Wednesday, January 13, 2010
Sunday, August 16, 2009
अमरबेल...............१६ अगस्त २००९
पूरा तो मुझे नहीं याद लेकिन एक बार के आयोजन में विद्यार्थियों ने संजय -विदुला संवाद का नाटकीय प्रस्तुतीकरण किया था उसकी मेरे जीवन पर बहुत गहरी छाप पडी,किस अंदाज में सावित्री नामक विदुला बनी विद्यार्थी ने संजय बनी मगन कँवर को सीख पिलाई और उस वक्त कतई नहीं लगता था की ये कोई नाटकीय प्रस्तुति है,वास्तव में संजय विदुला साकार हो उठा था ,किस कदर माता की आँखों से चिंगारियां निकल रही थी और कैसे संजय गर्दन झुकाए सुनने को विवश था मेरे कहने का अर्थ यह है की किस प्रकार शाला के स्टाफ ने सीमित संसाधनों के बाद भी रेतीले उस बियावान इलाके में इस तरह की तैयारियां की होगी,कैसे चरित्रों को बच्चों के भीतर डाला होगा कैसे शानदार सजीव प्रस्तुतियां देते होंगे?जरा कल्पना तो करें?
स्वतंत्रता दिवस एक बार फ़िर
आजादी की वास्तविक ताबीर को समझने वाले मुझे तो मेरे अगल बगल तो नजर नहीं आते,कहीं और होंगे जहाँ तक मेरी शायद पहुँच नहीं हैमैं आजादी प्राप्त करने और उसे बनाये रखने की बात उस वैश्वीकरण के दौर में नहीं करना चाहता जब पूरा विश्व एक टेबल पर उतर आता है,भावनाओं में भरकर आन्दोलन करने का जो समय था उस समय जो लोग थे उन्होंने वही किया जो उन्हें करना चाहिए था'अगर वो समय आज होता तो आज भी वही होता जो उस समय हुआ,इसमें आर्श्चय किस बात का?देश काल और परिस्थितियां सदैव प्रकृति द्वारा संचालित होते हैं,और प्रकृति से ऊपर कोई नहीं है
मैं इस ब्लॉग को पढ़ रहे बुद्धिमान लोगों के सामने यह तर्क रखता हूँ की आज आप जिन स्वतंत्रता सैनानियों के गीत गाते हैं,क्या वही असल में देश को आजाद करवाने वाले शूरवीर थे?क्या आपको ये मालूम नहीं की जो इस कार्य के नाम पर गीतों में गाये जा रहे हैं वो तो मात्र चंद लोग हैं,उन असली क्रांतिकारियों के लम्बी फेहरिस्त तो हमें याद भी नहीं, अनाम हैं
Friday, June 26, 2009
ना कहना......
शुष्क "हाँ" कहने की अपेक्षा सुनहरी "ना" कहना अधिक संतोषप्रद होता है
ये बात वास्तव में बहुत अपील करती है
Friday, June 19, 2009
अमरबेल.....(१०) १९ जून 2009
Sunday, June 7, 2009
अमरबेल ............(९) ७ जून २००९
जिस स्कूल परिसर में गांव के एवड बैठते थे,पशु जहाँ अपनी गोर बनाये रखते थे,उस स्कूल का साफ सुथरा महकता वातावरण,कल्पना से भी परे हो गया.अध्यापक जो भी एक बार गांव में आ जाते थे,वो वापस जाने की जिद या कोशिश नहीं करते थे,इससे बडी खूबसूरती और सफलता और क्या होगी?स्कूल वास्तव में स्कूल जैसा हो गया था,मन लगता था,वहीं पर बैठे रहना चाहते थे बच्चे और गुरुजन.स्कूल की सुरभि दूर दूर तक फैलने लगी,हालाँकि पहले प्रचार के कोई माध्यम नहीं होते थे फ़िर भी इस स्कूल की पढाई का स्तर,अनुशाशन,और नियमितता का व्यापक प्रचार हुआ,लोग दूर दूर से इस गांव में सिर्फ़ बच्चे पढाने आने लगे,कोई अपने रिश्तेदारों के पास बच्चे छोड़ने लगे तो कोई स्कूल में मास्टरों के पास.हेड मास्टर जी ने पुराने ग्राम पंचायत भवन को छात्रावास बना दिया था,कुछ बच्चे उसमें रहने लगे.मैं कैसे लिखूं किन शब्दों का उपयोग करूं,कुछ समझ में नहीं आता था की कोन कहाँ रह रहा है.लक्ष्म्न दास सोदागर सिंह जी के मकान पर सो जाता था,रोटी भी वहीं खा लेता था,बदरी दास चाहे छात्रावास में रहता होगा,लेकिन खाने के समय वो हेड मास्टर जी वाले घर चला जाता था,बहनजी उसे भी खाना खिला देती थी.(बहनजी हम गुरुजनों की पत्नी को कहते थे),रूप सिंह तो स्कूल के पडोसी लेखरामजी के घर रोटी खा आता था,हंसराज का जहाँ मोका लगता वहीं खा आता था,ये तो मुझे कुछ धुंधली यादें है,वरना उस समय कोई भी किसी के घर खाना खाने जाता तो कोई मना नहीं था.महावीर,चुनाराम,पन्नालाल,रामेश्वर,लेखनाथ,भीखाराम,रामकरन,श्योदान,मनफूल,और अनेक सैंकडों नम ऐसे हैं जो बहर गांवों के थे और इस स्कूल में पढ़ते थे,मेरा दावा है की किसी भी विद्यार्थी कभी इस स्कूल में परायापन नहीं लगा होगा,किसी को एक पल भी ये महसूस नहीं हुआ होगा की वो किसी पराये गांव में है.स्कूल के बाद स्कूल स्कूल के पहले स्कूल जहाँ देखो वहां स्कूल ,बच्चे,अभिभावक,अध्यापक,यानि चरों तरफ स्कूल का माहौल.हेड मास्टर जी ने अपने आपको स्कूल के प्रति जिस भाव से समर्पित कर रखा था उसकी परिभाषा सम्भव नहीं लेकिन ये जरूर है की उनकी विद्वता,विनम्रता,और शालीनता की तह तक जा सकना मुमकिन नहीं है .
