जिस स्कूल परिसर में गांव के एवड बैठते थे,पशु जहाँ अपनी गोर बनाये रखते थे,उस स्कूल का साफ सुथरा महकता वातावरण,कल्पना से भी परे हो गया.अध्यापक जो भी एक बार गांव में आ जाते थे,वो वापस जाने की जिद या कोशिश नहीं करते थे,इससे बडी खूबसूरती और सफलता और क्या होगी?स्कूल वास्तव में स्कूल जैसा हो गया था,मन लगता था,वहीं पर बैठे रहना चाहते थे बच्चे और गुरुजन.स्कूल की सुरभि दूर दूर तक फैलने लगी,हालाँकि पहले प्रचार के कोई माध्यम नहीं होते थे फ़िर भी इस स्कूल की पढाई का स्तर,अनुशाशन,और नियमितता का व्यापक प्रचार हुआ,लोग दूर दूर से इस गांव में सिर्फ़ बच्चे पढाने आने लगे,कोई अपने रिश्तेदारों के पास बच्चे छोड़ने लगे तो कोई स्कूल में मास्टरों के पास.हेड मास्टर जी ने पुराने ग्राम पंचायत भवन को छात्रावास बना दिया था,कुछ बच्चे उसमें रहने लगे.मैं कैसे लिखूं किन शब्दों का उपयोग करूं,कुछ समझ में नहीं आता था की कोन कहाँ रह रहा है.लक्ष्म्न दास सोदागर सिंह जी के मकान पर सो जाता था,रोटी भी वहीं खा लेता था,बदरी दास चाहे छात्रावास में रहता होगा,लेकिन खाने के समय वो हेड मास्टर जी वाले घर चला जाता था,बहनजी उसे भी खाना खिला देती थी.(बहनजी हम गुरुजनों की पत्नी को कहते थे),रूप सिंह तो स्कूल के पडोसी लेखरामजी के घर रोटी खा आता था,हंसराज का जहाँ मोका लगता वहीं खा आता था,ये तो मुझे कुछ धुंधली यादें है,वरना उस समय कोई भी किसी के घर खाना खाने जाता तो कोई मना नहीं था.महावीर,चुनाराम,पन्नालाल,रामेश्वर,लेखनाथ,भीखाराम,रामकरन,श्योदान,मनफूल,और अनेक सैंकडों नम ऐसे हैं जो बहर गांवों के थे और इस स्कूल में पढ़ते थे,मेरा दावा है की किसी भी विद्यार्थी कभी इस स्कूल में परायापन नहीं लगा होगा,किसी को एक पल भी ये महसूस नहीं हुआ होगा की वो किसी पराये गांव में है.स्कूल के बाद स्कूल स्कूल के पहले स्कूल जहाँ देखो वहां स्कूल ,बच्चे,अभिभावक,अध्यापक,यानि चरों तरफ स्कूल का माहौल.हेड मास्टर जी ने अपने आपको स्कूल के प्रति जिस भाव से समर्पित कर रखा था उसकी परिभाषा सम्भव नहीं लेकिन ये जरूर है की उनकी विद्वता,विनम्रता,और शालीनता की तह तक जा सकना मुमकिन नहीं है .
Sunday, June 7, 2009
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2 comments:
achha laga
badhai !
आज पहली बार इस ब्लॉग पर आना हुआ | पढ़कर बहुत अच्छा लगा | आगे आना जाना लगा रहेगा |
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