Friday, April 5, 2024
अमरबेल क्या है?
बरसों बाद इस ब्लॉग की याद तब आई जब इसके प्रेरक मेरे पिताजी मुझे छोड़ कर स्वर्गवासी हो गए।वास्तव में अमरबेल शीर्षक उनको ही समर्पित है,अमरबेल कोई काल्पनिक नहीं सचमुच का कथानक है जिसे मैंने बचपन से जिया है।इसकी एक अनुभूत परिस्थिति है कि 2009 में जिस कथानक को बनाया,जिसको मूर्त रूप देने का विचार किया उसको सच बनाने में एक दशक से अधिक का समय व्यतीत हो गया।कहा जाता है कि शाहकार जब बनते हैं तो उनकी नींव बहुत गहरी होती है,अमरबेल कोई साधारण घटनाक्रम नहीं है,अमरबेल की वास्तविकता में आधी शताब्दी की सच्चाइयां है,कई पीढ़ियों का उतार चढ़ाव है,बहुत कुछ ऐसा है जिसे वर्तमान परिवेश में सोचा भी नहीं का सकता। अमरबेल विषम परिस्थितियों का ऐसा लेखा जोखा है जो जीवन में श्रेष्ठ नागरिक निर्माण,शिक्षा की वास्तविक जरूरतों,ग्राम विकास सहित सर्वांगीण आमूलचूल परिवर्तन सहित अंततः देश के नवनिर्माण तथा नागरिक निर्माण की पृष्ठभूमि है।अमरबेल शीर्षक चाहे जो भी कुछ कहता हो लेकिन इस शीर्षक तले जो भी उकेरण होने जा रहा है वो अभूतपूर्व है।अमरबेल में हमारी संस्कृति,हमारी परंपराएं,हमारे परिवार,हमारे विद्यार्थी,अभिभावक,स्कूल,पाठ्यक्रम,प्रशासनिक व्यवस्था,शिक्षा में प्रशासन,शिक्षण की कला, संस्कृति का संरक्षण,नागरिक निर्माण की जिम्मेदारी और जवाबदेही सहित चारित्रिक उत्थान,चरित्र निर्माण,बालिका शिक्षा,महिला संबल,अंतिम छोर तक शैक्षिक जागृति,रूढ़ियों,अंधविश्वासों और स्थापित कुरीतियों के प्रति संजीदगी सहित वो सब कुछ है जो सामाजिक ताने बाने के लिए आवश्यक है। अमरबेल हमें बताता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में राजनीतिक हस्तक्षेप को कोई स्थान नहीं है, अमरबेल एक विशाल पुराण कहा जा सकता है जो हमें ये बताता है कि शिक्षा में अगर सबकी सामूहिक भागीदारी हो तो किसी शासन प्रशासन की बहुत जरूरत नहीं।आज से पचास साल पहले की शैक्षिक व्यवस्था को यदि हैं गौर से देखें तो एक ही बात समझ में आती है कि कक्षा कक्ष हो ना हो विद्यालय में प्राण होने अनिवार्य है।अमरबेल हमें बताती है कि कलेक्टर, एसपी थानेदार नाजिम हाकिम सब के सब स्कूल के बाद ही है।स्कूल अगर शिद्दत से चाह ले तो शेष प्रशासन को कुछ करने की दरकार नहीं।स्कूल ऐसा संस्थान होता है जहां आईपीसी सीपीसी और सभी पैनल कोड बात बात में समझा दिए जाते हैं,स्कूल वो जगह है जहां बताई और सिखाई गई बात के गंभीर और स्थाई मायने निकलते हैं।थानेदार और मजिस्ट्रेट जो बात डर और भय से नहीं सीखा सकते वो बात हमारे स्कूल सहज ही दिलों में पैबस्त कर देते हैं।अमरबेल एक कथानक है, अमरबेल एक सत्य वृतांत है, अमरबेल गवाह है उन विपन्न हालातों का जब पढ़ाई के लिए वातावरण की नहीं,कमरों की नहीं सिर्फ और सिर्फ माहौल और मनोबल की जरूरत होती है,अमरबेल कहता है कि विद्यालय चारदीवारी,कमरों,और आधुनिक सुख सुविधाओं से नही बल्कि शिक्षको, अभिभावकों और विद्यार्थियों के समूह से बनते हैं। ये न केवल विद्यालय बल्कि संस्कार निर्माण केंद्र,नागरिक निर्माण केंद्र होते हैं। अमरबेल के साथ वैसे