहिडा,अमरुद,अनार,आम बदाम,शहतूत,ल्हेसुआ,और न जाने कोन कोन से पौधे लग गये थे.हेड मास्टर जी ने एक एक विद्यार्थी को एक एक पौधा गोद दे दिया था,जिसका पौधा ज्यादा अच्छा होता और खूब बढ़ता उसे प्रार्थना में शाबाशी मिलती थी,पौधों को जीवित रखना एक प्रतियोगिता जैसा बन गया था,सब अपने अपने घरों से गोबर और मींगनी कि खाद लेकर आते थे और रोजाना अपने अपने पौधों कि निराई गुडाई करते थे.स्कोल शाम होते होते महक उठता था भिन्न भिन्न्प्रकर के फूलों कि खुसबू ठंडी रातों में दूर तक आती थी.खूब हरे भरे बाग में खूबसूरत माहोल में अब गांव वाले भी रातों को आकर बैठने लगे थे,अध्यापकों और गांव वालों का आपस में रोजाना शाम को घंटों तक मिलना होता था,और दिन में स्कूल न आ सकने वाले ग्रामीण रातों को स्कूल में आकर अपने बच्चों कि प्रगति जानने लगे.स्कूल का बाग चाहे पब्लिक पार्क जैसा नहीं बना होगा लेकिन पब्लिक पार्क कि वो दूब किसी भी प्रकार से मुझे पब्लिक पार्क से कम नहीं लगती.चाहे कैसे भी हो गांव का स्कूल के साथ एक प्रतिदिन का रिश्ता जरूर बन गया था.आज मैं सोचता हूँ कि कितनी मुश्किलों से तैयार हुआ था वो बाग और उसके असली मायने भी कितने खूबसूरत थे.जहाँ सैंकडों किलोमीटर तक कोई कस्बा या शहर नहीं था,जहाँ किसी भी प्रकार कि कोई सुविधा नहीं थी,जहाँ आने से लोग घबराते थे,उस दूर दराज के रेतीले धोरों वाले एक गांव में किस प्रकार जंगल में मंगल हो गया था,और इसके कितने शानदार मायने निकले?

अमरबेल......(६) ६ जून २००९

हेड मास्टर जी की डायरी मेरे हाथ लगी थी,मैनें उसमें से काफी कुछ उतार लिया था,कुछ अंश इस प्रकार हैं."११.९.७७ को शाला की स्थिति-शाला बाउंड्री नही के समान है,मामूली काँटों की बाड़ जो जगह जगह से टूटी हुई है,पशु रात को शाला के कमरों में घुस जाते हैं,मेन गेट नहीं है,मेनगेट की जगह दो लकड खडे करके बीच मेन काँटों का एक भीन्टका खडा कर दिया जाता है,शाला के तीन कमरों के पुराणी टाइप के दरवाजे हैं.एक हॉल,दो कमरे व बरामदा गिरने वाले हैं,समस्त कमरों में पानी चूता है,हॉल व दो कमरों के किवाड़ नहीं है,बारियाँ,अलमारियां भी नहीं है,दो कमरों के रोशनदान भी नहीं है,दो कमरों की छत गिरने वाली है,बाले(शहतीर)टूट चुके हैं,चोक टूट टूट कर निचे गिर रहे हैं,इस सूरत में बच्चों को कमरों में बिठाया जाना सम्भव नहीं है,ऐसा अहसास होता है की किसी भी मौसम के काबिल ये कमरे नहीं है,क्योंकि दरवाजों और खिड़कियों के नहीं होने से हवा,वर्षा,सर्दी आदि का बचाव किसी भी स्थिति में नहीं किया जा सकता."
इसी डायरी में मुझे कुछ स्लोगन लिखे भी मिले जिनका वजूद मुझे बहुत सामयिक लगता है ,और लगता है की कुछ बातें कभी पुराणी नहीं होती ।
आज हम हैं ,कल हमारी यादें होगी ,
जब हम न होंगे ,तब हमारी बातें होंगी ।
"ईर्ष्या और प्रतिशोध,मानव के दो बडे शत्रु हैं."
"मानव परिस्थितियों का दास है,मगर परिस्थितियाँ मानव द्वारा ही पैदा की जाती हैं.मानव परिस्थितियों पर काबू पा सकता है,परिस्थिति अनुकूल और प्रतिकूल होती ही रहती है.मानव में परिस्थितियों पर काबू पाने की हिम्मत होनी चाहिए"
"जिसकी अन्य पुरूष सर्वत्र प्रशंशा करते हैं वह निर्गुण होते हुए भी स्तुति करने योग्य हो जाता है,किंतु यदि कोई इन्द्र के समान ऐश्वर्यशाली होकर भी अपने मुख से अपनी बडाई करने लगे तो वह पुरूष निश्चय ही लोलुपता को प्राप्त हो जाता है ,अतःअच्छे व्यक्ति को चाहिए की वह अपने मुख से अपनी स्तुति न करे "
"जिस कार्य को आप करना चाहते हैं ,उसका फल देखलो ,यह भी देखलो कि क्या आप इसे कर सकते हैं?अगर फल अच्छा है तो तो कार्य चालू कर दो ,साहस में प्रतिभा ,शक्ति और जादू है ,सिर्फ़ काम के लिए जुट जाओ ,बाधाएं आयेंगी,पर कार्य पूर्ण होगा ,विश्वास द्रढ़ होना चाहिए "
कुछ इस प्रकार कि बातें डायरी में लिखी हुई है,बहुत कुछ और भी लिखा हुआ है लेकिन मुझे इस बात पर बहुत हैरानी है कि जब किसी भी प्रकार का कोई संसाधन नहीं था,तब वहाँ अधिकारी, नेता ,पत्रकार आदि कैसे पहुंच जाते थे और क्यों?१९७० से पहले के स्कूल का चित्रं देखें तो वो ये था कि दो मास्टर थे,बहुत कम आते थे और जब आते थे तो सारे दिन कोई पढाई नहीं होती थी,गांव का स्कूल की तरफ कोई लगाव नहीं था,बच्चे आते थे खेल कूद कर वापस चले जाते थे,कोई nirikshan करने wala होने का तो सवाल ही नहीं था.स्कूल की हालत ये थी की न तो पढाई का कोई माहोल था न पढ़ने वालों का.ऐसा स्कूल और देश के लिए नजीर बन जाए ऐसा किसी ने सोचा नहीं था.

