Tuesday, April 9, 2024

शहर छोड़ कर गांव में पदस्थापन

वर्तमान का जो मौजूदा परिवेश हमें देखने को मिलता है वो वस्तुत: बहुत सी गहराइयाँ लिए होता है,वर्तमान की नींव में अतीत दफन होता  है वो अतीत जो कभी वर्तमान होता था,उसी तत्कालीन वर्तमान की मज़बूत नींव पर जो वर्तमान इमारत खड़ी है उसका इतिहास तैयार किया जाना चाहिए।कल्पना कीजिए जिस वर्तमान में हम है,उसका अतीत जैसा भी था उसी के दम से तो वर्तमान है?अतीत में जिन लोगों ने अपने आपको उत्सर्ग किया,जिन लोगों ने अपने आपको समर्पित किया उनको विस्मृत करना इतिहास कभी गवारा नहीं करता।मान  लीजिए किसी इमारत की नींव को सहसा निकल लिया जाये तो क्या वो इमारत खड़ी रह सकेगी? कहा जाता है कि इंजीनियर की गलती भवन में,डॉक्टर की गलती श्मशान में दफ़्न हो जाती है लेकिन शिक्षक की गलती से सभ्यताएँ दफन हो जया करती हैं।

1958 में बीकानेर की पाबू पाठशाला में पदस्थापित युवा अध्यापक भंवर सिंह शेखावत को शहर पसंद नहीं आया और उन्होंने गांव में पोस्टिंग मांगी!गांव में जहां अध्यापकों। का बहुत अभाव था वहां तुरंत उनको बीकानेर से तीस किलोमीटर दूर शेरेरा गांव में लगा दिया गया शैरेरा में स्कूल एक झोंपड़े में,पास के ही एक अन्य झोंपड़े में अध्यापक आवास।शहर की सभी सुख सुविधाएं छोड़ कर सुदूर गांवों को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले भंवर सिंह जी ने तो हैं में स्कूल की जाजम जमा दी लेकिन परिवार में दो बच्चों को चिंचड़ चिपक कर बीमार बना गए।अमीर घराने की उनकी अर्धांगिनी को बाकी सब तो बर्दाश्त था लेकिन छोटे बच्चों की दुर्गति वो नहीं सहन कर सकी।उन्होंने ऐलान कर दिया की वो यहां नहीं रहेगी।छोटे छह माह के बालक की चिंचड और ऐसे विषाणुओं ने काट काट कर सूजा दिया।घबराई मां बच्चे को गोद में उठा कर पच्चीस किलोमीटर दूर  रेतीले धोरों में से वैद्य को दिखाने गई तब कहीं जा कर बच्चे को बचा सकी। मां ने तय कर लिया कि अपने मासूम बच्चों की जान की कीमत पर वो ऐसी नौकरी नहीं करने देगी।वो बीकानेर आ गई और किराए के मकान में रहने लगी।भंवर सिंह जी को तो गांवों से प्रेम था ,उन्होंने कपूरीसर में पोस्टिंग करा ली।बीकानेर से करीब सौ किलोमीटर दूर इस गांव में रहे, बाद में जब सेकंड ग्रेड में प्रोमोशन हो गया तो  १९७० में इसके पडौस के शेखसर गांव में बतौर हेड मास्टर पोस्टिंग हुई। शेखसर बड़ा गांव था,चिकित्सा सुविधा थी,आयुर्वेदिक अस्पताल था,यहां ठीक बैठा,और शेखसर में अपने आपको स्थापित करने की ठान ली। शेखसर के लोगों में शिक्षा के प्रति ललक और जागृति देख कर भंवर सिंह जी का उत्साह बढ़ा और वे जुट गए।स्कूल मिडल हो गई लेकिन कमरे नहीं थे, चंदा किया गांव गांव शहर शहर घूमे,चंदा इकट्ठा कर के स्कूल के कमरे बनाए,अध्यापकों के रहने के लिए आवास बनाए और एक शानदार विद्यालय सिस्टम को आकार दिया।परिवार के साथ शेखसर में रहते हुए उन्होंने शिक्षा की ऐसी अलख जगाई कि दो साल में ही शेखसर के स्कूल की ख्याति फैलने लगी। उस जमाने में मिडल स्कूल शिक्षा का बहुत बड़ा केंद्र हुआ करते थे,जिले में ही चंद  दो चार मिडल स्कूल हुआ करते थे।इस स्कूल में आसपास के गांवों से पढ़ने के लिए छात्र प्रवेश लेने लगे।देखते ही देखते यह स्कूल पश्चिमी राजस्थान का  बहुत बड़ा शिक्षा केंद्र बन गया।बीकानेर,चुरू,श्री गंगानगर, हनुमानगढ़,सीकर,जैसलमेर,झुंझुनूं  सहित अनेक जिलों से यहां छात्र आने लगे,भंवर सिंह जी ने पुराने पंचायत भवन को छात्रावास का रूप दिला दिया।अब स्कूल चौबीसों घंटे चलने वाला केंद्र बन गया।यहां स्कूल दिन में भी और रात में भी चलता था क्योंकि अध्यापकों और छात्रों के पास दूसरा कोई काम ही नहीं था।भंवर सिंह जी ने इधर उधर से ढूंढ कर अपने से संबंधित ग्रामीण इलाकों के अध्यापकों की खोज कर उनकी पोस्टिंग यहां करवा ली वहीं जब शिक्षा विभाग के अफसरों ने देखा कि छात्र संख्या निरंतर बढ़ रही है,राजस्थान के अनेक स्थानों से छात्र यहां पढ़ने आ रहे हैं तो उन्होंने यहां अध्यापकों की नियुक्तियां भी कर डाली।आठवीं तक के स्कूल में करीब आठ दस अध्यापक हो गए और सब के सब गांव में स्थाई रूप से रहने वाले,क्योंकि गांव से बाहर जाने के लिए कोई साधन था ही नही।कोई कहीं बाहर जाए तो भी कहां जाए इसलिए दिन रात बच्चों को पढ़ाने और खेल कूद की गतिविधियों के अलावा कोई काम नहीं था।विद्यालय शिक्षा का केंद्र तो होता है लेकिन उचित और आवश्यक संसाधनों के अभाव में शिक्षा अपने मूल स्वरूप में नहीं रह सकती।शिक्षा देने और लेने के लिए माहौल,भवन,संसाधन,बैठने के प्रबंध,कालांश प्रबंध,अध्यापकों की मौजूदगी आदि अनेक कारक आवश्यक होते हैं।ग्रामीण माहौल में पढ़े लिखे पले बढ़े हेड मास्टर जी ने गाँव को स्कूल में शासमिल करने की ठानी।


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