तो अनकही अनथक सत्य वास्तविकताएं जुड़ी हुई है लेकिन उनका अगर दस प्रतिशत भी यहां उद्धृत किया जा सका तो इसकी सार्थकता होगी। अमरबेल का शाब्दिक विवेचन करें तो यह एक ऐसी बेल होती है जो विकास,उत्पादन और वृद्धि को इंगित करती है, अमरबेल इस कदर अच्छादित होती है की उसकी घनी छांव हो जाती है और इसके आसरे तले वृद्धि ही वृद्धि होती है। अमरबेल के बड़े बड़े गहरे हरे भरे पत्ते अपने भीतर रस और पोषक तत्व समाहित किए होते हैं और इसका तना गुंथ कर इतना मजबूत आकार ले लेता है कि इससे बेल के कमरे भी बनाए जा सकते हैं जो आवश्यकता पड़ने पर पूर्ण कक्ष का काम दे सकते हैं।वनस्पति के रूप में अमरबेल के बारे में और भी कुछ कहा जा सकता है लेकिन यहां अमरबेल का जिक्र विषयांतर के लिए है।अमरबेल यहां वह सच्चाई है जहां इसकी छांव में कितने ही शिक्षाविद अपनी विद्वता को प्रस्तुत कर गए,कितने ही विद्यार्थी गुरुकुल की तर्ज पर इसकी घनी छांव में बैठ कर पढ़ पढ़ कर कामयाब हो गए,कितने ही अधिकारी इस अमरबेल का दीदार कर के प्रत्यक्षदृष्ट हो गए कि गुरुकुल कमोबेश ऐसे ही हुआ करते हैं। अमरबेल शीर्षक के सच्चे घटनाक्रम का जिक्र करना प्रासंगिक है क्योंकि अमरबेल नमक यह ग्रंथ चाहे कोई क्रांति करने में कामयाब हो न हो लेकिन यह मानवता,इंसानियत और कर्तव्यनिष्ठा का अद्भुत दर्शन होगा।
1970 का कोई दिन,बीकानेर से करीब 115 किलोमीटर दूर लूणकरणसर तहसील का ऐतिहासिक गांव शेखसर,मलकीसर से ठीक 15 किलोमीटर रेतीले धोरों में बसा एक पुराना गांव जहां आने जाने के लिए कोई साधन नहीं,ऊंचे नीचे पहाड़ जैसे रेत के धोरे जिनमे से चल कर जा सकना लगभग असंभव।ऐसे शेखसर गांव की स्कूल प्राइमरी मिडल बनी और वहां मिडल स्कूल के हेडमास्टर के रूप में पदस्थापित हुए कुंवर भंवर सिंह शेखावत।भंवर सिंह शेखावत यहां के पहले हेडमास्टर के रूप में यहां आए तो यहां पहुंचना भी उन्हें चुनौती लगा।सुदूर रेत के धोरों में बसे इस गांव में मिडल स्कूल का होना अपने आपमें किसी उपलब्धि से कम नहीं।समूचे बीकानेर जिले में ही जहां एक दर्जन से अधिक मिडल स्कूल और आधा दर्जन से अधिक सेकेंडरी स्कूल नहीं होंगे ऐसे में मिडल स्कूल के महत्व को समझा जा सकता है। शेखसर का स्कूल,एक नीम का विशाल पेड़,और दो कमरे,गांव से एकदम बाहर।ग्रामीण पृष्ठभूमि में पले बढ़े और सीमित संसाधनों का महत्व समझ सकने वाले युवा हेडमास्टर जी जिनकी उम्र तकरीबन 28 साल रही होगी।उन्होंने स्कूल को देखा,नीम के पेड़ और उस पर लटकी रेल की पटरी की घंटी को देखा और देखा एक जाल के पेड़ को।बस इतना सा स्कूल।बहरहाल,ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़े हेडमास्टर जी गांव के चौधरी जी के घर गए,अपना परिचय दिया और रहने की व्यवस्था चाही।चौधरी साहब ने स्वागत किया,मिडल स्कूल के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने यथोचित आदर सत्कार किया और हरसंभव मदद का आश्वासन दिया।हेडमास्टर जी के पास स्टाफ के नाम पर उसी गांव के दो अध्यापक वो भी तृतीय श्रेणी। हेडमास्टर जी ने स्कूल संचालन शुरू किया।बेतरतीब सिस्टम को संभालने की जुगत में ग्रामीणों को बुलाया मीटिंग की।