Saturday, May 30, 2009

अमरबेल..........३० मई २००९ (५)

...प्रार्थना के बाद सबसे पहले पहली कक्षा अपने कमरे में भेजी जाती,ध्यान रखा जाता की कमरे में प्रवेश तक लाइन न टूटे,कमरे में भी सबके लिए स्थान नियत थे,कोन कहाँ बैठेगा?फ़िर दूसरी,तीसरी,और सभी क्लासें अपने अपने कमरों में जाती थी.हर एक क्लास के पीछे होते थे हाथ में हाजरी रजिस्टर लिए क्लास टीचर.हेड मास्टर जी तुंरत एक राउंड पूरी क्लास्सों का लगाते,कोन गेरहाजिर रहा पूछते और अपने ऑफिस में आ जाते.ऑफिस में आकर वे सभी अध्यापकों की टीचर डायरी पढ़ते,कौन अध्यापक आज क्या पढाएगा?क्या तयारी करके आए हैं? सबकी डायरियां देखने के बाद वे एक एक करकर क्लास में जाते,सबसे पीछे कुछ देर खडे रहते,कुछ अपनी डायरी में लिखते,फ़िर चुप चाप चले जाते। उनका ये रूटीन मैंने लगातार नो साल तक देखा,कभी भी वे अपने इस रूटीन से इधर उधर नहीं होते थे.चपरासी को निर्देश थे,जब तक हेड मास्टर जी नहीं कहें घन्टा(पीरीअड)नहीं बजेगा,पुराणी रेल लाइन का एक लम्बा सा टुकडा घंटी हुआ करता था,४० मिनट पूरे होते ही हेड मास्टर जी की निगाहों से चपरासी बजरंग की निगाहें मिलती थी और घन्टा घनघना उठता था,मजाल है एक सेकंड की भी देर हो जाए?आधी छुट्टी के बाद पांचवां,छटा,सातवां,और आठवां घंटा पॉँच पॉँच मिनट कम करके आखिरी २० मिनट का एक घन्टा खेल के लिए होता था.खेल का विशाल मैदान और उसमें वोलीबाल,फुटबाल,खो खो,कबड्डी,दोड़,लम्बी कूद,ऊंची कूद,रिंग,रस्सी कूद,और न जाने कोन कोन से खेल रोजाना खिलाये जाते थे.तोला राम जी की स्काउटिंग भी प्रत्येक सोमवार को नियत थी.हाँ एक बात मैं बताना भूल गया,एक सप्ताह में एक दिन एक क्लास की बारी पुस्तकालय और वाचनालय में जाने की होती थी,जहाँ पर पत्र पत्रिकाएं होती थी जैसे-साप्ताहिक हिंदुस्तान,धरमयुग,चंदामामा,लोटपोट,पराग,नंदन,कादम्बिनी,हंस,सरिता,मुक्ता,चंपक,आदि .इनके अलावा जो लाइब्ररी में कहानियों की किताबें लेने चाहते थे उन्हें इंचार्ज शिव कर्ण जी रजिस्टर में नाम लिख कर किताबें इस्स्यु कर देते थे.मुझे जो किताब सबसे अच्छी लगती थी वो "बाताँ री फुलवारी" थी ,उस समय तो लेखक का ध्यान नहीं देते थे लेकिन आज पता चला की वो तो विजय दान देथा थे जिनकी किताब पर पहेली फ़िल्म बनी.इतनी बडी लाइब्रेरी हजारों किताबें थी उसमें,पढ़ने का मजा आ जाता था.

