Saturday, February 13, 2010

अमरबेल १३ फरवरी २०१०

अन्तराल तो है लेकिन कुछ भी सच लिखने के लिए समय तो चाहिए,मेरे स्मृति पटल पर पड़ चुकी गर्द काफी गहरी है फिर भी में उसके भीतर से जो कुछ झांक कर देख पा रहा हूँ,वही कुछ बता पा रहा हूँ
संसाधन विहीन उस गांव की स्कूल कि बात करने में मुझे इतना अचम्भा हो रहा है कि कभी कभी में सोचता हूँ कि ऐसा कैसे संभव हो सकता है?आज के परिवेश से जब मैं उस परिवेश कि तुलना करता हूँ तो लगता है कि मैं झूठ बोल रहा हूँलेकिन झूठ नहीं है ये भी मैं जानता हूँ,ये भी जानता हूँ कि मेरी इस बात को जो भी पढ़ेगा वो इसे अतिश्योक्ति ही कहेगा
बहरहाल, योग्य और एक सर्व गुण संपन्न नागरिक कैसे बनाया जाये? इन कुछ बातों पर यदि हम गोर करें तो महसूस करेंगे कि सतही स्तर पर शिक्षण का स्तर क्या हो?विद्यार्थी की परिभाषा क्या हो? अभिभावक को किस प्रकार अपने बच्चों की देखभाल करनी चाहिए?अध्यापक अभिभावक परिषद् कैसे काम करती है?अध्यापक के पढ़ाने के तरीके क्या हों?अध्यापक डायरी का क्या महत्व है?पाठ्यक्रम किस प्रकार से समझा जाये?इसे स्थानीय परिवेश के साथ कैसे जोड़ा जाये?प्रार्थना सभा का जीवन में क्या महत्व है?अनुशासन कैसे कायम हो?शिष्य और गुरु के सम्बन्ध घनिष्ठ कैसे बनें?विद्यार्थी कुशाग्र कैसे बनें? हमें ये देखना होगा की ऐसे स्कूलों को कैसे सालों साल चलाया गया?वो लोग हमें ढूंढ कर लाने पड़ेंगे जो इस व्यवस्था के संचालक थे अन्यथा बहुत देर हो जाएगी

Wednesday, January 13, 2010

मोन मानव का आभूषण है,इस सच्चाई को सदियों से हमारे ग्रंथकारों ने स्वीकार कर इसे प्रतिपादित किया है,हममें सबसे बड़ी समस्या है कि हम बोल कर अपने आपको अभिव्यक्त करने की नाकाम कोशिशें करते हैं और इया प्रयास में विफल हो जाते हैं। इन्सान अगर अपने आपको अभिव्यक्त करने से बचे और सामने वाले को पूरा सुन कर संक्षिप्त बात कहे तो इस आदत से दुनियां का नक्शा ही बदल सकता है.मोन रहना बहुत सी समस्याओं का अंत है.