गाँव में जब ये खबर हुई कि कोई हेडमास्टर ऐसा भी है जो गंभीरता के साथ स्कूल संचालन चाहता है तो उनमें रुचि जागृत हुई।जब गाँव वालों को ये पता चला कि यह व्यक्ति शहर की विकसित चकाचौंध को त्याग कर सुदूर गाँव में रह कर स्कूल संचालन करने का इच्छुक है तो गाँव में सकारात्मक माहौल तैयार हुआ।अंततः जब गाँव में यह पता चला कि ये हेडमास्टर ख़ुद ही पास के हाँव का रहने वाला है और ग्रामीण परिवेश और पृष्ठभूमि को हृदयंगम करने वाला है,तो गाँव का उत्साह और अधिक बढ़ा।हेडमास्टर जी ने भी जब देखा कि गाँव ठेठ ग्रामीण संस्कारों से परिपूर्ण है और ठीक वैसा ही है जैसा उनका ख़ुद का गाँव है,तो उनका विश्वास जम गया और उन्होंने यहाँ अपने आपको ठहराने का मानस बना लिया।उनकी ग्रामीणों से अभ्यर्थना थी कि उनको सपरिवार रहने की माकूल व्यवस्था कर दी जाये,बाक़ी काम वो ख़ुद देख लेंगे।
Sunday, May 22, 2016
महाकुम्भ इलाहाबाद से सिंहस्थ उज्जैन कुम्भ तक
फरवरी 2013,स्वच्छ भारत मिशन बीकानेर का कार्यभार सँभालने के तुरंत बाद गुरु कृपा से महाकुम्भ इलाहाबाद जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ| जब देश में कोई भी स्वच्छता का जिक्र नहीं करता था तब बीकानेर में बंको बिकाणों अभियान का सृजन कर जिले को ओडीएफ बनाने का संकल्प संजोया|अप्रेल 2013 से संचालित यह सफ़र बिना रुके अनवरत लगातार चल और चलता ही गया|जिला,राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर इस अभियान के लिए सम्मानित होने के साथ ही जिले को ओडीएफ बनाने का यह सुखद संकल्प पूर्ण हुआ|21 अप्रेल 2016 को सिविल सर्विसेस दिवस पर नई दिल्ली के विज्ञानं भवन में देश के प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी के हाथों राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त करके राजस्थान के पहले एवं देश के दूसरे जिले के रूप में गौरवान्वित होने के पश्चात 11 मई 2016 को सिंहस्थ कुम्भ उज्जैन में गुरुकृपा से जाने का अवसर मिला|
कुम्भ से कुम्भ तक की इस महायात्रा में अनेक मुकाम आये और अंततः मंजिल मिली|
ब्लॉग लिखे एक अरसा हो गया अब इसे वापस शुरू किया जा रहा है,अनवरत जारी रहेगा यह सिलसिला| यह ब्लॉग लिखने का कारण भी अजीब है।उज्जैन के महाकुंभ में समर्थ सद्गुरू श्रीधर जी ब्रह्मचारीजी महाराज के सानिध्य में कुछ दिन रहना और पूर्ण आध्यात्मिक वांगमय को आत्मसात् करने के अतिरिक्त यहाँ परिजनों को भी आध्यात्मिक अतिरेक का एहसास करवाना एक कारण रहा।यह अनुभूत सत्य है कि आप इस जहान में आध्यात्मिक स्फुर्णा और ऊर्जा के बिना कामयाब नहीं हो सकते।महाकाल की नगरती उज्जैन में समर्थ सद्गुरू के आशीर्वाद तले रह कर जीवन को सुधारने का अभूतपूर्व अवसर किसी वरदान से कम नहीं।उज्जैन में गुरुदेव का आदेश हुआ कि क्षिप्रा का स्नान तो हुआ,अब नर्मदा मैया में। स्नान का सुख और पुण्य प्राप्त करो और नेमावर आश्रम में जा कर वहाँ की सात्विकता का आनंद उठाओ।हम सबब लोग अपन्नी दोनों गाड़ियों से गुरुदेव के शिष्य शुक्ला जी के मार्गदर्शन में नेमावर पहुँच गये,गुरुगृह में आनंद लिया,नर्मदा स्नान किया।
