Sunday, May 22, 2016

महाकुम्भ इलाहाबाद से सिंहस्थ उज्जैन कुम्भ तक

फरवरी 2013,स्वच्छ भारत मिशन बीकानेर का कार्यभार सँभालने  के तुरंत  बाद गुरु कृपा से महाकुम्भ इलाहाबाद जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ| जब देश  में कोई भी स्वच्छता का जिक्र नहीं करता था तब बीकानेर में बंको बिकाणों अभियान का सृजन कर जिले को ओडीएफ बनाने का संकल्प संजोया|अप्रेल 2013 से संचालित यह सफ़र बिना रुके अनवरत लगातार चल और चलता ही गया|जिला,राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर इस अभियान के लिए सम्मानित होने के साथ ही जिले को ओडीएफ बनाने का यह सुखद संकल्प पूर्ण हुआ|21 अप्रेल 2016 को सिविल सर्विसेस दिवस पर नई दिल्ली के विज्ञानं भवन में देश के प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी के हाथों राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त करके राजस्थान के पहले एवं देश के दूसरे जिले के रूप में गौरवान्वित होने के पश्चात 11 मई 2016 को सिंहस्थ कुम्भ उज्जैन में गुरुकृपा से जाने का अवसर मिला|
कुम्भ से कुम्भ तक की इस महायात्रा में अनेक मुकाम आये और अंततः मंजिल मिली|
ब्लॉग लिखे एक अरसा हो गया अब इसे वापस शुरू किया जा रहा है,अनवरत जारी रहेगा यह सिलसिला| यह ब्लॉग लिखने का कारण भी अजीब है।उज्जैन के महाकुंभ में समर्थ सद्गुरू श्रीधर जी ब्रह्मचारीजी महाराज के सानिध्य में कुछ दिन रहना और पूर्ण आध्यात्मिक वांगमय को आत्मसात् करने के अतिरिक्त यहाँ परिजनों को भी आध्यात्मिक अतिरेक का एहसास करवाना एक कारण रहा।यह अनुभूत सत्य है कि आप इस जहान में आध्यात्मिक स्फुर्णा और ऊर्जा  के बिना कामयाब नहीं हो सकते।महाकाल की नगरती उज्जैन में  समर्थ सद्गुरू के आशीर्वाद तले रह कर जीवन को सुधारने का अभूतपूर्व अवसर किसी वरदान से कम नहीं।उज्जैन में गुरुदेव का आदेश हुआ कि क्षिप्रा का स्नान तो हुआ,अब नर्मदा मैया में। स्नान का सुख और पुण्य प्राप्त करो और नेमावर आश्रम में जा कर वहाँ की सात्विकता का आनंद उठाओ।हम सबब लोग अपन्नी दोनों गाड़ियों से गुरुदेव के शिष्य शुक्ला जी के मार्गदर्शन में नेमावर पहुँच गये,गुरुगृह में आनंद लिया,नर्मदा स्नान किया।
 

Saturday, February 13, 2010

अमरबेल १३ फरवरी २०१०

अन्तराल तो है लेकिन कुछ भी सच लिखने के लिए समय तो चाहिए,मेरे स्मृति पटल पर पड़ चुकी गर्द काफी गहरी है फिर भी में उसके भीतर से जो कुछ झांक कर देख पा रहा हूँ,वही कुछ बता पा रहा हूँ
संसाधन विहीन उस गांव की स्कूल कि बात करने में मुझे इतना अचम्भा हो रहा है कि कभी कभी में सोचता हूँ कि ऐसा कैसे संभव हो सकता है?आज के परिवेश से जब मैं उस परिवेश कि तुलना करता हूँ तो लगता है कि मैं झूठ बोल रहा हूँलेकिन झूठ नहीं है ये भी मैं जानता हूँ,ये भी जानता हूँ कि मेरी इस बात को जो भी पढ़ेगा वो इसे अतिश्योक्ति ही कहेगा
बहरहाल, योग्य और एक सर्व गुण संपन्न नागरिक कैसे बनाया जाये? इन कुछ बातों पर यदि हम गोर करें तो महसूस करेंगे कि सतही स्तर पर शिक्षण का स्तर क्या हो?विद्यार्थी की परिभाषा क्या हो? अभिभावक को किस प्रकार अपने बच्चों की देखभाल करनी चाहिए?अध्यापक अभिभावक परिषद् कैसे काम करती है?अध्यापक के पढ़ाने के तरीके क्या हों?अध्यापक डायरी का क्या महत्व है?पाठ्यक्रम किस प्रकार से समझा जाये?इसे स्थानीय परिवेश के साथ कैसे जोड़ा जाये?प्रार्थना सभा का जीवन में क्या महत्व है?अनुशासन कैसे कायम हो?शिष्य और गुरु के सम्बन्ध घनिष्ठ कैसे बनें?विद्यार्थी कुशाग्र कैसे बनें? हमें ये देखना होगा की ऐसे स्कूलों को कैसे सालों साल चलाया गया?वो लोग हमें ढूंढ कर लाने पड़ेंगे जो इस व्यवस्था के संचालक थे अन्यथा बहुत देर हो जाएगी