अमरबेल ..........(८) ७ जून २००९
..एक उमेद सिंह नामक पुलिस के आदमी थे उनका खेत स्कूल के पास था,जब छात्रों ने स्कूल में ग्वार पैदा करके पानी का कनेक्सन करवा लिया तो,हेड मास्टर जी ने उमेद सिंह जी से उनका २० बीघा खेत स्कूल के लिए मांग लिया.उन्होंने राजी राजी खेत बोने की इजाजत देदी,सब बरसात का इंतजार करने लगे,बरसात आई,हम बच्चों ने लकडियाँ जोड़ जोड़ कर छोटे छोटे हल बनाये,अपने अपने घरों से ग्वार का बीज लाये,खेत की सफाई जिसे ग्रामीण सूड कहता हैं,किया और बुआई शुरू कर दी,जहाँ तक मुझे याद है हमने रोजाना एक एक घंटे जुताई की और १० दिन में पूरा २० बीघा खेत जोत दिया.खेत में मतीरे,काकड़,काचर की बेलें भी लगे थी.ज्यों ज्यों दिन बीतने लगे ग्वार बढ़ने लगा,अध्यापकों के परिवार ग्वारफली तोड़ने के लिए खेत जाने लगे,मतीरा,काचर,तींदसी,लोइया आदि की हरी सब्जिया खूब लेकर आते,बहरहाल उस साल मुझे याद है शायद ८३५ रूपये का ग्वार पैदा हुआ था,और जब उसे बेच कर हेडमास्टर जी ने प्रार्थना में पैसे दिखाए थे तो वो बहुत भावुक हो गये थे,मुझे याद है उन्होंने बच्चों से पूछा था-"बताओ इस रूपये का क्या करना है?"कोई कुछ नहीं बोला था,आठवीं क्लास का राम किशन बोला था की -"गुरूजी,हमारे गुरुजनों के रहने के लिए मकान नहीं है,कम से कम इस रूपये से काम तो शुरू करवादो,अगली फसल में और पैसे आजायेंगे."पता नहीं हेड मास्टर जी ने तो क्या सोच रखा था,लेकिन रामकिशन के इस सुझाव को उन्होंने मन लिया और स्कूल के पास ही अध्यापक आवास की नींव लगवा दी ,मुझे आज इतना घोर अचम्भा है की वो जो नींव लगवाई थी और ८३५ रूपये की रकम से मकान बनाना चाहते थे,आप भी अचम्भा करेंगे नींव लगने के बाद सिर्फ़ दो महीने में ही ५ अध्यापक आवास बन कर तैयार हो गए जिन पर लागत १०००० रूपये से कहीं अधिक आई थी,बाकि रुपया ग्रामीणों ने चंदे से इकठा किया था,वो इसलिए की हेड मास्टर जी ने घर घर जाकर ये कह दिया था कि जब बच्चे इतना कुछ कर सकते हैं तो,कुछ तो आपको भी करना चाहिए.ऐसा शानदार नजारा था मेरे गांव का.आज ३९ साल बाद ये सब कुछ मैं बताना इसलिए जरूरी समझता हूं कि कम से कम कोई तो उस हालत कि कल्पना करे कि कैसे काम हुए होंगे,कैसे यह वर्तमान किस भूतकाल कि नींव पर टिका हुआ है?क्यों लोग अपने आपको नियमो के अलावा भी काम करने को prstut कर देते थे,यानि काम किसी को dikhane कि grj से नहीं blki अपने देश कि trkki के लिए किया जाना मूल bhawna कहा जाना चाहिए.
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