अमरबेल......३० मई २००९ (४)

आठ कक्षाएं और इतने ही मास्टर,इतने ही कमरे,सबके सब सुंदर और साफ सुथरे,सुबह स्कूल खुलते ही जिनकी सफाई की बारी होती थी वो छात्र जल्दी आकर कमरों की सफाई करते थे,दरी पट्टियाँ करीने से बिछाते थे और बैठने की व्यवस्था को खूबसूरती से जमा लेते थे.ठीक टाइम पर प्रार्थना की पहली घंटी बजती थी,जिसके पॉँच मिनट बाद दूसरी घंटी बज जाती थी,इस पॉँच मिनट के वक्फे में पहली से आठवीं तक की आठ लाइनें सीधी सीधी लग चुकी होती थी,पीटीआई साहब प्रत्येक लाइन के सामने खडे होकर लाइन सीधी करवा देते थे,सबसे छोटा सबसे आगे,सबसे लम्बा सबसे पीछे,लड़कियों की लाइन भी इसी प्रकार अलग से लगती थी.पिन ड्राप साइलेंस,कोई खुसर फुसर नहीं,पीटीआई जी सावधान विश्राम करवाते,फ़िर जिनकी बारी होती थी वो दो लड़के और दो लड़कियां सामने के चोक पर आ जाते,प्रार्थना स्थिति का आदेश मिलता,सबके दोनों हाथ छाती के आगे आकर नफासत से जुड़ जाते,प्रार्थना शुरू करने का आदेश मिलता,आगे वाली टीम एक पंक्ति गाती,सभी उनका उसी लयऔर ताल में अनुसरण करते.प्रत्येक वर की अलग अलग प्रार्थना होती थी,मुझे कुछ प्रार्थनाओं की पहली पंक्तियाँ आज भी याद है,करीब ३४ साल बाद भी,वो इसलिए की केवल मैं ही नहीं उस समय पढ़ने वाले सभी बच्चों के दिल में वो स्कूल एकदम वैसा ही स्थापित होगा जैसा मेरे दिल दिमाग में है,क्योंकि वो स्कूल और वो गुरुजन थे ही ऐसे,जिन्हें जीवन भर विस्मृत नहीं किया जा सकता या यूँ कहें वे विस्मृत हो ही नहीं सकते.बहरहाल,प्रार्थना होती,फ़िर रास्ट्र गान ,फ़िर प्रतिज्ञा स्थिति में आकर प्रतिज्ञा बोली जाती."भारत मेरा देश है,समस्त भारतीय मेरे भाई बहन है...."इसके बाद सभी गुरुजन जो जिस जिस क्लास के क्लास टीचर होते थे वो एक एक करके सबके नाखून और दांत देखते,कपडे देखते की धुले हुए हैं या नहीं,जिनके नाखून बढे होते,दांत खराब होते या कपडे मैले होते,उन्हें अलग से चोकी पर एक लाइन में खडा कर लिया जाता और सबको उनके नाखून और दांत दिखाए जाते,यानि सार्वजनिक रूप से उन्हें उनकी कमियां बतादी जाती थी.इसके बाद हेड मास्टर जी,सामयिक बात बताते,फ़िर कोई न कोई प्रेरक प्रसंग बडे रोचक अंदाज में सुनाते.यहाँ में इस बात का विशेष उल्लेख करना जरूरी समझता हूँ की एक अध्यापक में बोलने की और प्रस्तुतिकरण की कला का होना बहुत जरूरी है,हेड मास्टर जी की इस शानदार कला का में आज भी कायल हूँ,उनकी कही गई एक एक बात आज भी न केवल मेरे बल्कि मैं समझता हूँ उनके प्रत्येक विद्यार्थी के दिल पर लिखी मिलेगी.बहुत कम लोग जानते होंगे "नाग कन्या मनसा ","वीर बालक रत्नसेन,""धन्ना भक्त","भक्त प्रह्लाद","राक्षस जिसकी जान तोते में थी","बालक रोहिताश ","पन्ना धाय " आदि अनेक कहानियाँ संक्षेप में प्रार्थना में ही सुना देते थे हेड मास्टर जी.