Wednesday, January 13, 2010

मोन मानव का आभूषण है,इस सच्चाई को सदियों से हमारे ग्रंथकारों ने स्वीकार कर इसे प्रतिपादित किया है,हममें सबसे बड़ी समस्या है कि हम बोल कर अपने आपको अभिव्यक्त करने की नाकाम कोशिशें करते हैं और इया प्रयास में विफल हो जाते हैं। इन्सान अगर अपने आपको अभिव्यक्त करने से बचे और सामने वाले को पूरा सुन कर संक्षिप्त बात कहे तो इस आदत से दुनियां का नक्शा ही बदल सकता है.मोन रहना बहुत सी समस्याओं का अंत है.

Sunday, August 16, 2009

अमरबेल...............१६ अगस्त २००९

१५ अगस्त से याद आया,राष्ट्रीय,राज्य स्तरीय,जिला और तहसील स्तरीय,सभी तरह के स्वतंत्रता दिवस के आयोजन हमने देखे हैं लेकिन आज मैं कहता हूँ की जिसने इस स्कूल का स्वतंत्रता दिवस देखा है उसे ये सब फीके लगेंगेरेत के सुनहरे धोरों के बीच स्थित टापू के इस स्कूल में जो संस्कृतिक आयोजन,पीटी परेड,व्यायाम,और खेल आदि होते थे उनसे लगता था की हिंदुस्तान की आजादी की वर्षगांठ इससे बेहतर कहीं भी नहीं मानी जा सकती.मुझे याद है दस दिन पहले ही बच्चों की रिहर्सल शुरू हो जाती थी,विभिन्न नाटक,भाषण,गीत,कवितायें,एकांकी,अभिनय और न जाने क्या क्या विचित्र वेशभूषा,जैसी तैयारियां की जाती थीमैं आपसे सही कहता हूँ इन कार्यक्रमों को देखने के लिए राजस्थान के प्रत्येक हिस्से से लोग आते थे स्कूल का बीस बीघा का मैदान खचाखच भर जाता था ,पांव धरने को जगह नहीं मिलती थी।
पूरा तो मुझे नहीं याद लेकिन एक बार के आयोजन में विद्यार्थियों ने संजय -विदुला संवाद का नाटकीय प्रस्तुतीकरण किया था उसकी मेरे जीवन पर बहुत गहरी छाप पडी,किस अंदाज में सावित्री नामक विदुला बनी विद्यार्थी ने संजय बनी मगन कँवर को सीख पिलाई और उस वक्त कतई नहीं लगता था की ये कोई नाटकीय प्रस्तुति है,वास्तव में संजय विदुला साकार हो उठा था ,किस कदर माता की आँखों से चिंगारियां निकल रही थी और कैसे संजय गर्दन झुकाए सुनने को विवश था मेरे कहने का अर्थ यह है की किस प्रकार शाला के स्टाफ ने सीमित संसाधनों के बाद भी रेतीले उस बियावान इलाके में इस तरह की तैयारियां की होगी,कैसे चरित्रों को बच्चों के भीतर डाला होगा कैसे शानदार सजीव प्रस्तुतियां देते होंगे?जरा कल्पना तो करें?
विद्यालयों में सांस्कृतिक गतिविधियों और सह पाठ्येटर गर्तिविधियों के प्रबल हिमायती तत्कालीन शिक्षक इन गतिविधियों के सहारे ही बहुत बड़ा हिस्सा बच्चों को समझाने में कामयाब होते थे,किताबों को मात्र एक सहारे के रूप में इस्तेमाल करने वाले तत्कालीन योग्य शिक्षक बालकों के भीतर समूल परिवर्तन करने के पक्षधर होते थे।मुझे याद है कि अध्यापक स्वयं फुटबॉल और वॉलीबॉल के मैदानों में बच्चों के साथ खेल कर उन्हें खेल की बारीक से बारीक बातें सिखाते थे।उस समय की सबसे ख़ास बात ये थी कि उस काल के प्राचीन खेल जो परंपरागत थे ,उनको प्राथमिकता से बच्चों को सिखाना विद्यालय की प्राथमिकता में शामिल था।स्कूल में तत्कालीन माहौल इस प्रकार का था कि बच्चे विद्यालय समय पश्चात भी अपने घर जाना पसंद नहीं करते थे,स्कूल को को करिकुलर गतिविधियों का इतना शानदार केंद्र बनाया हुआ था कि बच्चे अपने आपको यहीं पूरी तरह से खपा देते थे।