कुम्भ से कुम्भ तक की इस महायात्रा में अनेक मुकाम आये और अंततः मंजिल मिली|
ब्लॉग लिखे एक अरसा हो गया अब इसे वापस शुरू किया जा रहा है,अनवरत जारी रहेगा यह सिलसिला| यह ब्लॉग लिखने का कारण भी अजीब है।उज्जैन के महाकुंभ में समर्थ सद्गुरू श्रीधर जी ब्रह्मचारीजी महाराज के सानिध्य में कुछ दिन रहना और पूर्ण आध्यात्मिक वांगमय को आत्मसात् करने के अतिरिक्त यहाँ परिजनों को भी आध्यात्मिक अतिरेक का एहसास करवाना एक कारण रहा।यह अनुभूत सत्य है कि आप इस जहान में आध्यात्मिक स्फुर्णा और ऊर्जा के बिना कामयाब नहीं हो सकते।महाकाल की नगरती उज्जैन में समर्थ सद्गुरू के आशीर्वाद तले रह कर जीवन को सुधारने का अभूतपूर्व अवसर किसी वरदान से कम नहीं।उज्जैन में गुरुदेव का आदेश हुआ कि क्षिप्रा का स्नान तो हुआ,अब नर्मदा मैया में। स्नान का सुख और पुण्य प्राप्त करो और नेमावर आश्रम में जा कर वहाँ की सात्विकता का आनंद उठाओ।हम सबब लोग अपन्नी दोनों गाड़ियों से गुरुदेव के शिष्य शुक्ला जी के मार्गदर्शन में नेमावर पहुँच गये,गुरुगृह में आनंद लिया,नर्मदा स्नान किया।
Saturday, February 13, 2010
अमरबेल १३ फरवरी २०१०
अन्तराल तो है लेकिन कुछ भी सच लिखने के लिए समय तो चाहिए,मेरे स्मृति पटल पर पड़ चुकी गर्द काफी गहरी है फिर भी में उसके भीतर से जो कुछ झांक कर देख पा रहा हूँ,वही कुछ बता पा रहा हूँ
संसाधन विहीन उस गांव की स्कूल कि बात करने में मुझे इतना अचम्भा हो रहा है कि कभी कभी में सोचता हूँ कि ऐसा कैसे संभव हो सकता है?आज के परिवेश से जब मैं उस परिवेश कि तुलना करता हूँ तो लगता है कि मैं झूठ बोल रहा हूँलेकिन झूठ नहीं है ये भी मैं जानता हूँ,ये भी जानता हूँ कि मेरी इस बात को जो भी पढ़ेगा वो इसे अतिश्योक्ति ही कहेगाबहरहाल, योग्य और एक सर्व गुण संपन्न नागरिक कैसे बनाया जाये? इन कुछ बातों पर यदि हम गोर करें तो महसूस करेंगे कि सतही स्तर पर शिक्षण का स्तर क्या हो?विद्यार्थी की परिभाषा क्या हो? अभिभावक को किस प्रकार अपने बच्चों की देखभाल करनी चाहिए?अध्यापक अभिभावक परिषद् कैसे काम करती है?अध्यापक के पढ़ाने के तरीके क्या हों?अध्यापक डायरी का क्या महत्व है?पाठ्यक्रम किस प्रकार से समझा जाये?इसे स्थानीय परिवेश के साथ कैसे जोड़ा जाये?प्रार्थना सभा का जीवन में क्या महत्व है?अनुशासन कैसे कायम हो?शिष्य और गुरु के सम्बन्ध घनिष्ठ कैसे बनें?विद्यार्थी कुशाग्र कैसे बनें? हमें ये देखना होगा की ऐसे स्कूलों को कैसे सालों साल चलाया गया?वो लोग हमें ढूंढ कर लाने पड़ेंगे जो इस व्यवस्था के संचालक थे अन्यथा बहुत देर हो जाएगी
Wednesday, January 13, 2010
मोन मानव का आभूषण है,इस सच्चाई को सदियों से हमारे ग्रंथकारों ने स्वीकार कर इसे प्रतिपादित किया है,हममें सबसे बड़ी समस्या है कि हम बोल कर अपने आपको अभिव्यक्त करने की नाकाम कोशिशें करते हैं और इया प्रयास में विफल हो जाते हैं। इन्सान अगर अपने आपको अभिव्यक्त करने से बचे और सामने वाले को पूरा सुन कर संक्षिप्त बात कहे तो इस आदत से दुनियां का नक्शा ही बदल सकता है.मोन रहना बहुत सी समस्याओं का अंत है.