Friday, May 29, 2009

विप्लव.......



तेरे सीने में नहीं तो मेरे सीने में ही सही

हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए,

सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं

मेरी कोशिश है की ये सूरत बदलनी चाहिए

जिसके बिना कुछ भी नहीं.....


जिसके बिना मैं कुछ भी नहीं,मेरा वजूद कुछ भी नहीं,उसके जिक्र के बिना मेरा ब्लॉग कैसे पूरा हो सकता है?खुले अंतःकरण से मेरा सब कुछ उसको समर्पित,जिसने बिना किसी शिकवा शिकायत के अपने जीवन को मेरे नाम कर दिया और प्रतिफल में कभी कुछ नहीं चाहा.अपने जीवन की सफलता का श्रेय मैं खुले दिल से अपनी माँ के बाद यदि किसी को देता हूँ तो वह यही तस्वीर है,जो निरंतर,अनथक,मुझे सच्चाई बनाये हुए है,जिसके किसी भी पल का बदला में नहीं उतार सकता,इस सत्य को सार्वजनिक करके मैं गौरव महसूस करता हूँ.

अमरबेल ......२९ मई २००९ (३)

मैं आपको बताता हूँ कि वास्तव में और दिखावे में कितना और क्या फरक होता है?आज जब हम हर काम दिखावे के लिए करके अपने आप को तुर्रम खान समझ रहे हैं,वही इस स्कूल का उदाहरण देखिये,मेरा आँखों देखा सच है,दावा है कि आप इसे सुन कर रोमांचित हो उठेंगे.शायद सन १९७५ का कोई दिन था,दिन का स्कूल हुआ करता था,१२ बजे छुट्टी हो गई थी,हॉल के आगे वाले बरामदे के आगे एक बहुत बडी अमरबेल थी जिसकी जड़ें बहुत गहरी थी और उसका तना पेड़ के तने जैसा था,हेड मास्टर जी कई दिन से इस बेल को दुरुस्त करने कि बात कह रहे थे लेकिन शायद उन्हें समय नहीं मिला था,आखिरकार टाइम मिला और वो बनियान और तोलिया पहन कर उस बेल के निचे घुस गए उनके साथ सहयोगी अध्यापक भी थे.मैं वहीँ खड़ा था,देख रहा था,बहुत भारी भरकम बेल को उठाना बहुत जोर लगने वाला काम था,तीन चार बच्चे,हेड मास्टर जी और अन्य मास्टर जी जोर लगा कर भारी बेल को उठाने कि कोशिश कर रहे थे.पसीना चू रहा था,हाल बेहाल थे,मुझे ज्यों का त्यों याद है. एक पीले रंग कि जीप आई,दो अफसर उतरे,पूछा हेड मास्टर जी कहाँ है? अब हेड मास्टर जी कैसे निकले?उनके सर पर तो अमरबेल का भार था,तोलिया गिर चुका था,खली कच्छे में हेड मास्टर जी,बेल को छोडे तो बेल गिर जाए,तोलिया कौन संभाले? अफसर थे इंसपेक्टर ऑफ़ स्कूल देवी सिंह कछावा,उन्होंने अमरबेल के नीचे हलचल देखी वहां जा पहुंचे,देखा तो हेड मास्टर जी कच्छे में सर पर भारी बेल.दोनों किन्कर्तव्यविमूध हालत में.विद्वान इंसपेक्टर ने स्थिति समझी,जैसे तैसे हेड मास्टर जी को बेल के निचे से बाहर निकाला और गले से लगा लिया,उनकी ऑंखें भरी हुई थी,न जाने कौनसा भाव उनके भीतर उमडा पड़ रहा था,वो भाव विव्हल हो गए.मुझे याद है कछावा साहब पूरे दिन रुके थे और समूची स्कूल को गोर से देखा था,न जाने वो क्या क्या ढूंढ रहे थे.कहने को तो यह साधारण सी बात है लेकिन उस विद्वान अधिकारी ने एक स्कूल की जो परिभाषा उस दिन देखी ऐसी अन्यत्र कहीं मिल सकती है भला?