स्वतंत्रता दिवस एक बार फ़िर

किसी भी दिवस को क्यों मनाया जाता है?शायद इसलिए की उससे सम्बंधित यादें कभी धूमिल न हों!मेरा भी यही मानना हैलेकिन इन यादों को धूमिल न पड़ने देने की बात कहने वाले कुल कितने लोग हैं?चंद! बस, और कुछ नहीं

आजादी की वास्तविक ताबीर को समझने वाले मुझे तो मेरे अगल बगल तो नजर नहीं आते,कहीं और होंगे जहाँ तक मेरी शायद पहुँच नहीं हैमैं आजादी प्राप्त करने और उसे बनाये रखने की बात उस वैश्वीकरण के दौर में नहीं करना चाहता जब पूरा विश्व एक टेबल पर उतर आता है,भावनाओं में भरकर आन्दोलन करने का जो समय था उस समय जो लोग थे उन्होंने वही किया जो उन्हें करना चाहिए था'अगर वो समय आज होता तो आज भी वही होता जो उस समय हुआ,इसमें आर्श्चय किस बात का?देश काल और परिस्थितियां सदैव प्रकृति द्वारा संचालित होते हैं,और प्रकृति से ऊपर कोई नहीं है

मैं इस ब्लॉग को पढ़ रहे बुद्धिमान लोगों के सामने यह तर्क रखता हूँ की आज आप जिन स्वतंत्रता सैनानियों के गीत गाते हैं,क्या वही असल में देश को आजाद करवाने वाले शूरवीर थे?क्या आपको ये मालूम नहीं की जो इस कार्य के नाम पर गीतों में गाये जा रहे हैं वो तो मात्र चंद लोग हैं,उन असली क्रांतिकारियों के लम्बी फेहरिस्त तो हमें याद भी नहीं, अनाम हैं

Friday, June 26, 2009

ना कहना......

एक एसटीडी पीसीओ पर आज दीवार पर टंगा हुआ एक कागज देखा जिस पर लिखा था -"जीवन की आधी मुसीबतों का स्त्रोत है अधिक शीघ्रता से "हाँ" कहना,और आवश्यकतानुसार शीघ्रता से "ना"नहीं कहना"
शुष्क "हाँ" कहने की अपेक्षा सुनहरी "ना" कहना अधिक संतोषप्रद होता है
ये बात वास्तव में बहुत अपील करती है

Friday, June 19, 2009

अमरबेल.....(१०) १९ जून 2009

मैं बहुत आह्लादित हूँ की अमरबेल की भूमिका को सराहा जा रहा है,मेरे आह्लाद का एक कारण ये भी है कि हिंदुस्तान कि विख्यात आकाशगंगा कोरियर सर्विस के चेयरमेन डॉक्टर सुभाष जी गोयल ने इसे अप्रीसियेट किया है,मैं खुश इसलिए भी हूँ कि डॉक्टर साहब ख़ुद उस स्कूल के प्रत्यक्ष दृष्टा हैं जिसको अमरबेल के रूप में आकार मिल रहा है.धन्यवाद् डॉक्टर साहब,बहुत अच्छा लगा.