Sunday, August 16, 2009
अमरबेल...............१६ अगस्त २००९
१५ अगस्त से याद आया,राष्ट्रीय,राज्य स्तरीय,जिला और तहसील स्तरीय,सभी तरह के स्वतंत्रता दिवस के आयोजन हमने देखे हैं लेकिन आज मैं कहता हूँ की जिसने इस स्कूल का स्वतंत्रता दिवस देखा है उसे ये सब फीके लगेंगेरेत के सुनहरे धोरों के बीच स्थित टापू के इस स्कूल में जो संस्कृतिक आयोजन,पीटी परेड,व्यायाम,और खेल आदि होते थे उनसे लगता था की हिंदुस्तान की आजादी की वर्षगांठ इससे बेहतर कहीं भी नहीं मानी जा सकती.मुझे याद है दस दिन पहले ही बच्चों की रिहर्सल शुरू हो जाती थी,विभिन्न नाटक,भाषण,गीत,कवितायें,एकांकी,अभिनय और न जाने क्या क्या विचित्र वेशभूषा,जैसी तैयारियां की जाती थीमैं आपसे सही कहता हूँ इन कार्यक्रमों को देखने के लिए राजस्थान के प्रत्येक हिस्से से लोग आते थे स्कूल का बीस बीघा का मैदान खचाखच भर जाता था ,पांव धरने को जगह नहीं मिलती थी।
पूरा तो मुझे नहीं याद लेकिन एक बार के आयोजन में विद्यार्थियों ने संजय -विदुला संवाद का नाटकीय प्रस्तुतीकरण किया था उसकी मेरे जीवन पर बहुत गहरी छाप पडी,किस अंदाज में सावित्री नामक विदुला बनी विद्यार्थी ने संजय बनी मगन कँवर को सीख पिलाई और उस वक्त कतई नहीं लगता था की ये कोई नाटकीय प्रस्तुति है,वास्तव में संजय विदुला साकार हो उठा था ,किस कदर माता की आँखों से चिंगारियां निकल रही थी और कैसे संजय गर्दन झुकाए सुनने को विवश था मेरे कहने का अर्थ यह है की किस प्रकार शाला के स्टाफ ने सीमित संसाधनों के बाद भी रेतीले उस बियावान इलाके में इस तरह की तैयारियां की होगी,कैसे चरित्रों को बच्चों के भीतर डाला होगा कैसे शानदार सजीव प्रस्तुतियां देते होंगे?जरा कल्पना तो करें?
पूरा तो मुझे नहीं याद लेकिन एक बार के आयोजन में विद्यार्थियों ने संजय -विदुला संवाद का नाटकीय प्रस्तुतीकरण किया था उसकी मेरे जीवन पर बहुत गहरी छाप पडी,किस अंदाज में सावित्री नामक विदुला बनी विद्यार्थी ने संजय बनी मगन कँवर को सीख पिलाई और उस वक्त कतई नहीं लगता था की ये कोई नाटकीय प्रस्तुति है,वास्तव में संजय विदुला साकार हो उठा था ,किस कदर माता की आँखों से चिंगारियां निकल रही थी और कैसे संजय गर्दन झुकाए सुनने को विवश था मेरे कहने का अर्थ यह है की किस प्रकार शाला के स्टाफ ने सीमित संसाधनों के बाद भी रेतीले उस बियावान इलाके में इस तरह की तैयारियां की होगी,कैसे चरित्रों को बच्चों के भीतर डाला होगा कैसे शानदार सजीव प्रस्तुतियां देते होंगे?जरा कल्पना तो करें?
विद्यालयों में सांस्कृतिक गतिविधियों और सह पाठ्येटर गर्तिविधियों के प्रबल हिमायती तत्कालीन शिक्षक इन गतिविधियों के सहारे ही बहुत बड़ा हिस्सा बच्चों को समझाने में कामयाब होते थे,किताबों को मात्र एक सहारे के रूप में इस्तेमाल करने वाले तत्कालीन योग्य शिक्षक बालकों के भीतर समूल परिवर्तन करने के पक्षधर होते थे।मुझे याद है कि अध्यापक स्वयं फुटबॉल और वॉलीबॉल के मैदानों में बच्चों के साथ खेल कर उन्हें खेल की बारीक से बारीक बातें सिखाते थे।उस समय की सबसे ख़ास बात ये थी कि उस काल के प्राचीन खेल जो परंपरागत थे ,उनको प्राथमिकता से बच्चों को सिखाना विद्यालय की प्राथमिकता में शामिल था।स्कूल में तत्कालीन माहौल इस प्रकार का था कि बच्चे विद्यालय समय पश्चात भी अपने घर जाना पसंद नहीं करते थे,स्कूल को को करिकुलर गतिविधियों का इतना शानदार केंद्र बनाया हुआ था कि बच्चे अपने आपको यहीं पूरी तरह से खपा देते थे।
स्वतंत्रता दिवस एक बार फ़िर
किसी भी दिवस को क्यों मनाया जाता है?शायद इसलिए की उससे सम्बंधित यादें कभी धूमिल न हों!मेरा भी यही मानना हैलेकिन इन यादों को धूमिल न पड़ने देने की बात कहने वाले कुल कितने लोग हैं?चंद! बस, और कुछ नहीं
आजादी की वास्तविक ताबीर को समझने वाले मुझे तो मेरे अगल बगल तो नजर नहीं आते,कहीं और होंगे जहाँ तक मेरी शायद पहुँच नहीं हैमैं आजादी प्राप्त करने और उसे बनाये रखने की बात उस वैश्वीकरण के दौर में नहीं करना चाहता जब पूरा विश्व एक टेबल पर उतर आता है,भावनाओं में भरकर आन्दोलन करने का जो समय था उस समय जो लोग थे उन्होंने वही किया जो उन्हें करना चाहिए था'अगर वो समय आज होता तो आज भी वही होता जो उस समय हुआ,इसमें आर्श्चय किस बात का?देश काल और परिस्थितियां सदैव प्रकृति द्वारा संचालित होते हैं,और प्रकृति से ऊपर कोई नहीं है
मैं इस ब्लॉग को पढ़ रहे बुद्धिमान लोगों के सामने यह तर्क रखता हूँ की आज आप जिन स्वतंत्रता सैनानियों के गीत गाते हैं,क्या वही असल में देश को आजाद करवाने वाले शूरवीर थे?क्या आपको ये मालूम नहीं की जो इस कार्य के नाम पर गीतों में गाये जा रहे हैं वो तो मात्र चंद लोग हैं,उन असली क्रांतिकारियों के लम्बी फेहरिस्त तो हमें याद भी नहीं, अनाम हैं
आजादी की वास्तविक ताबीर को समझने वाले मुझे तो मेरे अगल बगल तो नजर नहीं आते,कहीं और होंगे जहाँ तक मेरी शायद पहुँच नहीं हैमैं आजादी प्राप्त करने और उसे बनाये रखने की बात उस वैश्वीकरण के दौर में नहीं करना चाहता जब पूरा विश्व एक टेबल पर उतर आता है,भावनाओं में भरकर आन्दोलन करने का जो समय था उस समय जो लोग थे उन्होंने वही किया जो उन्हें करना चाहिए था'अगर वो समय आज होता तो आज भी वही होता जो उस समय हुआ,इसमें आर्श्चय किस बात का?देश काल और परिस्थितियां सदैव प्रकृति द्वारा संचालित होते हैं,और प्रकृति से ऊपर कोई नहीं है
मैं इस ब्लॉग को पढ़ रहे बुद्धिमान लोगों के सामने यह तर्क रखता हूँ की आज आप जिन स्वतंत्रता सैनानियों के गीत गाते हैं,क्या वही असल में देश को आजाद करवाने वाले शूरवीर थे?क्या आपको ये मालूम नहीं की जो इस कार्य के नाम पर गीतों में गाये जा रहे हैं वो तो मात्र चंद लोग हैं,उन असली क्रांतिकारियों के लम्बी फेहरिस्त तो हमें याद भी नहीं, अनाम हैं
Friday, June 26, 2009
ना कहना......
एक एसटीडी पीसीओ पर आज दीवार पर टंगा हुआ एक कागज देखा जिस पर लिखा था -"जीवन की आधी मुसीबतों का स्त्रोत है अधिक शीघ्रता से "हाँ" कहना,और आवश्यकतानुसार शीघ्रता से "ना"नहीं कहना"
शुष्क "हाँ" कहने की अपेक्षा सुनहरी "ना" कहना अधिक संतोषप्रद होता है
ये बात वास्तव में बहुत अपील करती है
शुष्क "हाँ" कहने की अपेक्षा सुनहरी "ना" कहना अधिक संतोषप्रद होता है
ये बात वास्तव में बहुत अपील करती है
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